4 जुलाई 1897 को जन्मे नानक सिंह सिर्फ एक लेखक नहीं थे। वह एक ऐसा नाम थे, जिसकी कलम ने अंग्रेज़ी हुकूमत को बेचैन कर दिया था। उनका असली नाम हंसराज था। जन्म आज के पाकिस्तान के झेलम ज़िले में एक गरीब पंजाबी हिंदू परिवार में हुआ। लेकिन आगे चलकर उन्होंने सिख धर्म अपनाया और नानक सिंह नाम से पहचाने गए। हैरानी की बात यह है कि जिस लेखक को आज पंजाबी उपन्यास का पितामह कहा जाता है, उसे औपचारिक शिक्षा बहुत कम मिली थी। फिर भी उनके शब्दों में इतनी आग थी कि अंग्रेज़ों ने उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगा दिया।
नानक सिंह की पढ़ाई बहुत सीमित रही। लेकिन उनकी असली पाठशाला समाज, संघर्ष और इंसान की पीड़ा थी। कम उम्र में ही उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं पर कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। आगे चलकर वे धार्मिक और सामाजिक चेतना से जुड़े गीत लिखने लगे। 1918 में उनकी पहली सफल पुस्तक “सतगुरु महिमा” प्रकाशित हुई। यह सिख गुरुओं की स्तुति में लिखे गए भजनों का संग्रह था। इस किताब ने उन्हें पाठकों के बीच पहचान दिलाई। लेकिन नानक सिंह केवल भक्ति तक सीमित रहने वाले लेखक नहीं थे। उनके भीतर समाज को देखने वाली बेचैन आंखें थीं और अन्याय के खिलाफ बोलने वाली निर्भीक आवाज़ थी।
13 अप्रैल 1919, बैसाखी का दिन। अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए जुटे थे। उसी दिन ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दीं। नानक सिंह उस नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। उनके दो मित्र उसी घटना में मारे गए। यह दृश्य उनके दिल पर हमेशा के लिए अंकित हो गया। यही दर्द आगे चलकर उनकी प्रसिद्ध कविता “खूनी वैसाखी” में फूट पड़ा। इस कविता में उन्होंने ब्रिटिश शासन की क्रूरता का मज़ाक उड़ाया और उसे खुली चुनौती दी। अंग्रेज़ी सरकार डर गई। किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन प्रतिबंध से विचार नहीं मरते। नानक सिंह का नाम और बड़ा हो गया।
नानक सिंह ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे अकाली आंदोलन से जुड़े और अकाली पत्रों के संपादन से भी जुड़े रहे। अंग्रेज़ी सरकार उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने लगी। उन्हें अवैध राजनीतिक गतिविधियों के आरोप में लाहौर की बोरस्टल जेल भेज दिया गया। जेल उनके लिए अंत नहीं बनी। वहीं उन्होंने लिखना जारी रखा। कहा जाता है कि जेल में भी उन्होंने गुरमुखी लिपि में हजारों पन्ने लिखे। उनकी रचनाएं केवल कहानी नहीं थीं। वे समय का दस्तावेज़ थीं। उनमें ब्रिटिश दमन, सामाजिक टूटन, धार्मिक पाखंड और इंसानी उम्मीद सब कुछ मौजूद था।
नानक सिंह ने गुरु का बाग मोर्चा के दौरान शांतिपूर्ण सिखों पर हुए अत्याचारों को अपनी कविता-संग्रह “ज़ख्मी दिल” में दर्ज किया। यह किताब जनवरी 1923 में प्रकाशित हुई और सिर्फ दो हफ्तों में ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। सोचिए, एक लेखक की कलम से सत्ता इतनी क्यों डरती थी? क्योंकि नानक सिंह सिर्फ शब्द नहीं लिखते थे। वे जनता की आवाज़ लिखते थे। उनकी कविता में शोक भी था, गुस्सा भी था और आज़ादी का सपना भी।
नानक सिंह को पंजाबी उपन्यास का पितामह माना जाता है। उन्होंने पंजाबी कथा-साहित्य को नई दिशा दी। उनकी कहानियों और उपन्यासों में आम आदमी की ज़िंदगी, समाज की सड़ांध, नैतिक पतन, प्रेम, त्याग और संघर्ष दिखाई देता है। उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं। इनमें उपन्यास, कहानियां, नाटक और कविताएं शामिल हैं। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन असर गहरा था। वे पात्रों को इस तरह गढ़ते थे कि पाठक उनके साथ जीने लगता था। यही कारण था कि वे दशकों तक भारत के सबसे लोकप्रिय लेखकों में गिने गए।
1945 में उनका प्रसिद्ध उपन्यास “पवित्र पापी” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उन्हें अपार लोकप्रियता दिलाई। बाद में इसका हिंदी और कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनके पोते नवदीप सिंह सूरी ने इसे अंग्रेज़ी में भी अनुवादित किया। 1970 में इसी कहानी पर फिल्म “पवित्र पापी” बनी। यह बताता है कि नानक सिंह की कहानियां सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं थीं। वे सिनेमा तक पहुंचीं और आम जनता के दिलों में जगह बनाती रहीं। उन्होंने दारा सिंह की पंजाबी फिल्म “नानक दुखिया सब संसार” के संवाद और पटकथा में भी योगदान दिया।
नानक सिंह का उपन्यास “चिट्टा लहू” समाज के नैतिक पतन पर तीखी चोट करता है। इसमें वे बताते हैं कि जब समाज का खून लाल नहीं रहता, जब उसमें संवेदना और नैतिकता मरने लगती है, तब मनुष्य बाहर से जीवित दिखता है लेकिन भीतर से खोखला हो चुका होता है। यह उपन्यास 1932 में प्रकाशित हुआ था, लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी चौंकाती है। इसमें धार्मिक पाखंड, सामाजिक बुराइयों और इंसानी कमजोरी की गहरी पड़ताल है। इस उपन्यास का रूसी अनुवाद भी हुआ और दिलचस्प बात यह है कि महान लेखक लियो टॉल्स्टॉय की पोती नताशा टॉल्स्टॉय ने इसे रूसी भाषा में अनुवादित किया।
नानक सिंह ने भारत विभाजन की त्रासदी को भी गहराई से महसूस किया। उनकी रचनाएं “खून दे सोहिले” और उसका आगे का विस्तार “A Game of Fire” उस दौर की सांप्रदायिक हिंसा, डर, टूटते रिश्तों और इंसानियत की परीक्षा को सामने लाते हैं। वे सिर्फ एक समुदाय की पीड़ा नहीं लिखते। वे पूरे समाज की आत्मा पर लगे घावों को लिखते हैं। उनकी रचनाओं में सवाल है कि जब नफरत आग बन जाती है, तब इंसान क्या बचाता है? बदला या इंसानियत? यही सवाल नानक सिंह को आज भी जरूरी लेखक बनाता है।
नानक सिंह को 1960 में पंजाब का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान मिला। उनके ऐतिहासिक उपन्यास “इक म्यान दो तलवारां” को 1962 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। यह भारत का बड़ा साहित्यिक सम्मान था। 1997 में उनकी जन्मशती मनाई गई। 1998 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। यह केवल एक लेखक का सम्मान नहीं था। यह उस कलम का सम्मान था, जिसने गुलामी, अन्याय और समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई।
नानक सिंह की कहानी हमें बताती है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं होता। साहित्य समाज का आईना भी होता है और कभी-कभी क्रांति की चिंगारी भी। एक गरीब परिवार में जन्मा बच्चा, जिसने बहुत अधिक औपचारिक शिक्षा नहीं पाई, आगे चलकर पंजाबी साहित्य का महान स्तंभ बना। जलियांवाला बाग ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि उसकी कलम को और धार दे दी। जेल ने उसे रोक नहीं पाया। प्रतिबंधों ने उसे छोटा नहीं किया। यही कारण है कि ऐसे भूले-बिसरे महान साहित्यकारों, कलाकारों और विचारकों की कहानियां आपके सामने लाता है, ताकि नई पीढ़ी जान सके कि भारत की असली विरासत सिर्फ इमारतों में नहीं, बल्कि शब्दों, संघर्षों और विचारों में भी बसी है।
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