पंडित रामरक्खा बाली (23 फरवरी 1884 – 27 मई, 1919)

पंडित राम रक्खा बाली (1884–1919) पंजाब के एक महान स्वतंत्रता सेनानी और ग़दर पार्टी के प्रमुख क्रांतिकारी थे। आपका जन्म 23 फरवरी 1884 को पंजाब के होशियारपुर जिले के ससोली गाँव में हुआ। आपके पिताजी का नाम श्री जवाहर राम बाली था।

आप गदर पार्टी के सदस्य थे। वे एक योजना के अंतर्गत बर्मा में फौजी टुकड़ियों में विद्रोह का कार्यान्वन कराने हेतु अपने तीन साथियों मुजतबा हुसैन, अमर सिंह और अली अहमद के साथ बर्मा गए। उन्होंने बर्मा के साथ साथ मलाया और सिंगापुर में भी ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों के बीच भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुँचाना शुरू किया। राम रक्खा जी ने बम बनाने के लिए बैंकॉक से आवश्यक सामग्री जुटाने का काम किया। रंगून में 1915 में बकरीद के दिन विद्रोह करने का निर्णय हुआ लेकिन हथियारों और गोला-बारूद की कमी के कारण अंतिम समय में इसे रद्द करना पड़ा। इसे एक बार क्रिसमस तक के लिए स्थगित किया गया लेकिन फिर यह कभी हो ही नहीं पाया। उनका मानना था कि एक बार क्रांति शुरू हो जाने पर जर्मन उनकी सहायता के लिए जल्द ही पहुँच जाएँगे।

वे बर्मा (मांडले) षड्यंत्र केस द्वितीय में नामजद हुए थे। पता लगने पर आप भूमिगत हो गए और आपको तुरन्त गिरफ्तार न किया जा सका। दो वर्ष पश्चात् गिरफ्तार होने पर तीन अन्य साथियों के साथ बर्मा षड्यंत्र केस के नाम से मुकदमा चला कर 6 जुलाई 1917 को आपको आजीवन कारावास की सजा दी गई। आप पहले मांडले और फिर रंगून जेल में रहे। तत्पश्चात् आपको फरवरी 1919 में सेल्युलर जेल, अंडमान भेज दिया गया जहां जेलकर्मियों द्वारा आपका जनेऊ हटाने का प्रयास किया गया जिसका आपने भरपूर विरोध किया लेकिन फिर एक दिन कई वार्डर और जेलकर्मियों ने मिल कर आपके जनेऊ को बलपूर्वक हटा दिया।

उसके विरोध में आपने आमरण अनशन आरम्भ कर दिया। यह अनशन 90 दिन तक चला और अन्त में मात्र 35 वर्ष की आयु में 27 मई, 1919, कुछ सूत्रों के अनुसार 22 दिसंबर 1919 को आपने प्राणोत्सर्ग किया। मृत्यु से पहले वे खून की उल्टी कर रहे थे लेकिन उन्हें जीवित रखने के लिए उन्हें जबरदस्ती कुछ भी नहीं खिलाया जा सका। आपके बलिदान से ही सेल्युलर जेल में कैदियों को जनेऊ पहने रहने का अधिकार प्राप्त हुआ।

स्वतंत्रता सेनानी विनायकये दामोदर सावरकर स्वयं पंडित राम रक्खा बाली के दृढ़ संकल्प और उनकी विचारधारा के मुरीद थे और उन्होंने अपनी जेल डायरी में उनके बलिदान का विस्तार से जिक्र किया है।

उनके साहस और देशप्रेम को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमिट अध्याय माना जाता है।