ईश्वर चंद्र नंदा जो आई. सी. नंदा के नाम से प्रसिद्ध हुए, वे भारत के एक जाने-माने शिक्षाविद् और नाटककार थे जिन्हें आधुनिक पंजाबी नाटक और रंगमंच का जनक माना जाता है। उनका जन्म 30 सितंबर 1892 को पंजाब के गुरदासपुर जिले के गांधीयां गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला भागमल था।
नंदा का झुकाव बचपन से ही लोक कलाओं और नाटकों की तरफ था। वे ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली रासलीला और रामलीला को बड़े चाव से देखते थे, जिसने उनके भीतर नाटककार बनने के बीज बोए। नंदा पढ़ाई में शुरू से ही बेहद होनहार और कुशाग्र छात्र थे। उन्होंने वर्ष 1905 में अपनी प्राथमिक परीक्षा पूरे जिले में पहला स्थान प्राप्त करके पास की। इसके बाद 1911 में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी और स्कॉलरशिप के साथ उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा के लिए वे लाहौर चले गए, जहाँ उन्होंने दयाल सिंह कॉलेज से बी.ए. ऑनर्स की डिग्री पूरी की जहाँ वे आयरिश रंगमंच की प्रणेता नोरा रिचर्ड्स के छात्र थे।
नोरा रिचर्ड्स ने कॉलेज में एक नाटक प्रतियोगिता आयोजित की थी।इस प्रतियोगिता के लिए नंदा ने अपना ऐतिहासिक एकांकी नाटक ‘दुल्हन’ (सुहाग) लिखा। उनके इस नाटक को प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला और यहीं से पंजाबी यथार्थवादी रंगमंच की नींव पड़ी।
इसके बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया जिसमें उन्होंने पूरी यूनिवर्सिटी में प्रथम स्थान हासिल किया।

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ गए। वे अपने ही पुराने संस्थान दयाल सिंह कॉलेज, लाहौर में अंग्रेजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए और 15 अगस्त 1947 को अपनी सेवानिवृत्ति तक इसी कॉलेज में छात्रों को पढ़ाते रहे। 1947 में भारत के विभाजन के बाद वे नई दिल्ली में बस गए जहाँ अपने जीवन का अंतिम समय तक लेखन कार्य करते रहे।

ईश्वर चंद्र नंदा ने कई पूर्ण-लंबाई वाले नाटकों और एकांकियों की रचना की। उनके प्रसिद्ध नाटकों में ‘सुभद्रा’ ‘लिली दा वियाह’ और उनके द्वारा लिखा गया पहला एकांकी ‘दुलहन’ शामिल है जिसे पंजाबी का पहला आधुनिक नाटक/एकांकी माना जाता है।
उनके अन्य प्रमुख नाटक सुहाग (1913), बेबे राम भजनी (1914), शामू शाह (1928), सोशल सर्कल (1953) व तीन अन्य एकांकी नाटक थे।
सुभद्रा (1920): यह उनका पहला पूर्ण लंबाई (Full-length) का नाटक था, जिसमें विधवा पुनर्विवाह की वकालत की गई थी।
शामू शाह (1928): यह प्रसिद्ध पश्चिमी लेखक शेक्सपियर के नाटक ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का पंजाबी रूपांतरण था, जिसमें ग्रामीण ऋणग्रस्तता को दिखाया गया था।
वर घर या लिली दा ब्याह (1928): इस नाटक में उन्होंने पारंपरिक अरेंज मैरिज के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह और युवाओं के विचारों का समर्थन किया।
सोशल सर्कल (1949/1953): शहरी और मध्यमवर्गीय समाज की विसंगतियों पर कटाक्ष करता नाटक।
लेखन शैली और विशेषताएं: उन्होंने पारंपरिक धार्मिक और लोक नाटकों (जैसे रासलीला) से हटकर रोजमर्रा की सामाजिक समस्याओं को रंगमंच पर उतारा।
आम बोलचाल की भाषा: उनके पात्र आम पंजाबियों द्वारा बोली जाने वाली सरल, मुहावरेदार और ‘माझी’ उपभाषा का प्रयोग करते थे, जिससे नाटक बेहद जीवंत लगते थे।
नोरा रिचर्ड्स का प्रभाव: लाहौर के दयाल सिंह कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे आयरिश रंगमंच की प्रणेता नोरा रिचर्ड्स के संपर्क में आए जिन्होंने नंदा को पंजाबी में नाटक लिखने के लिए प्रेरित किया।
आई. सी. नंदा ने अपने नाटकों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे बाल विवाह, दहेज प्रथा, अनमेल विवाह और अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किया। उनके नाटक रूढ़िवादी सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों और आधुनिक, शिक्षित युवाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाते हैं।

3 सितंबर 1965 को इस महान नाटककार और साहित्यकार का निधन हो गया, लेकिन उनके सामाजिक सुधारवादी नाटक आज भी पंजाबी अकादमी और थिएटर जगत में बड़े सम्मान के साथ पढ़ाए और खेले जाते हैं।