आयशर मोटर्स और रॉयल एनफील्ड को वैश्विक पहचान दिलाने वाले विक्रम लाल की पारिवारिक पृष्ठभूमि व्यापार, इंजीनियरिंग और कलात्मक उद्यमिता का एक बेहतरीन संयोजन है।
विक्रम लाल का जन्म 1942 में दिल्ली के एक समृद्ध पंजाबी खत्री व्यावसायिक परिवार में हुआ था। उन्होंने देहरादून के प्रसिद्ध द दून स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद वे मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने जर्मनी की ‘डार्मस्टैड टेक्निकल यूनिवर्सिटी’ चले गए।
विक्रम लाल के पिता मनमोहन लाल ने साल 1948 में ‘गुडअर्थ’ (Goodearth) नाम से एक ट्रैक्टर आयात और वितरण का काम शुरू किया था। यह भारत का पहला आयातित ट्रैक्टर था। इससे आगे बढ़कर उन्होंने 1959 में जर्मनी की ‘आयशर’ कंपनी के साथ साझेदारी में भारत में पहले स्वदेशी ट्रैक्टर का निर्माण कर देश में कृषि मशीनरी क्रांति की नींव रखी।
विक्रम 1966 में भारत लौटकर पारिवारिक व्यवसाय में शामिल हुए। 1966 से 1997 के बीच विक्रम लाल के नेतृत्व में आयशर मोटर्स की विकास यात्रा भारतीय ऑटोमोटिव इतिहास की सबसे साहसिक और रणनीतिक कहानियों में से एक है। इस अवधि में कंपनी एक स्थानीय ट्रैक्टर असेंबलर से बदलकर एक बहुआयामी ऑटोमोबाइल साम्राज्य बनी। इस 31 वर्षों के सफर की मुख्य विकास गाथा निम्नलिखित महत्वपूर्ण चरणों में विभाजित है:
1. व्यवसाय में प्रवेश और स्वदेशीकरण (1966 – 1970): जर्मनी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद विक्रम लाल 1966 में अपने पिता मनमोहन लाल द्वारा स्थापित पारिवारिक ट्रैक्टर कंपनी आयशर इंडिया से जुड़े।
2. पूर्ण स्वदेशीकरण: उनके तकनीकी कौशल के कारण, कंपनी ने अगले 15 वर्षों में अपनी विनिर्माण प्रक्रिया का 100% स्वदेशीकरण हासिल कर लिया, जिससे विदेशी कलपुर्जों पर निर्भरता समाप्त हो गई।
3. मूल जर्मन कंपनी का अधिग्रहण कर ऐतिहासिक उलटफेर: 1980 के दशक में जब आयशर की मूल जर्मन पैरेंट कंपनी Eicher Traktoren आर्थिक मंदी के कारण दिवालिया होने की कगार पर थी, तब विक्रम लाल ने एक अभूतपूर्व फैसला लिया। महज ₹80 करोड़ के राजस्व वाली भारतीय कंपनी ‘आयशर ट्रैक्टर्स इंडिया’ ने विदेशी बैंकों से कर्ज लेकर अपनी ही मूल जर्मन कंपनी में ₹2 करोड़ का निवेश किया और उसका अधिग्रहण कर लिया। यह किसी भारतीय कंपनी द्वारा किसी विदेशी ब्रांड को बचाने और खरीदने के शुरुआती उदाहरणों में से एक था।
इस अधिग्रहण के बाद 1982 में ‘आयशर मोटर्स लिमिटेड’ की स्थापना हुई। विक्रम लाल ने एक बेहतरीन रणनीति अपनाई। उन्होंने जर्मनी में ही एक असेंबली लाइन स्थापित की। इस असेंबली लाइन के लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स और कलपुर्जे भारत से आयात किए जाते थे।1985 तक भारत से जर्मनी को करीब ₹50 लाख मूल्य के पार्ट्स एक्सपोर्ट किए जाने लगे, जिसने वैश्विक बाजार में भारतीय इंजीनियरिंग की गुणवत्ता को साबित किया। यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह वो दौर था जब भारतीय कंपनियां विदेशी ब्रांड्स के सामने बहुत छोटी मानी जाती थीं, लेकिन एक भारतीय सहायक कंपनी ने अपनी ही विदेशी ‘मदर कंपनी’ को खरीदकर उसकी साख बचाई थी।
4. विविधीकरण (1982 – 1986): केवल ट्रैक्टरों तक सीमित न रहकर विक्रम लाल ने ‘आयशर मोटर्स लिमिटेड’ को हल्के वाणिज्यिक वाहनों (LCVs) के बाजार में प्रवेश कराने के लिए जापान की दिग्गज कंपनी मित्सुबिशी के साथ हाथ मिलाया। इसके बाद 1986 में कंपनी ने भारत में अपने कमर्शियल ट्रकों का निर्माण और बिक्री शुरू की।
5. रॉयल एनफील्ड का ऐतिहासिक अधिग्रहण: 1990 के दशक की शुरुआत में भारत की प्रतिष्ठित मोटरसाइकिल कंपनी एनफील्ड इंडिया भारी कर्ज में डूबी थी और बंद होने वाली थी। विक्रम लाल ने 1990 में इसमें हिस्सेदारी खरीदी और 1994 तक इसकी बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर लिया और इसका नाम बदलकर रॉयल एनफील्ड कर दिया।
1985 में हृदयघात होने के कारण विक्रम लाल कंपनी के प्रबंधन से पीछे हटने लगे और 1997 में अपनी कंपनियों में सभी कार्यकारी भूमिकाओं से सेवानिवृत्त होकर पेशेवर प्रबंधकों को नियंत्रण सौंप दिया। विक्रम लाल दून स्कूल के निदेशक मंडल के सदस्य भी रहे हैं। विक्रम लाल की पत्नी अनीता लाल भारत के बेहद प्रसिद्ध और प्रीमियम लाइफस्टाइल व होम डेकोर ब्रांड ‘गुडअर्थ’ की संस्थापक हैं। उनकी बेटी सिमरन लाल परिवार के दो प्रीमियम लाइफस्टाइल ब्रांड्स—’गुड अर्थ’ और ‘निकोबार’ को सफलतापूर्वक संभालती हैं।
बुलेट का कायाकल्प:
1990 के दशक में बुलेट की बिक्री में भारी गिरावट आई और यह डिवीजन कंपनी के लिए एक घाटे का सौदा बन गया था। वर्ष 2000 तक कंपनी को इस मोटरसाइकिल डिवीज़न से लगभग ₹20 करोड़ का भारी घाटा हो रहा था। आयशर मोटर्स के बोर्ड ने तय कर लिया था कि या तो इस ब्रांड को बेच दिया जाए या फैक्ट्री को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए।
विक्रम लाल के बेटे सिद्धार्थ लाल उन्हीं दिनों 26 वर्ष की आयु में जर्मनी से पढ़ाई पूरी कर लौटे थे और वे खुद एक क्रेजी बुलेट राइडर थे। उन्होंने बोर्ड से एक आखिरी मौका मांगा और विश्वास दिलाया कि वह इस ब्रांड को दोबारा खड़ा करेंगे।
उन्होंने समझ लिया था कि बुलेट का ‘रफ एंड टफ’ लुक लोगों को पसंद है, लेकिन उसकी पुरानी तकनीक से युवा परेशान हैं। उन्होंने बुलेट की आत्मा यानि लुक और आवाज को बदले बिना उसकी कमियों लेफ्ट हैंड गियर्स, लो एवरेज, ऑयल लीकेज, हैवी किक स्टार्ट को दूर किया।
सिद्धार्थ लाल ने एक बहुत बड़ा और जोखिम भरा फैसला लिया। आयशर ग्रुप उस समय ट्रैक्टर, ट्रक, गारमेंट्स और फुटवियर जैसे 15 अलग-अलग बिजनेस चला रहा था। सिद्धार्थ ने रॉयल एनफील्ड को बचाने के लिए ट्रैक्टर समेत अन्य मुनाफे वाले बिजनेस बेच दिए और पूरा ध्यान सिर्फ दो चीजों पर लगाया—कमर्शियल ट्रक और रॉयल एनफील्ड।
सिद्धार्थ लाल ने बुलेट को सिर्फ एक मोटरसाइकिल के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘लाइफस्टाइल’ और ‘मदर्स प्राइड’ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने राइडिंग क्लब्स (जैसे ‘राउडी राइडर्स’), हिमालयन ट्रेक और एनफील्ड फेस्टिवल्स की शुरुआत की। बुलेट चलाना एक स्टेटस सिंबल बन गया।
साल 2000 में जहां कंपनी सालभर में मुश्किल से 25,000 बाइक्स बेच पाती थी, वहीं आज रॉयल एनफील्ड हर साल 8 लाख से ज्यादा बाइक्स बेचती है। आज रॉयल एनफील्ड सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप और लैटिन अमेरिका जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ‘मिड-साइज (250cc-750cc)’ सेजमेंट की लीडर बन चुकी है।
वर्तमान में आयशर मोटर्स के प्रबंध निदेशक और सीईओ सिद्धार्थ लाल का 2015 में दिल्ली से लंदन शिफ्ट हो गए जो उनकी व्यावसायिक रणनीति का हिस्सा था।
सिद्धार्थ लाल का मानना था कि रॉयल एनफील्ड भारत में एक बड़ा नाम बन चुका है, लेकिन अगले 10-15 वर्षों में इसे ‘ग्लोबल मिड-साइज मोटरसाइकिल किंग’ बनाना है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों की सांस्कृतिक बारीकियों और ग्राहकों की पसंद को करीब से समझना बेहद जरूरी है। रॉयल एनफील्ड मूल रूप से एक ब्रिटिश ब्रांड था, जो 1901 में इंग्लैंड में शुरू हुआ था और बाद में वहां बंद हो गया लेकिन भारत में जीवित रहा। सिद्धार्थ लाल के अनुसार, जब दुनिया के अन्य हिस्सों के लोग बुलेट खरीदते हैं, तो वे एक भारतीय कंपनी से दरअसल एक ‘ब्रिटिश विरासत’ खरीद रहे होते हैं। इस विरासत को फिर से मजबूत करने के लिए वे इसके मूल स्थान ब्रिटेन पहुंचे।
रॉयल एनफील्ड के इंग्लैंड के लेसिस्टरशायर स्थित यूके टेक्निकल सेंटर द्वारा विकसित की गई सबसे खास और गेम-चेंजर मोटरसाइकिल्स “650 ट्विन बाइक्स” हैं। इनमें मुख्य रूप से दो बाइक्स शामिल हैं: Interceptor 650 और Continental GT 650। यह रॉयल एनफील्ड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बाइक्स हैं, क्योंकि इनके जरिए कंपनी ने कई दशकों बाद आधुनिक ट्विन-सिलेंडर सेगमेंट में वापसी की है। कंपनी ने दो पहिया वाहनों के मिड सेगमेंट में वैश्विक बाजार में अपने दस्तक दे दी है।
फोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, आज इस परिवार की कुल संपत्ति 11 अरब डॉलर करीब 90,000 करोड़ रुपये से अधिक है। वे भारत के सबसे अमीर ऑटोमोबाइल परिवारों में से एक हैं
