हरनाम सिंह सैनी भारत के एक प्रमुख क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ग़दर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनका जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के फतेहगढ़ गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम गोपाल सैनी था।
हरनाम सिंह ने व्यापार के सिलसिले में कनाडा और अमेरिका की यात्रा की जहाँ वे ग़दर पार्टी के संपर्क में आए और सदस्य बने। कालांतर में वे ग़दर पार्टी के एक प्रभावशाली लेखक और प्रचारक की महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए थे।
कनाडा में उन्होंने ‘द हिन्दुस्थान’ नामक पत्रिका शुरू की। इसके माध्यम से वे भारतीयों को विद्रोह के लिए प्रेरित करते थे। ब्रिटिश दबाव के कारण कनाडा सरकार ने उन पर बम बनाने की विधि सिखाने और राजद्रोह का आरोप लगाकर देश छोड़ने का आदेश दिया था।
अमेरिका में उन्होंने ‘ग़दर’ पत्रिका के प्रकाशन में मदद की। कामागाटामारू घटना के बाद उन्होंने जापान, चीन और थाईलैंड में जाकर क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया। वे बर्मा (म्यांमार) के रास्ते भारत में विद्रोह भड़काने की योजना का हिस्सा थे। उन्हें इंडोनेशिया में डच कॉलोनी बटाविया, वर्तमान में जकार्ता, में गिरफ्तार किया गया था। उन पर तीसरे लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया। उनके साथियों के नाम जानने के लिए उन्हें जेल में कठोर यातनाओं दी गईं लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने साथियों के नाम नहीं बताए। अंततः 16 मार्च 1917 को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
नोट: कई बार लोग उन्हें हरनाम सिंह ‘टुंडीलाट’ के साथ भ्रमित कर देते हैं। हालांकि दोनों होशियारपुर से थे और ग़दर पार्टी के सदस्य थे, लेकिन ‘टुंडीलाट’ को उम्रकैद हुई थी और उनकी मृत्यु 1962 में हुई थी, जबकि हरनाम सिंह सैनी 1917 में शहीद हो गए थे।
उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, विशेषकर पंजाब के क्रांतिकारी आंदोलन में, अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
