बलराज मधोक भारत के प्रमुख राष्ट्रवादी विचारक, इतिहासकार और भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के निर्माता और जम्मू-कश्मीर में प्रजा परिषद के संस्थापक के रूप में अहम भूमिका निभाई।

उनके पिता जगन्नाथ मधोक मूल रूप से पश्चिमी पंजाब के गुजरांवाला जिले के ‘जालेन’ गांव के रहने वाले पंजाबी खत्री थे। उनके पिता जम्मू-कश्मीर रियासत के लद्दाख/स्कर्दू संभाग में सरकारी कर्मचारी थे। इसी दौरान बलराज का जन्म 25 फ़रवरी 1920 को स्कर्दू में हुआ था।
उनका प्रारंभिक बचपन पंजाब के पैतृक गांव में बीता और उन्होंने दयानंद एंग्लो वैदिक (DAV) कॉलेज लाहौर से इतिहास में डिग्री हासिल की। शिक्षा पूरी करके आप दिल्ली यूनिवर्सिटी के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर हो गए।

उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना की और पहला पार्टी घोषणापत्र तैयार किया। वे 1966 से 1967 तक वे जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में पार्टी ने 1967 के आम चुनावों में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की।

वे पहली बार 1961 में और दूसरी बार 1967 में दिल्ली से लोकसभा के लिए चुने गए । वे अपनी बेबाक और आक्रामक हिंदुत्ववादी विचारधारा के लिए जाने जाते थे। उन्होंने गौहत्या विरोधी आंदोलन का भी नेतृत्व किया। बाद के वर्षों में पार्टी के भीतर उनकी अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं से मतभेद हो गए। अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए 1970 के दशक में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया, जिसके बाद वे मुख्यधारा की राजनीति से दूर होते चले गए।

एक बेहद सक्रिय लेखक और पत्रकार थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ पत्रिका के संपादक के रूप में काम किया। इसके अलावा उन्होंने इतिहास, कश्मीर संकट और भारतीय राजनीति पर 30 से अधिक किताबें लिखीं, जिससे उन्हें रॉयल्टी और बौद्धिक पहचान मिलती थी। उनमें से प्रमुख पुस्तकें उनकी आत्मकथा “जिन्दगी का सफर (भाग 1, 2 और 3)”, “कश्मीर: जीत में हार”, जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रामाणिक जीवनी “एक शहीद का चित्र”, “हिंदुस्तान चौराहे पर” (1946), “लोकतंत्र की हत्या”  (1973), आपातकाल के दौरान जेल में बिताए समय के उनके अनुभवों पर “एक बंदी के विचार”, “पंजाब की समस्या: तथा समाधान” , “पाकिस्तान का आदि और अंत”, “इंडियनाइजेशन”, “हिंदू राज्य” , “हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता”, “विश्वव्यापी मुस्लिम समस्या का पुनरोदय” हैं।

प्रोफेसर बलराज मधोक को उनके वैचारिक योगदान और राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण के लिए मुख्य रूप से ‘वीर सावरकर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।

उनकी पत्नी कमला मधोक भी एक प्रख्यात शिक्षाविद थीं और वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थीं। प्रोफेसर बलराज मधोक और कमला मधोक की दो बेटियां हुईं। वे भी मुख्य रूप से अकादमिक और शिक्षण क्षेत्र से जुड़ी रहीं। जीवन के अंतिम पड़ाव में वे दिल्ली के न्यू राजेंद्र नगर में अपनी बेटियों के साथ ही रहते थे।

96 वर्ष की आयु में 2 मई 2016 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।