पंजाबियों की कुलदेवी हिंगलाज माता पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक प्राकृतिक गुफा में विराजित है जिन्हें हिंगुला देवी, हिंगुला की देवी, लाल देवी, कोट्टारी या कोटावी देवी, माता हिंगलाज अथवा हिंगलाज भवानी के नाम से पुकारा जाता है। मराठी और पाली/संस्कृत भाषा में सिन्दूर को हिंगुलक/हिंगुला/हिंगोला या हिंगुल कहते हैं।
हिंगलाज माता पंजाबियों के अतिरिक्त अन्य कई समुदायों की कुलदेवी भी हैं जिनमें मुख्य रूप से सिंधी समाज, क्षत्रिय, चारण, गढ़वी, राजपुरोहित (सैफाऊ, मनणा जागीरदार), ब्रह्मक्षत्रिय, बंजारा (लम्बाडी), पारजिया सोनी, भाऊसर, लोहाना और नाथ संप्रदाय के लोग शामिल हैं, जो उन्हें अपनी संरक्षक देवी मानते हैं।
मान्यता है कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में विभाजित कर दिया जो पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे और शक्तिपीठ बन गए। हिंगलाज माता मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां सती का “ब्रह्मरंध्र” (मस्तिष्क का पिछला हिस्सा) गिरा था। इस कारण इसे हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, हिंगलाज देवी ने हंगुल नामक राक्षस का वध किया, जिसके बाद इस स्थान का नाम हिंगलाज पड़ा।
हिंगलाज माता मंदिर का इतिहास 2000 वर्ष से भी पुराना माना जाता है। गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक, और दादा माखन जैसे संतों ने इस मंदिर में पूजा की थी।
माता का मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील में हिंगोल नदी, जो इस शुष्क परिदृश्य में जीवन रेखा के रूप में कार्य करती है, के पश्चिमी तट पर एक संकीर्ण घाटी में है। यह क्षेत्र हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अन्तर्गत आता है। इसकी दूरी अरब सागर से 19 कि॰मी॰ और कराची से 250 किलोमीटर है।
यह मंदिर एक छोटी प्राकृतिक गुफा के अंदर बना है, जिसमें कोई मानव-निर्मित मूर्ति नहीं है। एक छोटी शिला को हिंगलाज माता के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। यह शिला सिंदूर से लेपित रहती है। गुफा के अंदर एक मिट्टी की वेदी बनी है जहां भक्त पूजा-अर्चना करते हैं।देवी की आराधना के लिए ‘जय माँ हिंगलाज भवानी’ का उद्घोष किया जाता है। इन्हें सरस्वती का रूप भी माना जाता है।
मंदिर का प्राकृतिक परिवेश इसे और भी आकर्षक बनाता है। गुफा के आसपास सुरम्य पहाड़ियां, हिंगोल नदी और मड ज्वालामुखी (चंद्रकूप) जैसे प्राकृतिक चमत्कार हैं। मंदिर के पास गणेश देव, माता काली, गुरुगोरख नाथ धूनी, ब्रह्म कुण्ड, तीर कुण्ड, गुरुनानक खाराओ, रामझरोखा बैठक, चौरासी पर्वत पर अनिल कुंड, चंद्र गोप, खारिवर और अघोर पूजा जैसे कई अन्य पूज्य स्थल हैं जो तीर्थयात्रियों के लिए अतिरिक्त आकर्षण का केंद्र हैं।
मंदिर के आसपास के क्षेत्र में कई प्राचीन स्थल, जैसे जमदग्नि (परशुराम के पिता) का तपस्थल, इसकी ऐतिहासिकता को और बढ़ाते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं, जिसमें गरबा, कन्या भोज, और जागरण जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
हिंगलाज देवी से सम्बन्धित यह छंद वहां के हिंदुओं के लोकप्रिय है।
सातों द्वीप शक्ति सब रात को रचात रास।
प्रात:आप तिहु मात हिंगलाज गिर में॥
अर्थात् सातों द्वीपों में सब शक्तियाँ रात्रि में रास रचाती हैं और प्रात:काल सब शक्तियाँ भगवती हिंगलाज के गिर (पर्वत) में आ जाती हैं।
अन्य मान्यताएं:
मान्यता है कि यहां दर्शन करने से व्यक्ति को पूर्व जन्म के कर्मों का दंड नहीं भुगतना पड़ता।
रावण के वध के बाद भगवान राम ने ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यहाँ यात्रा की थी।
पांडवों ने भी अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ पूजा की थी।
इस मंदिर के पास ‘चंद्रगुप्त’ नाम के ज्वालामुखी है जिसे चमत्कारिक स्थान मानते है। यहाँ नारियल चढ़ाने की परंपरा है।
मान्यता है कि भगवान परशुराम द्वारा क्षत्रियों का संहार करने के बाद बचे हुए क्षत्रियों ने हिंगलाज माता की शरण ली। माता ने उन्हें “ब्रह्मक्षत्रिय” बनाकर उनकी रक्षा की।
राम और रावण की यात्रा के सम्बन्ध मे मान्यता है कि भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए हिंगलाज माता की पूजा की और यहां यज्ञ किया।
मुस्लिम समुदाय की मान्यता
हिंगलाज माता मंदिर के प्रति स्थानीय मुस्लिम समुदाय में मान्यता है कि जो लोग इस पवित्र स्थान को नुकसान पहुँचाने या अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उन्हें माता के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार जब कुछ लोगों ने मंदिर को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया था तो उन्हें चमत्कारिक ढंग से दंड मिला था। अतः स्थानीय मुस्लिम समाज में एक अलौकिक शक्ति के प्रति डर-मिश्रित सम्मान (Awe and Reverence) है। वे इसे “नानी का मंदिर” या “नानी पीर” कहते हैं और मन्नतें पूरी होने पर यहाँ आते हैं। इसकी यात्रा को वे ‘नानी का हज’ कहते हैं।
हिंगलाज यात्रा पाकिस्तान में हिंदुओं की सबसे बड़ी तीर्थयात्रा है, जिसमें हर साल वसंत ऋतु में 2.5 लाख से अधिक भक्त हिस्सा लेते हैं। यात्रा की शुरुआत चंद्रकूप (मड ज्वालामुखी) से होती है, जहां भक्त नारियल और फूल चढ़ाते हैं। जब नारियल ऊपर आता है तो इसे माता का आशीर्वाद माना जाता है, और यात्री मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।
यह यात्रा अमरनाथ यात्रा से भी अधिक कठिन मानी जाती है, क्योंकि तीर्थयात्रियों को 55 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है, जिसमें 1000 फीट ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, जंगली जानवरों से भरे जंगल और 300 फीट ऊंचा मड ज्वालामुखी पार करना होता है। माता के मंदिर की यात्रा कठिन होने के कारण भक्तों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सुरक्षा के अभाव में तीर्थयात्री समूहों में यात्रा करते हैं। हालांकि 2007 में सड़क निर्माण के बाद यात्रा कुछ हद तक आसान हुई है।
अन्य स्थानों पर हिंगलाज माता मंदिर
भारत में भी कई स्थानों पर हिंगलाज माता को समर्पित मंदिर हैं लेकिन माता की शक्तिपीठ के रूप में बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता की मान्यता और उसके प्रति आस्था व श्रद्धा सर्वाधिक है।
छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश: यह भारत का एकमात्र प्राचीन हिंगलाज माता मंदिर माना जाता है, जो 1907 में कोयला खदान में मूर्ति मिलने के बाद स्थापित हुआ।
सालावास, जोधपुर, राजस्थान में स्थित माता के मंदिर में एक विशाल शिला है जो माता की एक उंगली पर टिकी मानी जाती है।
सिकराय, दौसा, राजस्थान में हिंगलाज माता का मंदिर स्थानीय भक्तों के बीच लोकप्रिय है।
जैसलमेर, राजस्थान में गड़ीसर तालाब के बीच बना मंदिर अपनी अनूठी स्थिति के लिए प्रसिद्ध है।
सिवाना, बाड़मेर, राजस्थान में इसे “छोटी हिंगलाज” कहा जाता है, जहां एक चमत्कारी पत्थर और अविरल जलधारा है।
हिंगलाज माता शक्तिपीठ तक पहुँचने के लिए, निकटतम हवाई अड्डा कराची अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जहां से आप हिंगलाज माता शक्तिपीठ तक सड़क मार्ग से यात्रा कर सकते हैं, जिसके लिए लगभग 4-5 घंटे लगते हैं। हवाई अड्डे पर टैक्सियाँ और किराए की कारें आसानी से उपलब्ध होती हैं जो हिंगलाज तक ले जाती हैं।
निकटतम रेलवे स्टेशन बेला रेलवे स्टेशन है जो कराची से लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन यहाँ से हिंगलाज तक सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध नहीं है। बेला पहुँचने के बाद शक्तिपीठ तक पहुँचने के लिए टैक्सी या बस किराए पर लेनी होगी जिसमें लगभग 2-3 घंटे लगते हैं। रेलवे स्टेशन पर टैक्सी और बसें आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी उपलब्धता और समय सारणी की जांच करना महत्वपूर्ण है।
यात्रा हेतु सबसे अच्छा समय सर्दियों के महीने (अक्टूबर से मार्च) होते हैं जब मौसम सुहावना होता है। गर्मियों में, तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है जिससे यात्रा करना मुश्किल हो सकता है जबकि सर्दियों में यह 10 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है।
हिंगलाज माता शक्तिपीठ में ठहरने की व्यवस्था सीमित है लेकिन यहाँ पर कुछ होटल और गेस्टहाउस उपलब्ध हैं जो यात्रियों को साफ सुथरे आवास तो प्रदान करते हैं लेकिन आधुनिक सुविधाएं नहीं मिलती हैं। हिंगलाज माता शक्तिपीठ के पास धर्मशालाएं भी उपलब्ध हैं जो यात्रियों को मुफ्त या कम कीमत पर केवल बुनियादी सुविधाओं से युक्त आवास प्रदान करती हैं।
