पंजाब माता आर्या विद्यावती देवी जी की पुण्यतिथि 1 जून पर उन्हें शत शत नमन…

भारत के स्वाधीनता संग्राम में हंसते हुए फांसी चढ़ने वाले वीरों में भगत सिंह का नाम प्रमुख है. उस वीर की माता थीं श्रीमती विद्यावती देवी…

इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वालों के मन पर ऐसे संस्कार उनकी माताओं ने ही डाले हैं.

सरदार अर्जुन सिंह जी के तीन पुत्र थे- किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह। किशन सिंह का विवाह विद्यावती देवी जी से हुआ, जिनसे 9 सन्तानें हुईं। माता विद्यावती देवी के ससुर सरदार अर्जुन सिंह कट्टर आर्य समाजी थे. अपने घर में नित्य यज्ञ करते थे. उन्ही से प्रेरणा लेकर माता विद्यावती ने आर्य समाज के समाज सुधार के कार्यों हेतु स्वयं को अर्पित किया.

विद्यावती जी का पूरा जीवन अनेक विडम्बनाओं और झंझावातों के बीच बीता. सरदार किशन सिंह से विवाह के बाद जब वे ससुराल आयीं तो वहां का वातावरण देशभक्ति से परिपूर्ण था.
माता विद्यावती ने अपने जीवन काल में अपने पति, देवरों और पुत्रों को ब्रिटिश शासन की ओर से दी गई भयंकर यातनाएं सहते देखा था.
माता विद्यावती के समान ही उनकी देवरानी अमर क्रन्तिकारी सरदार अजीत सिंह की पत्नी हरनाम देवी ने भी अपना सारा जीवन देश की आजादी के लिए विदेशों में भटक रहे पति की प्रतीक्षा में व्यतीत किया. अजीत सिंह ने आजीवन क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त रहते हुए भारी कष्ट उठाये। वर्षों पश्चात् स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ समय पूर्व वे भारत लौटे तो भाव विह्वल होकर पत्नी हरनाम देवी से बोले, “सरदारनी मैं तुझे सुख न दे सका, हो सके तो मुझे माफ़ करना. 15 अगस्त, 1947 को मिलने वाली कथित स्वतंत्रता कभी उनके मन को वो प्रसन्नता नहीं दे सकी जिसके लिए वे आजीवन प्रयासरत और लालायित रहे. देश को विभाजित होते देख उनके मन को इतना आघात पहुंचा कि उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को ही देह त्याग दी. उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्ण सिंह भी जेल में अंग्रेजों की यातनाएं सहते हुए बलिदान हुये.
उनके पति किशन सिंह का भी एक पैर घर में, तो दूसरा जेल और कचहरी में रहता था. इन जेलयात्राओं और मुकदमेबाजी से खेती चौपट हो गयी तथा घर की चौखटें तक बिक गयीं. इसी बीच घर में डाका भी पड़ गया. एक बार चोर उनके बैलों की जोड़ी ही चुरा ले गये तो बाढ़ के पानी से गांव का जर्जर मकान भी बह गया. ईर्ष्यालु पड़ोसियों ने उनकी पकी फसल जला दी. 1939-40 में सरदार किशन सिंह जी को लकवा मार गया. उन्हें चार बार सांप ने काटा पर उच्च मनोबल के धनी होने के कारण उनकी माताजी के घरेलू उपचार और झाड़-फूंक से हर बार ठीक हो गये. विद्यावती जी के बड़े पुत्र जगत सिंह की 11 वर्ष की आयु में सन्निपात से मृत्यु हुई. भगत सिंह 23 वर्ष की आयु में फांसी चढ़ गये, तो उससे छोटे कुलतार सिंह और कुलवीर सिंह भी कई वर्ष जेल में रहे.
भगत सिंह का अपनी माता से अगाध प्रेम था। जब एक बार उनकी माता अत्यंत बीमार हुई तो वह भगत सिंह को देखने के लिए तड़पने लगी. पिता किशन सिंह ने भगत को बुलाने के लिए एक विज्ञापन निकाला ताकि उसे पढ़कर वह घर लौट आए. ऐसा ही हुआ, भगत पहुँचें तो माँ ने गले लगा लिया और खूब बातें कर के अपना मन हल्का किया और वे ठीक भी हो गईं. माता भगत सिंह की शादी करना चाहती थी लेकिन भगत चुपचाप घर से निकल क्रांतिकारियों से जा मिले. माँ मन मसोस कर रह गई. माता विद्यावती जब अपने वीर पुत्र भगत सिंह से फाँसी लगने से पूर्व जेल में अंतिम भेंट करने गई तो ठहाकों के बीच भगत सिंह ने कहा “बेबे मेरी लाश लेने मत आना. कुलवीर नूँ भेज देना. कहीं तू रो पड़ी तो लोग कहेंगे कि भगत सिंह की मां रो रही है” इतना कह कर देश के दीवाने भगत सिंह ने पुनः जोर से ठहाका लगाया. वीर प्रसूता माता ने यह बात गांठ बांध ली और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार सुनकर रोई नहीं बल्कि उन्होंने दिल को पत्थर बना लिया.

उज्जैन के लेखक श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने अमर बलिदानी भगत सिंह पर एक महाकाव्य लिखा. नौ मार्च, 1965 को इसके विमोचन के लिये माताजी जब उज्जैन आयीं तो उनके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा. उन्हें खुले रथ में कार्यक्रम स्थल तक ले जाया गया. सड़क पर लोगों ने फूल बिछा दिये और छज्जों पर खड़े लोग भी उन पर पुष्प वर्षा करते रहे. पुस्तक के विमोचन के बाद ‘सरल’ जी ने अपने अंगूठे से माताजी के भाल पर रक्त तिलक किया. माताजी ने वही अंगूठा एक पुस्तक पर लगाकर उसे नीलाम कर दिया. उससे 3,331 रु. प्राप्त हुए. माताजी को सैकड़ों लोगों ने मालायें और राशि भेंट की. इस प्रकार प्राप्त 11,000 रु. माताजी ने दिल्ली में इलाज करा रहे भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त को भिजवा दिये. समारोह के बाद लोग उन मालाओं के फूल चुनकर अपने घर ले गये. जहां माताजी बैठी थीं, वहां की धूल लोगों ने सिर पर लगाई. सैकड़ों माताओं ने अपने बच्चों को माताजी के पैरों पर रखा जिससे वे भी भगत सिंह जैसे वीर बन सकें.

स्वाधीनता के बाद गांधीवादी सत्याग्रहियों को तो अनेक शासकीय सुविधायें मिलीं पर अपना जीवन देश के नाम कर देने वाले क्रांतिकारी प्रायः उपेक्षित ही रह गये. उनमें से कई गुमनामी में बहुत कष्ट का जीवन बिता रहे थे. माताजी उन सबको भगत समान अपना पुत्र ही मानती थीं. वे उनकी खोज़ ख़बर लेकर उनसे मिलने जाती थीं तथा सरकार की ओर से उन्हें मिलने वाली पेंशन की राशि चुपचाप वहां तकिये के नीचे रख देती थीं.

इस प्रकार एक सार्थक और सुदीर्घ जीवन जीकर माताजी ने दिल्ली के एक अस्पताल में 1 जून, 1975 को 96 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली. उस समय उनके मन में यह सुखद अनुभूति थी कि अब उनके प्यारे सपूत भगत सिंह से उनके विछोह की अवधि सदा के लिये समाप्त हो रही है. उन्हें पंजाब माता की उपाधि से विभूषित किया गया. सम्पूर्ण भारतवर्ष इस वीर माता का ऋणी है और सदैव रहेगा.

उन्हें शत शत नमन…
वीर माता विद्यावती जी अमर रहें…