आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा था, इसी दौरान अगस्त 2021 में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने सरदार वल्लभ भाई पटेल कांफ्रेंस हॉल, 6, मौलाना आजाद रोड, नई दिल्ली में एक सार्वजनिक समारोह में देश के एक गुमनाम नायक पर स्मृति डाक टिकट जारी किया, जिस पर नाम लिखा था ‘माननीय चमन लाल’। इस दौरान केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने चमन लाल से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बताया कि मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने अपने पुत्र के विवाह में उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में पोर्ट लुई बुलवाया था और शादी में तब तक देरी की, जब तक चमन लाल वहां पहुंच नहीं गए। इतना सम्मान विदेश में पाने वाले आम भारतीय विरले ही होंगे।
इस मौके पर जारी प्रेस रिलीज में पीआईबी ने चमन लाल के बारे में लिखा कि, “सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में 25 मार्च, 1920 को जन्मे माननीय चमन लाल कम उम्र से ही लोगों के कल्याण के लिए काम करने के लिए उत्साहित थे। यद्यपि वह स्वर्ण पदक विजेता थे और उन्हें कई नौकरियों के प्रस्ताव भी मिले थे, लेकिन उन्होंने भारत विभाजन के पीड़ित लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के काम को चुना। अपनी लगन, जुनून और कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने विदेशों में बसे भारतीयों की मदद के लिए एक संस्थागत व्यवस्था की और भारत की विदेश नीति के विभिन्न रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई”।
आपके मन में सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर कौन थे ये चमन लाल और उनका संघ से क्या रिश्ता था? दुनिया भर में फैले स्वयंसेवकों को एक सूत्र में जोड़ने वाले चमनलाल जी का जन्म 25 मार्च, 1920 को ग्राम सल्ली (स्यालकोट, वर्तमान पाकिस्तान) में जमीनों का लेनदेन करने वाले धनी व्यापारी बुलाकीराम गोरोवाड़ा जी के घर में हुआ था। वे मेधावी छात्र और कबड्डी तथा खो-खो के उत्कृष्ट खिलाड़ी थे। गणित में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरा शहर मानता था। वर्ष 1942 में उन्होंने लाहौर से स्वर्ण पदक के साथ वनस्पति शास्त्र में एमएससी की डिग्री हासिल की।
चाहते तो चमन लाल विदेश पढ़ने चले जाते, या किसी भी बिजनेस में किस्मत आजमाकर देश की प्रमुख हस्तियों में शामिल हो जाते लेकिन उनका मन तो देश सेवा का था। सो पहले संघ शाखा से जुड़े, ये 1936 की बात है। बीच में मन भटका तो गांधीजी के भी शिष्य बनने चले गए। 1940-41 में वे गांधी जी के वर्धा स्थित सेवाग्राम आश्रम में भी रहे, पर वहां उनका मन नहीं लगा और वे वापस लाहौर आ गए।
विभाजन के उस नाजुक वातावरण में 1942 में लाहौर से चमनलाल जी सहित 52 युवक प्रचारक बने। उन्हें सर्वप्रथम मंडी (तत्कालीन पंजाब, वर्तमान हिमाचल) में भेजा गया। वहां सैकड़ों किमी की यात्रा पैदल की और दुर्गम क्षेत्रों तक संपर्क कर काफी स्थानों पर शाखाएं शुरू कीं। वर्ष 1946 में उन्हें लाहौर बुला लिया गया। विभाजन के भय से हिन्दू गांव छोड़कर शहरों में आ रहे थे। चमनलाल जी ने वहां सब व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संभाला। अपनी डायरी में वे हर दिन की घटना लिखते रहते थे। उनकी यही डायरियां अब संघ इतिहास लिखने वालों के लिए प्रमुख सूचना और संदर्भ श्रोत बन गई हैं। 1947 के बाद वे लाहौर से जालंधर आ गए थे।
तब उनको क्या पता था कि जिन गांधीजी के आश्रम में वो रह कर आए हैं, एक दिन उन्हीं की हत्या के आरोप में 4 महीने जेल में रहना पड़ेगा। हालांकि उन पर सीधा हत्या का आरोप नहीं था, लेकिन चूंकि संघ पर प्रतिबंध लगा था, सो उनको भी 4 महीने के लिए अम्बाला जेल भेज दिया गया था।
1950 में दिल्ली आ गये। उस समय कार्यालय के नाम पर वहां एक खपरैल का कमरा ही था। चमनलाल जी झाड़ू लगाने से लेकर आगंतुकों के लिए चाय आदि स्वयं ही बनाते थे। धीरे-धीरे कार्यालय का स्वरूप वो सुधारते चले गए और एक दिन संघ के दिल्ली कार्यालय यानी झंडेवाला कार्यालय को उनके नाम से जाना जाने लगा। आज अगर वो जीवित होते तो उस कार्यालय के नए, भव्य और विशाल रूप को देखकर हैरान ही रह जाते। विदेश में बस गये स्वयंसेवक प्रायः दिल्ली आते थे। उनके नाम, पते, फोन नंबर आदि चमनलाल के पास सुरक्षित रहते थे। इस प्रकार वे दुनिया में स्वयंसेवकों के बीच संपर्क सेतु बन गये। उन्होंने कई देशों का प्रवास कर इस सूत्र को सबल बनाया।
विदेश जाते समय सब उनसे वहां के पते लेकर जाते थे। वे उनके पहुंचने से पहले ही पत्र एवं फोन द्वारा सब व्यवस्था करा देते थे। विश्व भर से कब, कहां से, किसका फोन आ जाए, कहना कठिन था। इसलिए वे बेतार फोन को सदा पास में रखते थे। लोग हंसी में फोन को उनका बेटा कहते थे। झंडेवाला कार्यालय में गुरु गोलवलकर से मिलने कई प्रमुख लोग आते थे। चमनलाल जी उस बातचीत के बिन्दु उसी तरह लिख लेते थे, जैसे आज मीटिंग के मिनट्स लिख लिए जाते हैं। कम ही लोगों को पता है कि कश्मीर आंदोलन के समय गुरु गोलवलकर ने चमनलाल के हाथ एक पत्र भेजकर डॉ। मुखर्जी को सावधान किया था।
संघ के इतिहास में उनका कुछ योगदान तो वाकई में बहुत अहम है। संघ के प्रमुख प्रकाशन, पत्र, पत्रिकाएं, बैठकों में पारित प्रस्ताव आदि वे सुरक्षित रखते थे। इसमें से ही संघ का अभिलेखागार और कई महत्वपूर्ण पुस्तकें बनीं। कपड़े स्वयं धोकर, बिना निचोड़े सुखाने और बिना प्रेस किये पहनने वाले चमनलाल जी का जीवन इतना सादा था कि 1975 में जब पुलिस संघ कार्यालय पर आई, तो वे उनके सामने ही बाहर निकल गये। पुलिस वाले उन्हें पहचान ही नहीं सके।
संघ कार्यालय दिल्ली में रहकर भी उन्होंने पूरी दुनियां में जो सम्पर्क बनाए थे, उनका एक फायदा आपात काल में भी मिला। अपनी छोटी टाइपिंग मशीन पर वो भारत में आपातकाल के दौरान हो रहे अत्याचारों की सूचनाएं, समाचार लिखकर दुनियां भर के अखबारों, एजेंसियों के दफ्तरों में भेज दिया करते थे। जाहिर है कई बार उनका असर भी होता था।
फरवरी, 2003 में वे मुंबई में विश्व विभाग के एक कार्यक्रम में गये थे. कई दिन से उनका स्वास्थ्य खराब था. आठ फरवरी को स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. दो दिन तक संघर्ष करने के बाद 10 फरवरी को विश्व विभाग का यह पथिक अनंत की यात्रा पर चल दिया लेकिन उनकी मेहनत आज भी संघ पर शोध करने वालों के बहुत काम आ रही है।
