डॉ. सतीश धवन (25 सितंबर 1920 – 3 जनवरी 2002) एक प्रख्यात भारतीय गणितज्ञ और एयरोस्पेस इंजीनियर थे, जिन्हें भारत में प्रायोगिक द्रव गतिकी (Experimental Fluid Dynamics) अनुसंधान का जनक माना जाता है। 1972 से 1984 तक इसरो (ISRO) के तीसरे अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का मार्गदर्शन किया और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
सतीश धवन का जन्म 25 सितंबर 1920 को श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर) में हुआ था। उनके पिता देवीदयाल धवन (राय बहादुर देवीदयाल) पेशे से एक वकील थे और बाद में लाहौर हाई कोर्ट में न्यायाधीश बने। उनकी माता का नाम लक्ष्मी खोसला था। वे अपने माता-पिता के दूसरे पुत्र थे। देश के विभाजन के समय उनका परिवार लाहौर से विस्थापित होकर पहले शिमला और फिर दिल्ली में आकर बसा था।
उनका विवाह डॉ. नलिनी निरोदी से हुआ था। वो स्वयं एक अत्यंत प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और कोशिका आनुवंशिकीविद् थीं. उन दोनों की मुलाकात भारतीय विज्ञान संस्थान के परिसर में ही हुई थी। डॉ. सतीश धवन और नलिनी धवन के तीन बच्चे हैं, जिनमें से उनकी बेटी ज्योत्सना धवन विज्ञान के क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं
उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से कला और इंजीनियरिंग में कई डिग्रियां हासिल कीं, जिनमें गणित में बीए, अंग्रेजी साहित्य में एमए और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई शामिल है। इसके बाद, उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय अमेरिका से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में एमएस और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
1951 में, डॉ. धवन बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग विभाग में शामिल हुए। यहाँ उन्होंने भारत की पहली सुपरसोनिक पवन सुरंग (Supersonic Wind Tunnel) स्थापित की। 1962 में वे आईआईएससी के सबसे युवा निदेशक बने और 1981 तक इस पद पर रहे।
1972 में डॉ. विक्रम साराभाई के निधन के बाद, डॉ. धवन ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्यक्ष का पदभार संभाला और 1984 तक इस पद पर रहे। वे अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग में भारत सरकार के सचिव भी थे।
प्रो. सतीश धवन के नेतृत्व में इसरो ने असाधारण विकास किया। उन्होंने ग्रामीण शिक्षा, सुदूर संवेदन और उपग्रह संचार में अग्रणी प्रयोग किए। उन्होंने इन्सैट- एक दूरसंचार उपग्रह, आर्यभट्ट’ (भारत का पहला उपग्रह) तथा ‘रोहिणी आरएस-1’ आई.आर.एस. – भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह भास्कर, एप्पल और रोहिणी का सफल प्रक्षेपण हुआ और ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी.एस.एल.वी.) जैसी परिचालन प्रणालियों का नेतृत्व किया जिसने भारत को अंतरिक्ष में जाने वाले देशों के लीग में रखा। उन्होंने श्रीहरिकोटा में लॉन्च फैसिलिटी स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने नेतृत्व कला का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। जब 1979 में पहला SLV-3 मिशन असफल हुआ तो उन्होंने विफलता की जिम्मेदारी खुद ली और जब 1980 में मिशन सफल हुआ तो उन्होंने इसका पूरा श्रेय कलाम और उनकी टीम को दिया। भारत के राष्ट्रपति रहे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम उन्हें गुरु स्वरूप मानते थे।
विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म भूषण और 1981 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
प्रोफेसर धवन व्यस्त दिनचर्या के बावजूद रविवार का दिन अपने बच्चों और परिवार के साथ कला, पेंटिंग और रचनात्मक गतिविधियों में बिताना पसंद करते थे। 3 जनवरी 2002 को बेंगलुरु में उनका निधन हो गया। उनके सम्मान में, भारत सरकार ने श्रीहरिकोटा स्थित लॉन्च सेंटर का नाम बदलकर ‘सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र’ (SDSC) कर दिया।