डॉ. नरेंद्र सिंह कपानी भारत में जन्मे एक महान और विश्व प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी थे। उन्हें विज्ञान की दुनिया में “फादर ऑफ फाइबर ऑप्टिक्स” के रूप में जाना जाता है। Fortune पत्रिका ने उन्हें 1999 के विशेष अंक में “बिजनेसमैन ऑफ द सेंचुरी” के तहत ‘सात अनसंग हीरोज’ में से एक के रूप में नामित किया था।
उनका जन्म 31 अक्टूबर 1926 को मोगा में एक सिख परिवार में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन देहरादून में बीता और उन्होंने वहीं से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की। उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद, वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन चले गए जहां उन्होंने इम्पीरियल कॉलेज लंदन से ऑप्टिक्स में पीएचडी की डिग्री हासिल की। फाइबर ऑप्टिक्स का क्रांतिकारी आविष्कार विज्ञान की दुनिया में उनका योगदान अतुलनीय है, जिसने आज के आधुनिक इंटरनेट युग की नींव रखी।
लंदन में पढ़ाई के दौरान, साल 1954 में डॉ. कपानी ने दुनिया में पहली बार एक ऐसी तकनीक का प्रदर्शन किया जिसके जरिए प्रकाश को बिना किसी नुकसान के कांच के फाइबर केबल्स के माध्यम से मोड़ा और भेजा जा सकता था। उन्होंने ही सबसे पहले 1960 में साइंटिफिक अमेरिकन पत्रिका के एक प्रसिद्ध लेख में “फाइबर ऑप्टिक्स” शब्द का आविष्कार किया और इसे लोकप्रिय बनाया। आज पूरी दुनिया में जो हाई-स्पीड इंटरनेट चल रहा है, जो डेटा ट्रांसफर हो रहा है, या चिकित्सा के क्षेत्र में जो ‘एंडोस्कोपी’ और लेजर सर्जरी होती है, वह सब डॉ. कपानी के इसी आविष्कार की बदौलत संभव हो पाया है।
साल 2009 में फाइबर ऑप्टिक्स के लिए चार्ल्स के. काओ को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। विज्ञान जगत के कई विशेषज्ञों का मानना था कि डॉ. कपानी को इस पुरस्कार से वंचित रखा गया, जबकि इस तकनीक की असली खोज और शुरुआत उन्होंने ही की थी।
डॉ. कपानी केवल एक वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि सिलिकॉन वैली के एक बेहद सफल उद्यमी भी थे। वे 1961 में कैलिफोर्निया चले गए और वहां उन्होंने ‘ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी इंक’ नाम से अपनी पहली कंपनी शुरू की। इसके बाद उन्होंने ‘कैप्ट्रॉन कॉर्पोरेशन’ जैसी कई अन्य सफल टेक कंपनियों की स्थापना की।
वे एक प्रोफेसर भी रहे। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित
संस्थानों में छात्रों को पढ़ाया।
उनके नाम पर ऑप्टिक्स, लेजर और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 100 से अधिक वैश्विक पेटेंट्स दर्ज हैं और उन्होंने विज्ञान पर 4 से अधिक महत्वपूर्ण किताबें लिखीं।
उनकी पत्नी का नाम सतिंदर कौर था, जिनका साल 2016 में निधन हो गया था। दोनों की मुलाकात लंदन में पढ़ाई के दौरान हुई थी। उनके दो बच्चे हैं जो अमेरिका में रहते हैं, राजिंदर सिंह कपानी, वे अमेरिका में एक हाई-टेक बिजनेसमैन और उद्यमी हैं। और बेटी किरण कौर कपानी भी कैलिफोर्निया में रहती हैं और कला व परोपकारी कार्यों से जुड़ी हुई हैं।
डॉ. कपानी को सिख कला और संस्कृति से बेहद लगाव था। उन्होंने अमेरिका में ‘सिख फाउंडेशन’ की स्थापना की और दुनिया भर के संग्रहालयों को अमूल्य सिख कलाकृतियां दान कीं।
4 दिसंबर 2020 को 94 वर्ष की आयु में कैलिफोर्निया, अमेरिका में उनका निधन हुआ। मरणोपरांत वर्ष 2021 में भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
नरेंद्र सिंह कपानी
देहरादून के एक शिक्षक ने अपनी क्लास को बताया कि प्रकाश केवल सीधी रेखाओं में चलता है…
उस कमरे में बैठे एक लड़के ने अगले चालीस साल प्रकाश को मोड़ने में बिताए, और आज इंटरनेट उसी चीज़ पर चलता है जो उसने बनाया….
उसका नाम था नरिंदर सिंह कपानी।
जन्म 1926 में मोगा, पंजाब में। देहरादून में पढ़ाई, आगरा यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट, भारतीय आयुध कारखानों में अधिकारी। 1952 में इंपीरियल कॉलेज लंदन चले गए।
वहाँ प्रोफेसर हेरोल्ड हॉपकिंस के साथ उन्होंने काँच के पतले रेशों को एक साथ बाँधा और उनके माध्यम से साफ इमेज भेजी — मोड़कर, कोनों से होकर। पहले कभी किसी ने ऐसा नहीं किया था।
यही है फाइबर ऑप्टिक्स। समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल, एंडोस्कोपी, लेजर सर्जरी — सब इसी पर टिकी हैं। 1960 में Scientific American के एक लेख में उन्होंने इस क्षेत्र को इसका नाम दिया।
नेहरू से उन्होंने संपर्क करके भारत में ये स्थापित करना चाहते थे पर नेहरू सरकार ने कोई तवज्जो नहीं दी…. वे अमेरिका चले गए।
Optics Technology कंपनी स्थापित की, 1967 में उसे पब्लिक किया, सौ से ज्यादा पेटेंट लिए, और सिलिकॉन वैली में उस स्तर की कंपनी बनाने वाले पहले भारतीयों में से एक बने।
2009 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार काँच के फाइबर से प्रकाश के ट्रांसमिशन के लिए दिया गया। वह चार्ल्स काओ को मिला, जिन्होंने काँच में अशुद्धियों की समस्या हल की थी, जो सिग्नल को निगल जाती थीं। नोबल पुरस्कार लॉबी ने कपानी का नाम गायब कर दिया।
क्या उन्हें साझा करना चाहिए था?
— यह अब भी उन लोगों में विवादित है जो भौतिकी समझते हैं। जो विवादित नहीं है वह यह कि Fortune ने दस साल पहले ही उन्हें बीसवीं सदी के सात unsung heroes में शामिल कर लिया था।
वे 2020 में कैलिफोर्निया में 94 वर्ष की आयु में नहीं रहे।
कपानी जी को पिछले साल मोदी सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।
