कैप्टन सौरभ कालिया भारतीय थलसेना के ऐसे जांबाज़ ऑफिसर थे जिनकी कहानी के बिना ‘कारगिल युद्ध’ की कहानी शुरू ही नहीं हो सकती । उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान अपने अदम्य-साहस और वीरता की मिसाल कायम की थी। वे भारतीय सेना के एक अत्यंत साहसी अधिकारी थे जिन्हें 1999 के कारगिल युद्ध का पहला बलिदानी और नायक माना जाता है। उन्होंने मात्र 22 वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
सौरभ कालिया का जन्म 29 जून 1976 को अमृतसर , पंजाब में श्रीमती विजया और एन.के. कालिया के घर हुआ था। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त की और फिर 1997 में हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बीएससी-मेड की डिग्री प्राप्त की। वे एक मेधावी छात्र थे और उन्होंने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में विभिन्न छात्रवृत्तियां प्राप्त कीं।
उनका चयन अगस्त 1997 में संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा के माध्यम से भारतीय सैन्य अकादमी में हुआ और उन्हें 12 दिसंबर 1998 को कमीशन दिया गया। उन्हें कारगिल सेक्टर में जाट रेजिमेंट की चौथी बटालियन में तैनात किया गया जहाँ वे 31 दिसंबर 1998 को बरेली स्थित जाट रेजिमेंटल सेंटर में रिपोर्ट करने के बाद जनवरी 1999 के मध्य में पहुँचे। कारगिल सेक्टर में सीमा पर पोस्टिंग के दौरान उन्हें एक्टिंग कैप्टन के रूप में प्रमोट किया गया था। उन्होंने युद्ध के समय तक अपनी पहला वेतन भी प्राप्त नहीं किया था।
कारगिल युद्ध की शुरूआत यूँ तो 3 मई, 1999 से हो गई थी। जब ताशी नामग्याल नाम के एक चरवाहे ने भारतीय सीमा में पाकिस्तानी सैनिकों के घुसपैठ की जानकारी भारतीय सेना को दी। जानकारी के फ़ौरन बाद अधिकारियों के आदेश पर 1999 में कारगिल युद्ध से पहले कारगिल जिले के काकसर लंगपा इलाके में गश्त अभियान चलाया गया था।
15 मई 1999 को कैप्टन सौरभ कालिया को बजरंग पोस्ट पर नियमित गश्ती दल का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बजरंग पोस्ट यूनिट की रक्षा का एक अभिन्न अंग था लेकिन सर्दियों के महीनों में आमतौर पर खाली रहता था। अपने कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व क्षमता का परिचय देते हुए वे पांच सैनिकों के साथ मिशन पर निकल पड़े। गश्ती दल योजना के अनुसार आगे बढ़ा, उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि वे एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं जहां पहले से ही दुश्मन की मौजूदगी है।
चौकी के पास पहुँचते ही गश्ती दल नियंत्रण रेखा के पार तैनात पाकिस्तानी सेना की लगातार गोलीबारी की चपेट में आ गया।। गोला-बारूद खत्म होने के कारण गश्ती दल को पाकिस्तानी सेना के जवानों की एक प्लाटून ने घेर लिया और भारतीय सेना की मदद पहुंचने से पहले ही उन्हें पकड़ लिया गया। पाकिस्तान के रेडियो स्कार्दू ने उनकी गिरफ्तारी की घोषणा की।
भारतीय अधिकारियों ने बताया कि कालिया और उसके साथियों को 22 दिनों (15 मई, 1999 से 7 जून, 1999) तक बंदी बनाकर रखा गया और उन्हें भीषण यातनाएं दी गईं। उनके शरीर पर मौजूद चोटों से यातना के सबूत स्पष्ट थे। भारत द्वारा कराए गए पोस्टमार्टम में रिपोर्ट मिली कि कैदियों के शरीर पर सिगरेट से जलने के निशान, गर्म छड़ों से कान के पर्दे छेदे हुए, कई दांत और हड्डियां टूटी हुई, खोपड़ी में फ्रैक्चर, आंखें निकालने से पहले उनमें छेद किए गए, होंठ कटे हुए, नाक टूटी हुई और जननांग कटे हुए थे। जांच के अनुसार ये चोटें कैदियों को सिर में गोली मारकर हत्या करने से पहले लगी थीं।
15 जून 1999 को, भारत ने पाकिस्तान को युद्धबंदियों को यातना देने और उनकी हत्या करने के लिए जिनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन का नोटिस भेजा। विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री सरताज अजीज के साथ यह मुद्दा उठाया और जिम्मेदार लोगों की पहचान और सजा की मांग की, लेकिन पाकिस्तान ने यातना के आरोपों से इनकार किया।
उनके पिता डॉ. एन. के. कालिया दशकों से पाकिस्तान के इन कृत्यों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा युद्ध अपराध घोषित करने और जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार जिम्मेदार लोगों को दंडित करने के लिए अभियान चलाया है लेकिन अनेक पेचीदगियों के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली है।
कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले वे पहले भारतीय सेना अधिकारी थे। उन्हें मृत्युपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में पालमपुर में एक मेमोरियल पार्क बनाया गया है जिसे ‘सौरभ वन विहार’ के नाम से जाना जाता है। वहां एक सड़क का नाम “कैप्टन सौरभ कालिया मार्ग” और एक क्षेत्र का नाम “सौरभ नगर” रखा गया है। अमृतसर वर्किंग जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा अमृतसर में उनकी स्मृति में एक प्रतिमा स्थापित की गई है।
