लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के मोगा जिले के धुदिके गाँव में एक अग्रवाल परिवार में हुआ। उनका परिवार जैन सिद्धांतों से प्रभावित था और उनके पिता जैन परंपराओं का पालन करते थे जिसके कारण उन्हें अक्सर ‘अग्रवाल जैन’ परिवार में जन्मा बताया जाता है लेकिन स्वयं लालाजी ने आर्य समाज के सिद्धांतों का पालन किया।

लाला लाजपत राय का विवाह 1877 में राधा देवी के साथ हुआ था। उनके दो पुत्र – अमृत राय अग्रवाल और प्यारेलाल अग्रवाल तथा एक पुत्री – पार्वती अग्रवाल थी।  यद्यपि वे एक साधारण परिवार से थे लेकिन उनके माता-पिता ने उन्हें सत्य निष्ठा और देशभक्ति के संस्कार दिए, जो बाद में उनके स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा (जैसे 1897 और 1899 के अकाल में) में झलकते थे। उनके पिता एक सरकारी नौकरी में थे, लेकिन लालाजी ने वकालत को अपना करियर बनाने का निर्णय लिया जिसे बाद में उन्होंने देश सेवा के लिए छोड़ दिया।

लाला लाजपत राय की प्रारंभिक शिक्षा रेवाड़ी के सरकारी स्कूल से हुई, जहाँ उनके पिता शिक्षक थे। उन्होंने 1880 में कलकत्ता व पंजाब विश्वविद्यालय से एंट्रेंस और 1882 में एफ.ए. की परीक्षा पास की। इसके बाद, लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। इसी दौरान ही वे लाला हंसराज और गुरु दत्त जैसे देशभक्तों के संपर्क में आए जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और राजनेता थे, जिन्हें ‘पंजाब केसरी’ अर्थात् पंजाब का शेर के रूप में जाना जाता है। वे लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) तिकड़ी के सदस्य थे । वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे और पूर्ण स्वराज्य की मांग करते थे।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने और विदेशी सामान के बहिष्कार का पंजाब में सक्रिय नेतृत्व किया।

उन्होंने 1917 में संयुक्त राज्य अमेरिका में रहते हुए न्यूयॉर्क में ‘इंडियन होम रूल लीग’ की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य भारत में स्वशासन (Home Rule) के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाना और ‘यंग इंडिया’ नामक मुखपत्र के माध्यम से प्रचार करना था।

रौलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हुए और पंजाब में 1920-22 जनआंदोलन को संगठित किया।

लाला लाजपत राय एक महान स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ प्रखर समाज सुधारक और शिक्षाविद् थे। महर्षि दयानंद से भेंट के बाद उनके विचारों से प्रभावित होकर ही लाला लाजपत राय आर्य समाज के प्रबल अनुयायी बने और उन्होंने अपना जीवन देश की स्वतंत्रता व समाज सुधार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने आर्य समाज के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभायी। वे डीएवी स्कूलों के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

लाला लाजपत राय ने 19 मई 1894 को सरदार दयाल सिंह मजीठिया, लाला हरकिशन लाल और अन्य के सहयोग से पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की स्थापना  की थी। बैंक का विधिवत परिचालन 12 अप्रैल 1895 को लाहौर (अब पाकिस्तान में) में शुरू हुआ था। यह भारत का पहला पूर्ण स्वदेशी बैंक था, जिसे भारतीय पूंजी और प्रबंधन से शुरू किया गया था। बैंक के माध्यम से उन्होंने भारतवासियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। फिर 1924 में लाहौर में पंडित के. संतनम के साथ मिलकर एक पूर्णतया स्वदेशी बीमा कंपनी “लक्ष्मी बीमा कंपनी”  की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी और वे इसके प्रमुख भी थे।

उन्होंने 1897 के अकाल में हिंदू अनाथ राहत आंदोलन शुरू किया।

1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के पहले अध्यक्ष होकर वे श्रमिक अधिकारों की मुखर आवाज़ बने।

लाला लाजपत राय एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता के साथ-साथ महान साहित्यकार, पत्रकार और संपादक भी थे। उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में पुस्तकें और लेख लिखकर औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनमत तैयार किया। उनके साहित्य ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक धार दी जिसमें ‘यंग इंडिया’, ‘अनहैप्पी इंडिया’ और ‘द स्टोरी ऑफ माई डिपोर्टेशन’
“यंग इंडिया” “द पीपुल” “इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया”
“द स्टोरी ऑफ माई डिपोर्टेशन” “भारत का राजनीतिक भविष्य” इत्यादि प्रमुख कृतियाँ हैं।

इसके अतिरिक्त उन्होंने मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण जी की जीवनी लेखन लिखकर युवाओं में देशप्रेम जगाया।

उन्होंने ‘वंदे मातरम’ (उर्दू दैनिक), ‘द पीपल’ (अंग्रेजी साप्ताहिक) और ‘आर्य गजट’ का संपादन और प्रकाशन किया, जो राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रसार के प्रमुख माध्यम बने।

हिंदी और हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में भी उनका महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान अंग्रेजों के लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल हुए। उन्होंने कहा था, “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी”। 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया जिसका बदला भगत सिंह ने सांडर्स की हत्या करके लिया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी लाला जी एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक समाज सुधारक, राष्ट्रवादी लेखक और प्रखर अधिवक्ता थे जिन्होंने देश में राष्ट्रीय चेतना जगाने में अहम भूमिका निभाई।