गुलज़ारीलाल नंदा
गुलज़ारीलाल नंदा भारत के इतिहास में दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने वाले एकमात्र राजनेता हैं। वे प्रख्यात अर्थशास्त्री और श्रम अधिकारों के बड़े पैरोकार थे। वह अपनी बेदाग ईमानदारी, अत्यंत सादा जीवन और गांधीवादी मूल्यों के लिए जाने जाते थे। उनके योगदानों के लिए उन्हें साल 1997 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया था।


उनका जन्म 4 जुलाई 1898 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में एक पंजाबी हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। उन्होंने लाहौर, अमृतसर, आगरा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे अर्थशास्त्र और श्रम समस्याओं के विशेषज्ञ थे। साल 1921 में वे बॉम्बे के नेशनल कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने। इसी वर्ष महात्मा गांधी से प्रेरित होकर वे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें 1932 और 1942-44 के दौरान जेल भी जाना पड़ा।


स्वतंत्र भारत के इतिहास में जब भी संकट की स्थिति आई, गुलज़ारी लाल नंदा ने देश की कमान संभाली। दोनों ही बार वे देश के गृह मंत्री थे और उन्होंने 13-13 दिनों के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई। पहली बार 27 मई 1964 – 9 जून 1964 के बीच भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आकस्मिक निधन के बाद वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। दूसरी बार 11 जनवरी 1966 – 24 जनवरी 1966 के मध्य ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद देश की राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए उन्हें दोबारा कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। दोनों ही बार कांग्रेस संसदीय दल द्वारा नया नेता क्रमशः लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी चुन लिए जाने के बाद वे गरिमा के साथ अपने पद से हट गए।


आजादी से पहले और बाद में 1946 से 1950 के बीच उन्होंने बॉम्बे सरकार में श्रम मंत्री के रूप में काम किया और ऐतिहासिक ‘श्रम विवाद विधेयक’ पास कराया।
उन्होंने भारत के शुरुआती दशकों की औद्योगिक और सामाजिक नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारत सरकार के योजना, सिंचाई एवं बिजली, श्रम और रोजगार तथा देश के गृह मंत्री (1963-1966) जैसे कई बड़े मंत्रालयों का कार्यभार संभाला।


गुलज़ारीलाल नंदा को भारत में श्रमिक अधिकारों का चैंपियन माना जाता है। वे लगभग 25 वर्षों (1922-1946) तक देश की सबसे पुरानी यूनियनों में से एक ‘अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन’ के सचिव रहे। उन्होंने भारत के सबसे बड़े मजदूर संगठनों में से एक ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई और इसके अध्यक्ष भी रहे।उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), जेनेवा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का खुलकर विरोध किया था, क्योंकि उनका मानना था कि लोकतंत्र की बलि देकर सत्ता चलाना गलत है।


उनका विवाह साल 1916 में लक्ष्मी देवी से हुआ था। लक्ष्मी देवी एक पारंपरिक और सादगी पसंद महिला थीं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक व्यस्तताओं के दौरान नंदा जी का पूरा साथ दिया। उनकी तीन संतानें हुईं जिनमें दो बेटे, महेन्द्र नंदा और नरेन नंदा तथा एक बेटी पुष्पा बेन (पुष्पा त्रिवेदी) जिनका विवाह गुजरात के अहमदाबाद में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। जीवन के अंतिम पड़ाव में जब गुलज़ारीलाल नंदा दिल्ली का किराए का मकान छोड़कर अहमदाबाद चले गए थे, तब वे अपनी बेटी पुष्पा बेन के घर पर ही रहे थे। पुष्पा जी और उनके परिवार ने ही अंतिम समय तक नंदा जी की पूरी देखभाल की थी।

वे आजीवन गांधीवादी रहे और उनकी जीवन शैली निष्कलंक रही। उन्होंने कभी निजी संपत्ति बनाने का सोचा भी नहीं। दो बार देश के शीर्ष पद पर रहने के बावजूद नंदा जी का जीवन किसी संत जैसा था। उन्होंने कभी भी राजनीति का लाभ अपने परिवार को नहीं लेने दिया। सरकारी गाड़ी या दफ्तर की स्टेशनरी तक का इस्तेमाल उनके परिवार के लिए वर्जित था।

जब गुलज़ारीलाल नंदा देश के गृह मंत्री और कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे, तब उनका एक बेटा नौकरी की तलाश में था। बेटे ने एक निजी कंपनी में इंटरव्यू दिया। कंपनी के मालिक को जब पता चला कि यह देश के गृह मंत्री का बेटा है, तो उसने तुरंत उसे ऊंचे पद और भारी वेतन पर नौकरी का ऑफर दे दिया।जब यह बात नंदा जी को पता चली, तो उन्होंने बेटे को बुलाकर कहा— “तुम्हें यह नौकरी तुम्हारी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि मेरे पद के कारण मिल रही है। यह एक तरह की रिश्वत है।” नंदा जी के कहने पर उनके बेटे ने तुरंत उस नौकरी को ठुकरा दिया और बाद में अपनी मेहनत से एक बहुत ही साधारण नौकरी की।

उनके पास अपनी मृत्यु के समय कोई निजी संपत्ति या बैंक बैलेंस नहीं था। वे अपनी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन और संसदीय भत्ते को भी सामाजिक कार्यों में दान कर देते थे।
देश के दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री रहे नंदा जी के पास जीवन के अंतिम पड़ाव में अपना कोई घर नहीं था और वे दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में किराए के मकान में रहते थे।


एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते नंदा जी को ₹500 प्रति माह की स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिलती थी, लेकिन उन्होंने शुरुआत में यह कहकर इसे लेने से मना कर दिया था कि “मैंने पैसों के लिए देश की आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी”।


बाद में दोस्तों के समझाने पर उन्होंने यह पेंशन स्वीकार की, क्योंकि उनके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं था। जीवन के अंतिम वर्षों में, जब वे लगभग 94 वर्ष के थे, महंगाई बढ़ने के कारण वे समय पर अपने मकान का किराया नहीं चुका पाए। उन्होंने अपने मकान मालिक को कभी भी अपना परिचय नहीं दिया था। लगातार किराया बाकी रहने के कारण गुस्साए मकान मालिक ने नंदा जी का सामान, जिसमें पुराना बिस्तर, कुछ एल्युमीनियम के बर्तन और बाल्टी थी, घर से बाहर निकाल दिया। बुजुर्ग नंदा जी ने मकान मालिक से कुछ समय मांगा लेकिन मकान मालिक सुनने को तैयार नहीं था। पड़ोसियों के हस्तक्षेप और समझाने के बाद मकान मालिक ने उन्हें अनिच्छा से थोड़ा और समय दिया, जिसके बाद सामान वापस अंदर रखा गया। संयोगवश उसी समय वहां से गुजर रहे एक पत्रकार ने इस मामले की कुछ तस्वीरें खींच लीं और जब उसने अपने संपादक को वो चित्र दिखाए तो संपादक दंग रह गए। अगले दिन देश के प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर हेडलाइन छपी— “भारत के पूर्व प्रधानमंत्री गुलज़ारीलाल नंदा जी रहे हैं दयनीय जीवन”। इस खबर ने पूरे देश और सरकार को झकझोर कर रख दिया। खबर छपते ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ने तुरंत मंत्रियों और अधिकारियों को नंदा जी के निवास पर भेजा। वीआईपी गाड़ियों के बेड़े को अपने घर के बाहर देखकर मकान मालिक के होश उड़ गए। जब उसे पता चला कि यह बुजुर्ग कोई मामूली इंसान नहीं बल्कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री हैं तो वह तुरंत नंदा जी के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए अपने दुर्व्यवहार के लिए माफी मांगी। अधिकारियों और मंत्रियों ने नंदा जी से हाथ जोड़कर अनुरोध किया कि वे तुरंत लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी बंगला और अन्य सुरक्षा सुविधाएं स्वीकार करें। नंदा जी ने मुस्कुराते हुए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा, “इस बुढ़ापे में मुझे इन सुख-सुविधाओं और बड़े बंगले की क्या आवश्यकता है? मैं एक आम नागरिक की तरह ही ठीक हूँ।”

बाद में वे दिल्ली छोड़कर अहमदाबाद में अपनी बेटी के पास चले गए और 15 जनवरी 1998 को 99 वर्ष की आयु में इस महान और ईमानदार देशभक्त ने अंतिम सांस ली।

अपनी मृत्यु के समय वे 19वीं शताब्दी में जन्मे अंतिम जीवित भारतीय राज्य नेता और नेहरू कैबिनेट के अंतिम जीवित सदस्य थे। उनकी याद में नई दिल्ली के प्रधानमंत्री संग्रहालय में उनके जीवन और राष्ट्रसेवा को विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया है।