महाशय राजपाल का जन्म अमृतसर में सन् 1885 को लाला रामदास जी खत्री के घर हुआ था। राजपाल बचपन से ही प्रतिभावान, बुद्धिमान, परिश्रमी व धैर्यवान् थे। उनके बचपन में ही उनके पिताजी घर छोड़कर चले गए तो अपनी माता व छोटे भाई संतराम के भरण पोषण का दायित्व इन पर आ गया। उन्होंने जैसे तैसे मिडिल परीक्षा पास की और अमृतसर के हकीम फतेहचंद जी के पास ₹12 महीने की नौकरी प्रारंभ की।

स्वतंत्रता के पहले पंजाब में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था, हिन्दी के प्रकाशक तो नगण्य थे। अधिकतर पुस्तकें उर्दू या पंजाबी में प्रकाशित होती थीं। उस काल में महाशय राजपाल ने ‘आर्य पुस्तकालय’ नाम से आर्य साहित्य प्रकाशन का कार्य आरम्भ किया था तथा ‘सरस्वती आश्रम ग्रन्थमाला’ के रूप में एक से एक उत्तम पुस्तक-श्रृंखला जनता को भेंट की। इनके माध्यम से उन्होंने पंजाब में हिन्दी प्रकाशन का न केवल श्रीगणेश किया, बल्कि वे हिन्दी के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम बने।

महाशय राजपाल जी स्वयं अच्छे लेखक एवं कुशल सम्पादक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें स्वयं लिखीं तथा अन्य सुयोग्य लेखकों के लेखों तथा भाषणों को लिपिबद्ध करके और सम्पादित करके प्रकाशित किया। स्वामी श्रद्धानन्द के पत्र ‘सद्धर्म-प्रचारक’ में वे सहायक सम्पादक थे। कालान्तर में वे लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘प्रकाश’ के वर्षों सह-सम्पादक रहे। इसी पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में तब पदार्पण किया, जब इस व्यवसाय में संघर्ष और जोखिम अधिक था, पैसा कम। परन्तु उस काल में वही लोक प्रकाशन में आते थे, जो आदर्शवादी थे और अपनी धुन के पक्के, और जो पुस्तकों के माध्यम से सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना जगाना चाहते थे। श्रेष्ठ साहित्य के प्रकाशन के इतिहास में महाशय राजपाल का नाम सदा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उन्होंने न केवल वैदिक धर्म के बारे में, उत्तम साहित्य के प्रकाशन में नये-नये कीर्तिमान स्थापित किए वरन् समाज सुधार व राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के आन्दोलनों को बल प्रदान करते हुए सैकड़ों महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया।

1912 में लाहौर में महाशय राजपाल ने हिन्दी पुस्तकों के एक प्रकाशन संस्थान ‘राजपाल एण्ड सन्स’ की स्थापना की थी। आरम्भ में इस प्रकाशन ने हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी तथा पंजाबी भाषाओं में आध्यात्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित कीं।

महाशय राजपाल जी द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकों पर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। जुर्माने किए और ऐसी पुस्तकों के संस्करण भी जब्त कर लिए। इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान् भाई परमानन्द ने, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने काले पानी की सजा दी थी, इतिहास की अनेक पुस्तकें राष्ट्रीय दृष्टिकोण से लिखी थीं। ये सभी पुस्तकें राजपाल जी ने प्रकाशित की थीं। इनमें से ‘तारीख-ए-हिन्द’ (भारत का इतिहास) पुस्तक छपते ही जब्त की गई और मुक़दमा भी चला। इसी तरह एक अन्य पुस्तक ‘देश की बात’, जो हिन्दी में प्रकाशित हुई थी, उस पर बनारस के कोर्ट में मुकदमा चला। भाई परमानन्द की ‘कालेपानी के कारावास की कहानी’ और डॉ. सत्यपाल द्वारा लिखित ‘पंजाब-बीती अथवा जलियाँवाला बाग का हत्याकांड’, इत्यादि के प्रकाशन के कारण वे ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन बने।

उन्होंने ऐसे विषयों की पुस्तकों को हिन्दी में प्रकाशित करने का साहस भी किया, जो वर्जित थे। भारत में परिवार-नियोजन पर सबसे पहली हिन्दी पुस्तक ‘सन्तान संख्या का सीमा बन्धन’ उन्होंने प्रकाशित की थी। यह 300 पृष्ठों की सचित्र प्रामाणिक पुस्तक थी। ‘बर्थ कंट्रोल’ के लिए तब हिन्दी का कोई शब्द प्रचलित नहीं हुआ था, क्योंकि जनसाधारण में जन्म निरोध की न समझ थी और न ही उसकी उपयोगिता का ज्ञान था। पुस्तक प्रकाशित होने पर बावेला मचा था, कि पुस्तक का विषय ही अनैतिक है, आदि आदि।

उन्हीं दिनों मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें प्रकाशित की गईं- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’। उन दोनों पुस्तकों में योगेश्वर श्रीकृष्ण और महर्षि दयानन्द पर बहुत ही भद्दे और अश्लील शब्दों में कीचड़ उछाला गया था। महाशय राजपाल पक्के आर्य समाजी थे और विभिन्न मतों का अपनी पुस्तकों में तार्किक ढंग से खण्डन करते थे। इन दोनों पुस्तकों के प्रत्युत्तर में महाशय राजपाल जी ने ‘रंगीला रसूल’ नाम की पुस्तक सन् 1923 में प्रकाशित की। इस पुस्तक के लेखक के नाम के स्थान पर ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ लिखा था। वास्तव में इसके लेखक आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान पं. चमूपति थे जो सम्भावित प्रतिक्रिया के कारण अपना नाम नहीं देना चाहते थे। उन्होंने महाशय राजपाल जी से यह वचन ले लिया था कि चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां क्यों न बनें, वे किसी को भी उक्त पुस्तक के लेखक के रूप में उनका नाम नहीं बताएंगे।

1924 से 1929 तक के पाँच वर्षों के दौरान उन्हें अनेक बार यह कहा गया कि आप असली लेखक का नाम बता दें, तो हमें आपसे कोई शिकायत नहीं रहेगी। यह बात उस ज़माने के प्रमुख मुस्लिम दैनिक पत्र ‘ज़मींदार’ में भी प्रकाशित हुई थी, परन्तु महाशय राजपाल जी ने एक ही बात दोहराई थी कि इस पुस्तक के लेखन-प्रकाशन की पूरी जिम्मेदारी मेरी ही है, अन्य किसी की नहीं। उन्होंने जो वचन दिया, उसे अन्त तक निभाया। इन पाँच वर्षों के दौरान उन्हें यह भी कहा गया था कि आप इस पुस्तक का प्रकाशन बन्द कर दें और माफ़ी मांग लें। राजपाल जी ने एक ही उत्तर दिया कि “मैं विचार-स्वातंत्र्य और प्रकाशन की स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ और अपनी इस मान्यता के लिए बड़े से बड़ा दण्ड भुगतने के लिए तैयार हूँ।

1924 में छपी ‘रंगीला रसूल’ बिकती रही, पर किसी ने उसके विरुद्ध शोर न मचाया। फिर महात्मा गाँधी ने इस पुस्तक के विरुद्ध जून 1924 में अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखा। उन्होंने इस पुस्तक को अत्यंत अपमानजनक और भड़काऊ बताया। इस पर कट्टरवादी मुसलमानों ने महाशय राजपाल के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया। ब्रिटिश सरकार ने उनके विरुद्ध 153 ए धारा के अधीन अभियोग चला दिया। राजपाल जी को छोटे न्यायालय ने डेढ़ वर्ष का कारावास तथा 1000 रुपये का दण्ड सुनाया। इस निर्णय के विरुद्ध अपील करने पर दण्ड एक वर्ष तक कम कर दिया गया। इसके पश्चात् मामला हाई कोर्ट में गया जहां जस्टिस दिलीप सिंह की अदालत ने महाशय राजपाल को दोषमुक्त करार दे दिया।

मुस्लिम समुदाय इस निर्णय से भड़क उठा। ख़ुदाबख्श नामक एक पहलवान मुसलमान ने महाशय जी पर हमला कर दिया, जब वे अपनी दुकान पर बैठे थे। पर संयोग से आर्य संन्यासी स्वतंत्रानंद जी महाराज एवं स्वामी वेदानन्द जी महाराज वहां उपस्थित थे। उन्होंने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसे सात वर्ष का दण्ड मिला। रविवार 8 अक्टूबर, 1927 को स्वामी सत्यानन्द जी महाराज को महाशय राजपाल समझ कर अब्दुल अज़ीज़ नामक एक मतान्ध मुसलमान ने एक हाथ में चाकू, एक हाथ में उस्तरा लेकर आक्रमण कर दिया। उसे १४ वर्ष का दण्ड मिला ओर तदनन्तर तीन वर्ष के लिए शान्ति की गारन्टी का दण्ड सुनाया गया।

6 अप्रैल, 1929 को महाशय राजपाल अपनी दुकान पर विश्राम कर रहे थे, तभी इल्मदीन नामक एक मतान्ध मुसलमान ने महाशय जी की छाती में छुरा घोंप दिया, जिससे महाशय जी का तत्काल प्राणान्त हो गया।महाशय राजपाल जी ने प्रकाशन की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों की बलि दी। हत्यारा अपने प्राण बचाने के लिए भागा और महाशय सीताराम जी के लकड़ी के टाल में छुप गया। महाशय जी के सपूत विद्यारतन जी ने पकड़ पुलिस के हवाले किया। उसे लाहौर उच्च न्यायालय से फ़ाँसी की सजा हुई थी।

महाशय जी की हत्या का समाचार आग की तरह फैल गया। उनकी शवयात्रा में हजारों हिन्दू शामिल हुए। उनके बच्चे बहुत छोटे थे। महाशय जी की धर्मपत्नी सरस्वती जी ने कहा कि अपने पति के मारे जाने का मुझे बहुत दुख है; पर यह गर्व भी है कि उन्होंने धर्म और सत्य के लिए बलिदान दिया।

भारत के विभाजन के उपरान्त 1947 में महाशय जी के परिजन दिल्ली आकर प्रकाशन के काम में ही लग गये।और भारत के प्रमुख हिन्दी प्रकाशक के रूप में जाने जाने लगा। जून 1998 में दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने पहले ‘फ्रीडम टु पब्लिश’ पुरस्कार से स्वर्गीय राजपाल जी को सम्मानित किया। पुरस्कार उनके पुत्र विश्वनाथ जी ने ग्रहण किया।