आज 26 जुलाई, भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम पृष्ठ है, जब वर्ष 1999 में भारत माँ के वीर सपूतों ने हिम-शिखरों की दुर्गम ऊँचाइयों पर अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान की अमर गाथा लिखी। यह वही दिवस है जब माँ भारती के मस्तक पर विजय-तिलक लगा और कारगिल की चोटियाँ एक बार पुनः तिरंगे की छाया में गौरवान्वित हुईं।

‘कारगिल विजय दिवस’ केवल एक युद्ध-विजय का उत्सव नहीं, अपितु उन अमर प्राणों के स्मरण का पावन पर्व है, जिन्होंने हाड़ कँपा देने वाली ठंड, दुर्भेद्य चट्टानों और शत्रु की गोलियों की बौछारों के बीच भी मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। पंजाबी समाज के वीर चक्र विजेता कैप्टन विजयंत थापर, परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा और महावीर चक्र विजेता कैप्टन अनुज नायर उन बलिदानियों में सम्मिलित थे जिन्होंने क्रमशः 23- 24-25 वर्ष की अल्प आयु में कारगिल युद्ध में अपना सर्वोच्च बलिदान इस देश और भूमि के लिए दिया और अपने समाज को भी गौरवान्वित किया।

उनके ऋण को शब्दों में चुकाया नहीं जा सकता, केवल श्रद्धा से स्मरण किया जा सकता है।

आइए, आज संकल्प लें — हम राष्ट्र को प्रथम रखेंगे, कर्तव्य-पथ पर अडिग रहेंगे।

जय हिंद! जय भारत!