बंदा सिंह बहादुर (1670-1716) उर्फ़/उपाख्य लक्ष्मण देव उर्फ़/उपाख्य लछमन दास उर्फ़/उपाख्य माधो दास बैरागी
27 अक्टूबर 1670 (या 16 अक्टूबर) को वर्तमान जम्मू-कश्मीर के राजौरी में एक राजपूत परिवार में उत्पन्न लक्ष्मण देव छोटी सी आयु में घर छोड़कर वैरागी बन गए नाम हुआ ‘माधो दास बैरागी’। नांदेड़ (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर मठ स्थापित कर पूजा पाठ में मगन। जीवन में यू टर्न आया जब 1708 में नांदेड़ आये दसवें सिख गुरू, गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट हुई।
एक योद्धा के जैसे शारीरिक सौष्ठव वाले अत्यंत बलशाली संन्यासी ने गुरुजी को आकर्षित किया। लगा कि यह व्यक्ति तो मुगलों के अत्याचारों से समाज के संग्रह में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
फिर कुछ समय और कुछ संवाद…
“देश का भाग्य बदलने की क्षमता रखने वाला केवल स्वयं के भाग्य, परलोक सुधारने के लिए प्रयत्नशील है तो देश तो गुलाम ही रहेगा…!”
बैरागी की आँखें खुलीं और बोला कि आप मेरे गुरू और मैं आपका बंदा। आप जो कहेंगे, सो मैं करूंगा…
और फिर गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर घोड़े की पीठ पर सवार, वो चल पड़ा पंचनद की ओर…
समाज में साहस और उत्साह जगा कर संघर्ष की राह पर ले जाने… मुगल सदा अपराजेय हैं, का मिथक मिटाने… समाज के सोए आत्मविश्वास जगाने… मृगों को सिंह बनाने… प्रथम सिक्ख राज्य स्थापित करने… एक नया इतिहास लिखने… गुरु दित्ता नामधारी ‘बंदा सिंह बहादुर’
उनके साथ में थे गुरु के दिए 25 बहादुर सिक्ख।
दुर्भाग्य से बंदा सिंह बहादुर को सीख देने के तुरंत बाद 1708 में गुरु गोविंद सिंह जी की नांदेड़ में ही सरहिंद के नवाब वजीर खान के भेजे पठानों ने हत्या कर दी। बन्दा को इससे बहुत धक्का पहुंचा लेकिन गुरु के सौंपे काम को परिणति तक पहुंचाने में वे कटिबद्ध रहे। बन्दा सिक्खों के आध्यात्मिक नेता तो नहीं थे, किन्तु गोविंद सिंह जी के जाने के बाद 1708 से 1716 ई. में मृत्यु पर्यन्त सिक्खों के राजनीतिक नेता रहे।
बंदा सिंह बहादुर ने नवंबर 1709 में सोनीपत के सरकारी खजाने को लूटकर मुगलों के खिलाफ पंजाब में अपना विजय अभियान शुरू किया। इसके बाद 26 नवंबर 1709 में समाना (पंजाब) पर आक्रमण कर सिक्ख राज की नींव रखी। फिर मई 1710 में गुरु बालकों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतह सिंह को दीवारों में चुनवाने वाले सरहिंद के नवाब वजीर खान को मार कर बदला लिया।
बन्दा बहादुर ने यमुना और सतलुज के प्रदेश को अपने अधीन कर लिया और पहाड़ियों के बीच मुखलिशपुर में लोहागढ़ नामक एक मज़बूत किला निर्मित कराया। किले के चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि से खाई खुदवाई और उसमें पानी भर दिया। इसके साथ ही राजा की उपाधि ग्रहण कर शुरुआत में ही क्रांतिकारी कदम उठाते हुए अपने राज्य में अति प्राचीन ज़मींदारी प्रथा का अन्त कर दिया था तथा किसानों को बड़े-बड़े जागीरदारों और ज़मींदारों की दासता से मुक्त कर दिया। सभी हल वाहक किसानों (जाट/जट्ट) को जमीन का मालिकाना हक़ दे दिया। गुरु नानक देव जी और गुरु गोविंद सिंह जी के नाम के सिक्के चलाए।
कुछ काल बाद सम्राट बहादुर शाह प्रथम (1707-1712 ई.) ने शीघ्र ही लोहगढ़ पर घेरा डालकर उसे अपने अधीन कर लिया लेकिन 1712 में अपनी मृत्यु तक सिखों के विद्रोह को पूरी तरह दबाने में विफल रहे। बन्दा तथा उसके अनेक अनुयायियों को बाध्य होकर शाह प्रथम की मृत्यु तक अज्ञातवास करना पड़ा।
1715-1716 में मुगल शासक फर्रुखसियर की सेना ने उन्हें गुरदासपुर (गुरुदास नंगल) में घेर लिया। गुरदास नांगल की हवेली में महीनों तक मुगलों द्वारा घेराबंदी के बाद भोजन और रसद का खत्म होना था। भूखे-प्यासे सैनिकों के मरने की स्थिति बनने और मुगलों के धोखे (संधि का झांसा) के कारण, उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होना पड़ा जिसके बाद उन्हें बंदी बना लिया गया।
फ़रवरी, 1716 में बन्दा बहादुर और उनके 794 साथियों को कैद करके दिल्ली ले जाया गया। उन्हें अमानुषिक यातनाएँ दी गईं। प्रतिदिन 100 की संख्या में सिक्ख फाँसी पर लटकाए गए।
फ़र्रुख़सियर के आदेश पर बंदा सिंह बहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए कठोर यातनाएं दी गईं। उन्होंने धर्म परिवर्तन से दृढ़ता से इनकार कर दिया तो उनके सामने उनके 4 वर्ष के पुत्र अजय को मार डाला गया और उसका कलेजा निकाल कर बंदा सिंह बहादुर के मुंह में ठूंसा गया। बंदा ने मुसलमान न्यायाधीश से कहा कि- “उनका यही हाल होना था, क्योंकि वे अपने प्यारे गुरु गोबिन्द सिंह की इच्छाओं को पूरा करने में नाक़ाम रहे।” उन्हें लाल गर्म लोहे की छड़ों से यातना देकर मार डाला गया। अंत में बंदा बहादुर की आँखें निकाल दी गईं, शरीर की खाल गर्म चिमटों से नोच ली गई, और उनके हाथ-पैर कर दिया गए। फिर 16 जून, 1716 ई. को हाथी से कुचलवाकर मार डाला गया।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बंदा सिंह बहादुर साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावनाओं से परे थे। मुसलमानों को उनके राज्य में पूर्ण धार्मिक स्वातन्त्र्य दिया गया था। पाँच हज़ार मुसलमान भी उनकी सेना में थे। बन्दा सिंह ने पूरे राज्य में यह घोषणा कर दी थी कि वह किसी प्रकार भी मुसलमानों को क्षति नहीं पहुँचायेंगे और वे सिक्ख सेना में अपनी नमाज़ पढ़ने और खुतवा करवाने में स्वतन्त्र होंगे।
बाबा बंदा बहादुर दिल्ली में महरौली के कुतुबमीनार के पास बलिदान हुए थे लेकिन जहाँ उनका अंतिम संस्कार हुआ, उस जगह बने बारापुला एलिवेटिड रोड का नाम बदलकर अब ‘बाबा बंदा बहादुर सेतु’ हो गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्ख वीर बंदा बहादुर के 300वें शहादत दिवस के मौके पर 2016 में उनके नाम पर चाँदी के सिक्के का लोकार्पण किया। साथ ही उन्होंने बन्दा सिंह पर लिखी किताब का भी लोकार्पण किया। पोस्टल विभाग ने बन्दा के नाम पर पोस्टल कवर भी
जारी किया।
विशेष: गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1708 में नांदेड़ में जब माधोदास को खालसा पंथ में दीक्षित किया तो गृहस्थ जीवन अपनाने का निर्देश दिया था। गुरु के आदेशानुसार उन्होंने कुंजपुरा के साहिब राय जी की बेटी सुशील कौर से विवाह किया था जिससे उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।
