भाई सती दास जी सिख इतिहास के एक महान बलिदानी थे। वे सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के अनन्य शिष्य थे और उनके साथ अपनी प्राण न्यौछावर कर देने वाले तीन प्रमुख सिखों में से एक थे। अन्य दो भाई मती दास और भाई दयाला जी थे।

भाई सती दास का जन्म पंजाब के जंडियाला गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता हीरा नंद जी, गुरु हरगोबिंद जी के समर्पित शिष्य थे।

वे एक कुशल लेखक और अनुवादक थे, विशेष रूप से फारसी भाषा के विद्वान थे। वे गुरु जी के उपदेशों को फारसी में लिपिबद्ध करते थे।

मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर गुरु तेग बहादुर जी और उनके शिष्यों को दिल्ली के चांदनी चौक में बंदी बना लिया गया था। जब उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया तो उन्हें डराने के लिए उनके शिष्यों को अत्यंत क्रूरता से मारा गया।

इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर भाई सती दास जी को रुई में लपेटकर और तेल छिड़ककर जिंदा जला दिया गया था।

भाई सती दास जी का बलिदान धर्म और मानवता की रक्षा के लिए एक महान प्रतीक माना जाता है। उनकी याद में दिल्ली के चांदनी चौक में गुरुद्वारा शीशगंज साहिब के पास भाई मती दास और सती दास का स्मारक बना हुआ है।