भाई मति दास सिख इतिहास के महानतम बलिदानियो में से एक हैं, जिन्होंने नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर के साथ अपनी आस्था और धर्म की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका जन्म तत्कालीन पंजाब (अब पाकिस्तान) के झेलम जिले के करियाला गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उनके पिता का नाम हीरा नंद था और वे भाई सती दास के बड़े भाई थे। उनका परिवार पीढ़ियों से गुरु घर से जुड़ा हुआ था।
वे गुरु तेग बहादुर के दरबार में एक महत्वपूर्ण पद (दीवान) पर कार्यरत थे।
जब औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा था, तब वे गुरु तेग बहादुर के साथ दिल्ली आए थे। इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर औरंगजेब ने उन्हें और उनके साथियों को मृत्युदंड सुनाया।
9 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में भाई मति दास को भयानक यातनाएं दी गईं।
उन्हें दो खंभों के बीच सीधा खड़ा करके बाँध दिया और उनके सिर पर आरा रखकर उनके शरीर को बीच से दो हिस्सों में चीर दिया गया।
कहा जाता है कि शरीर के दो टुकड़े होने के बावजूद उनके मुख से ‘जपुजी साहिब’ का पाठ सुनाई दे रहा था।
दिल्ली में उनके सम्मान में भाई मति दास सती दास संग्रहालय बनाया गया है जो उनकी वीरता और बलिदान की याद दिलाता है।
