भाई दयाल दास जी (भाई दयाला) का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और वे वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम जिले के करयाला ग्राम के निवासी थे। वे भाई मतिदास और सतिदास के भाई/रिश्तेदार थे। उन्होंने 1675 में नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के साथ धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।

आपको 9 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान से पहले उबलते पानी में डालकर यातनाएं देकर मौत के घाट उतारा गया था।

उनके साथ ही भाई मती दास जी को आरी से चीर दिया गया और भाई सती दास जी को रुई में लपेटकर जला दिया गया। 11 नवंबर 1675 को चाँदनी चौक में गुरु तेगबहादुर का भी शीश काट दिया गया।

औरंगजेब इन सिखों को भीषण यातनाएं देकर डराना चाहता था ताकि गुरु तेग बहादुर जी इस्लाम स्वीकार कर लें, लेकिन वे अपनी आस्था पर अडिग रहे।

भाई दयाला जी का बलिदान सिख इतिहास में अटूट विश्वास और साहस का प्रतीक माना जाता है