कैप्टन अनुज नैय्यर, एमवीसी भारतीय सेना की 17 जाट रेजिमेंट के एक जांबाज अधिकारी थे। उन्हें 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में उनकी अद्वितीय वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार, महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया था। उन्हें अक्सर “द्रास का टाइगर” भी कहा जाता है।

उनका जन्म 28 अगस्त 1975 को दिल्ली में हुआ। उनके पिता सतीश कुमार नैय्यर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर थे। माता श्रीमती मीना नैय्यर और भाई श्री करण नैय्यर हैं। उन्होंने आर्मी पब्लिक स्कूल, धौला कुआं से पढ़ाई की और बाद में जून 1993 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में शामिल हुए। उन्हें 7 जून 1997 को भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ।

कैप्टन अनुज नैय्यर की सगाई उनके साथ पढ़ने वाली युवती से हुई थी और उनका विवाह 10 सितंबर 1999 को होना निश्चित हुआ था। दुर्भाग्य से 7 जुलाई 1999 को उनके बलिदान होने के कारण ऐसा हो नहीं सका।उन्होंने अपनी सगाई की अंगूठी अपने कमांडिंग ऑफिसर को यह कहकर सौंपी थी कि अगर वे जीवित न लौटें तो इसे उनकी मंगेतर को वापस कर दिया जाए।

कैप्टन अनुज नैय्यर का योगदान कारगिल युद्ध की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक, प्वाइंट 4875 जिसे ‘पिंपल 2’ भी कहा जाता है, पर कब्जा करने में रहा है। पिंपल II पर हमले के शुरुआती चरण में उनकी चार्ली कंपनी के कमांडर मेजर पदम जांगू घायल हो गए थे जिसके बाद कंपनी की कमान युवा कैप्टन अनुज नैय्यर को मिली।

दुश्मन हजारों फीट ऊंची चोटी पर कब्जा जमाए बैठे थे, वे वहां से सीधे अटैक कर रहे थे और आसानी से हमारी फौज को देख सकते थे। इसलिए दिन में चढ़ाई करना खतरे से खाली नहीं था।
शाम ढली तो अनुज की टीम ने चोटी पर चढ़ना शुरू किया। भूख-प्यास की परवाह किए बगैर वे आगे बढ़ते रहे। जब वे करीब पहुंचे तो दुश्मनों ने देख लिया और फायर करना शुरू कर दिया। इधर से अनुज की टीम ने भी प्रत्युत्तर देना शुरू किया। दोनों तरफ से लगातार फायरिंग होती रही। दुश्मनों की संख्या भी अधिक थी और उनके पास पर्याप्त मात्रा में बड़े हथियार भी थे। अनुज के कई साथी बलिदान हो गए, लेकिन वे जान हथेली पर रखकर आगे बढ़ते रहे। घायल होने के बाद भी उन्होंने एक के बाद एक 9 दुश्मनों को ढेर कर दिया। पाकिस्तान के तीन बड़े बंकर तबाह कर दिए।

रात ढल चुकी थी, सुबह के करीब 5 बजे का वक्त था। दुश्मन अब आसानी से हमारी फौज को देख सकते थे। सामने कई जवानों के शव पड़े थे। अनुज आगे बढ़े तो उनके एक साथी ने रोका कि अब उजाला हो गया है। दुश्मन हमें देख लेगा, लेकिन अनुज को अपने पिता की बात याद थी कि जंग में पीठ मत दिखाना। उन्होंने सिर पर कफन बांधा और पाकिस्तान के चौथे बंकर के ऊपर टूट पड़े। उन्होंने जैसे ही फायरिंग शुरू की, बम का एक गोला उनके ऊपर आकर गिरा और वे शहीद हो गए, लेकिन कैप्टन अनुज अपनी शहादत के साथ ही जीत की बुनियाद रख गए थे, उसी दिन कुछ ही घंटों बाद पॉइंट 4875 पर तिरंगा फहराने लगा।
अपने पिता को लिखे अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा था कि “डर मेरी डिक्शनरी में नहीं है।”

उनके इस पराक्रम ने ही भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण टाइगर हिल को वापस जीतने का मार्ग प्रशस्त किया।

कैप्टन अनुज नैय्यर को उनकी असाधारण बहादुरी, अदम्य युद्ध भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, “महावीर चक्र” से मरणोपरांत सम्मानित किया गया।

उनके जीवन और वीरता के बारे में और अधिक जानने के लिए ऋषि राज द्वारा लिखित पुस्तक Captain Anuj Nayyar: A Hero’s Story of Sacrifice and Bravery को Amazon पर देख सकते हैं।