हरभजन सिंह बेदी कुवैत के इतिहास में एक ऐसा नाम है, जिन्होंने आपदा के समय मानवता और नेतृत्व की मिसाल पेश की। वे 1990 के कुवैत संकट (खाड़ी युद्ध) के दौरान वहाँ फँसे 1,70,000 भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकालने वाले (World’s Largest Civilian Airlift) मुख्य नायकों में से एक थे। उनकी मदद से कुवैत पर आक्रमण के दौरान 13 अगस्त से 11 अक्टूबर 1990 तक भारतीयों को कुवैत से हवाई मार्ग से निकाला गया था। प्रमुख दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया ने मैं भी इस समाचार को विस्तार से प्रकाशित किया था।
हरभजन सिंह बेदी ने मथुन्नी मैथ्यूज के साथ मिलकर बगदाद में भारतीय राजदूत के सहयोग से इराकी ट्रांसपोर्टरों, भारतीय अधिकारियों और संयुक्त राष्ट्र के साथ समझौता करके हजारों भारतीयों को बगदाद के रास्ते बस द्वारा अम्मान ले जाने की देखरेख करके निकासी अभियान के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राजा कृष्ण मेनन द्वारा निर्देशित 2016 की फिल्म ‘ एयरलिफ्ट ‘ इसी सच्ची घटना पर बनी थी जिसमें अक्षय कुमार का ‘रंजीत कत्याल’ वाला किरदार काफी हद तक उनके और माथुनी मैथ्यूज के जीवन को मिलाकर बनाया गया था।

इस प्रयास के परिणामस्वरूप, एयर इंडिया ने नागरिक विमान द्वारा सबसे अधिक लोगों को निकालने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। इसे इतिहास का सबसे बड़ा नागरिक निकासी अभियान माना जाता है। कुवैत में रहने वाले भारतीयों ने भी निकासी प्रयासों में सहायता की।
हरभजन सिंह बेदी का जन्म 1 सितंबर 1937 को लायलपुर में हुआ था। 1947 में भारत के विभाजन के समय उनका परिवार सब कुछ खोकर दिल्ली आ गया। शुरुआती दिन बेहद तंगहाली में बीते। बताया जाता है कि उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई पूरी की और वे एक काबिल आर्किटेक्ट बने। कुछ समय बाद वे कुवैत चले गए। अपनी प्रतिभा के दम पर वे जल्द ही कुवैत के शासक अल-सबाह परिवार और वहाँ के शेखों के बेहद करीबी सलाहकार बन गए। उन्होंने कुवैती शाही परिवार के लिए कई आलीशान विला और बड़े प्रोजेक्ट्स का निर्माण किया।

2 अगस्त 1990 को सद्दाम हुसैन की इराकी सेना ने अचानक कुवैत पर कब्जा कर लिया, तो कुवैत के अमीर (शासक) खुद अपनी जान बचाकर सऊदी अरब भाग गए। पूरा देश युद्ध की आग में झुलस रहा था और वहाँ रह रहे 1.7 लाख भारतीय बेघर और बेसहारा हो गए। इस भयानक माहौल में जहाँ हर कोई कुवैत से भागने का रास्ता ढूंढ रहा था, हरभजन सिंह ने वहीं रुककर अपने देशवासियों की मदद करने का फैसला किया।
उन्होंने माथुनी मैथ्यूज के साथ मिलकर 51 सदस्यों की एक ‘इंडियन सिटिजन्स कमेटी’ (ICC) बनाई, जिसमें बेदी को मुख्य समन्वयक (Convenor and Secretary for Coordination) चुना गया। बेदी के शाही रसूख और कूटनीतिक समझ के कारण उन्हें इराक के अधिकारियों से सीधे बात करने का मौका मिला। उन्होंने इराकी सैनिकों से भारतीयों की सुरक्षा का आश्वासन लिया और फँसे हुए लोगों के लिए भोजन-पानी के कैंप लगवाए।
जब भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री आई.के. गुजराल हालात का जायजा लेने बगदाद पहुंचे, तो बेदी और मैथ्यूज के दल ने उनसे मुलाकात की। गुजराल साहब ने बेदी की क्षमता को देखते हुए उन्हें विशेष अधिकार दिए, जिसके तहत वे खुद भारतीयों के लिए अस्थायी पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज जारी और साइन कर सकते थे।
कुवैत का हवाई मार्ग पूरी तरह बंद था। बेदी और उनकी टीम ने इराकी ट्रांसपोर्टर्स से डील की और हजारों भारतीयों को बसों के जरिए सुरक्षित रूप से बगदाद होते हुए जॉर्डन की राजधानी अम्मान पहुँचाया, जहाँ से ‘एयर इंडिया’ ने उन्हें भारत लिफ्ट किया।
इतने बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद भी हरभजन सिंह बेदी ने कभी पब्लिसिटी या क्रेडिट की चाह नहीं रखी। वे देश लौटने के बजाय वापस कुवैत में ही बस गए और समाज सेवा करते रहे। 24 अगस्त 2013 को 75 वर्ष की आयु में कुवैत में ही उनका निधन हो गया। भारतीय समुदाय उन्हें एक ऐसे ‘संकटमोचक’ के रूप में याद रखता है जिसने अपनी अरबों की संपत्ति और जान दांव पर लगाकर हजारों अनजान देशवासियों को नया जीवन दिया था।