हरि सिंह नलवा (1791–1837) महाराजा रणजीत सिंह द्वारा स्थापित सिख साम्राज्य की ‘सिख खालसा सेना’ के सबसे महान् और विश्वसनीय सेनापति थे जिनके भय से अफगान, पठान पनाह मांगते थे।

हरि सिंह का जन्म 29 अप्रैल, 1791 को पंजाब के माझा क्षेत्र के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में उप्पल खत्री जाति के पिता गुरदयाल सिंह और माता धर्म कौर के घर हुआ था। जब वे केवल 7 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी माता और मामा ने किया। बचपन से ही उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी में महारत हासिल कर ली थी और अपने पिता की संपत्ति का प्रबंधन करना शुरू किया था। 1801 में, दस वर्ष की आयु में उन्होंने अमृतपान किया और खालसा के रूप में दीक्षा ली। ।

1804 में, उनकी माता ने उन्हें संपत्ति विवाद सुलझाने के लिए रणजीत सिंह के दरबार में भेजा। वहां उन्होंने महाराजा को बताया कि उनके पिता और दादा ने महाराजा के पूर्वज महासिंह और चरत सिंह के दरबार में घुड़सवार और बंदूकधारी के रूप में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। महाराजा रणजीत सिंह ने उनकी पृष्ठभूमि और योग्यता के कारण उनके पक्ष में मध्यस्थता का निर्णय लिया और उन्हें अपने दरबार में निजी सेवक के रूप में नियुक्त किया।

‘नलवा’
एक बार शिकार के दौरान एक विशाल बाघ ने महाराजा रणजीत सिंह पर हमला कर दिया। हरि सिंह ने अकेले ही उस बाघ के जबड़ों को अपने हाथों से पकड़कर उसे मार गिराया। उनकी इस बहादुरी को देख महाराजा ने उन्हें ‘राजा नल’ (महाभारत के वीर राजा) के समान बताया, जिससे उनका नाम ‘नलवा’ पड़ गया। उन्हें ‘बाघमार’ के नाम से भी जाना जाता है।

तत्कालीन प्रथा के अनुसार हरि सिंह नलवा ने रावलपिंडी की राज कौर और देसन कौर से विवाह किया था। उनके चार बेटे और दो बेटियाँ थीं।

प्रमुख युद्ध और ऐतिहासिक जीतें
कसूर का युद्ध (1807) :
महाराजा रणजीत सिंह तीन प्रयास करने के बावजूद कसूर के अवकाश शासन को हरा नहीं पाए थे। उन्होंने इसकी जिम्मेदारी तरुण हरि सिंह को दी जिसने 1807 में मात्र 16 वर्ष की आयु में अफगान शासक कुतुबुद्दीन खान को बुरी तरह पराजित कर अपने जीवन की पहली विजय प्राप्त की और कसूर का राज्य महाराजा रणजीत सिंह को भेंट किया।

सियालकोट का युद्ध (1807)
1807 में ही रणजीत सिंह ने हरि सिंह नलवा को सियालकोट जीतने का जिम्मा दिया। स्वतंत्र रूप से यह उनका पहला युद्ध था। अनेक दिनों की युद्ध के पश्चात अंततः सत्रह वर्षीय हरि सिंह ने विजय प्राप्त की और किले पर सिख ध्वज फहराया।

अटक का युद्ध (1813): सिख सेना ने पहली बार दुर्रानी पठानों (आज़म खान और दोस्त मोहम्मद खान) के खिलाफ एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इससे सिंधु नदी के पार का रास्ता खुल गया।

मुल्तान का युद्ध (1818):
महाराजा रणजीत सिंह ने मुल्तान पर सात बार आक्रमण किया। हरि सिंह नलवा ने इनमें से पाँच आक्रमणों में भाग लिया और विजय प्राप्त की। 1818 के भयंकर युद्ध में मुजफ्फर खान को हराकर सिख साम्राज्य ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुल्तान किले पर पूरी तरह विजय प्राप्त की।

पेशावर की जीत (1818, 1823, 1834):
महाराजा रणजीत सिंह को पेशावर जीतने के लिए कई प्रयत्न करने पड़े। पेशावर पर अफ़ग़ानिस्तान के शासक के भाई सुल्तान मोहम्मद का राज्य था। यहां युद्ध में हरि सिंह नलवा ने सेना का नेतृत्व किया। हरि सिंह नलवा से यहां का शासक इतना भयभीत हुआ कि वह पेशावर छोड़कर भाग गया। अगले दस वर्षों तक हरि सिंह के नेतृत्व में पेशावर पर महाराजा रणजीत सिंह का आधिपत्य बना रहा
पेशावर के महान शहर और उसके खंडहर हो चुके किले, बाला हिसार पर कब्जा , क्षेत्र में सरदार हरि सिंह नलवा की दुर्जेय प्रतिष्ठा का प्रतीक था। अंग्रेज इतिहासकार मैसन ने सिखों को शहर पर नियंत्रण करते देखा। उनके प्रत्यक्षदर्शी विवरण के अनुसार, अफगानी सेना क्षेत्र से पीछे हट गई और हरि सिंह नलवा ने बिना किसी संघर्ष के पेशावर पर कब्जा कर लिया।

हरि सिंह नलवा ने अफगानों के मजबूत गढ़ माने जाने वाले पेशावर को जीतकर उसे सिख साम्राज्य का करदाता बना दिया और बाद में वहां के गवर्नर बने।

कश्मीर की विजय (1819):
नलवा के कुशल नेतृत्व में सिख सेना ने अफगान गवर्नर जबर खान को हराकर कश्मीर को अफगान शासन से मुक्त कराया। इसके बाद वे कश्मीर के गवर्नर भी नियुक्त किए गए।

सैदु का युद्ध (1827)
रणजीत सिंह अभी भी बीमार थे जब उन्हें यूसुफजई विद्रोहियों की एक बड़ी सेना के साथ आने की खबर मिली। बुध सिंह संधानवालिया को 4,000 घुड़सवारों के साथ अटक भेजा गया ताकि सैयद अहमद के नेतृत्व में हो रहे यूसुफजई विद्रोह को दबाने में सहायता की जा सके।सरदार बुध सिंह ने सैयद को पत्र लिखकर उनके इरादे के बारे में स्पष्टीकरण मांगा। सैयद ने उत्तर दिया कि वह पहले अटक के किले पर कब्जा करना चाहते हैं और फिर बुध सिंह से युद्ध करना चाहते हैं।

हरि सिंह नलवा अटक के किले पर पहरा दे रहे थे ताकि लाहौर से अतिरिक्त सैनिक आने तक सैयद और उनके आदमियों को नदी पार करने से रोका जा सके। सिखों को खबर मिल चुकी थी कि सैयद के साथ आए जिहादियों की संख्या कई हजार है। सैयद और सिखों के बीच 23 फरवरी 1827 को युद्ध हुआ। सिखों ने अपने विरोधियों पर हमला किया, उन्हें खदेड़ दिया और छह मील तक उनका पीछा करते हुए उनकी सभी तोपें, कुंडा और शिविर सामग्री छीन ली।

मिचनी की लड़ाई
एक बार हरि सिंह नलवा 100 घुड़सवारों के साथ मिचनी के पास के इलाके में शिकार कर रहे थे, तभी एक सिख ने शिकायत की कि मिचनी के डेला खान ने उसकी पत्नी को चुरा लिया है। बाद में और भी हिंदू नलवा को खान के अत्याचारों के बारे में बताने आए। यह सब जानकर हरि सिंह नलवा हिंदुओं की मदद करने के लिए सहमत हो गए।

उसने अपने 100 घुड़सवारों के साथ रात में खान के निवास पर हमला किया। इस छापामार युद्ध में नलवा ने देला खान के 5,000 सैनिकों की सेना को परास्त कर दिया। खान ने माफी मांगी और दुल्हन को वापस करने की पेशकश की, लेकिन उसे दंडित किया गया। दुल्हन, जो एक सिख बीबी हरशरण कौर थीं, को उसके पति को लौटा दिया गया जिसने बाद में हरि सिंह नलवा के बलिदान के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पंजतार विजय (1836)
हरि सिंह नलवा, कंवर शेर सिंह के साथ पेशावर के उत्तर-पूर्व में स्थित यूसुफजई गढ़ों की ओर बढ़े जिन्होंने तीन वर्षों से कर नहीं चुकाया था। उनकी सेना ने यूसुफजई और उनके सरदार, पंजतर के फतेह खान को पराजित किया। उसके 15,000 पठान सैनिक नलवा के सामने टिक नहीं सके। कई मारे गए और शेष ने पहाड़ियों में शरण ली। पंजतर को जला कर नष्ट कर दिया। हरि सिंह राजस्व के सभी बकाया वसूल कर पेशावर लौट आए। जब पंजतर की विजय की खबर लाहौर के दरबार में पहुँची तो बड़ा जश्न मनाया गया और आतिशबाजी की गई

जमरुद विजय (खैबर दर्रा) (1836)
अक्टूबर 1836 में अमृतसर में दशहरा उत्सव के बाद, हरि सिंह ने खैबर दर्रे के मुहाने पर स्थित जमरुद गाँव पर अचानक हमला कर दिया। खैबर दर्रा पर स्थित जमरूद गाँव के मालिक, मीशा खेल खैबरी, अपनी उत्कृष्ट निशानेबाजी और किसी भी सत्ता के प्रति पूर्ण अनादर के लिए प्रसिद्ध थे।
जमरुद पर कब्ज़ा करने के लिए काफी संघर्ष किया गया लेकिन विजयी संघर्ष में नलवा ने इस पर अचानक धावा बोलकर कब्ज़ा कर लिया था। इस पर कब्ज़ा करने के बाद उसके सामरिक महत्व को देखते हुए हरि सिंह नलवा ने जमरूद के किले का निर्माण कराया था। खैबर नदी के मुहाने पर स्थित जमरुद की विजय के साथ, सिख साम्राज्य की सीमा अब हिंदू कुश पर्वतमाला की तलहटी से लगती थी। यह पहली बार हुआ था कि खैबर दर्रे पर सिख फौजों का नियंत्रण हुआ।
उन्होंने सिख साम्राज्य की सीमाओं को खैबर दर्रे के मुहाने तक फैलाकर भारत को सदियों से होने वाले विदेशी आक्रमणों से हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

अंग्रेज इतिहासकार मैसन ने 31 अक्टूबर 1836 के एक पत्र में वेड को इस सीमा पर घटित घटनाओं की जानकारी दी।

अंतिम युद्ध और बलिदान (जमरूद का युद्ध – 1837)
महाराजा के पोते नौनिहाल सिंह का विवाह मार्च 1837 में हो रहा था। पंजाब भर से सैनिकों को वापस बुला लिया गया था ताकि ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ के समक्ष शक्ति प्रदर्शन कर उन्हें सम्मानित किया जा सके। दोस्त मोहम्मद खान को भी इस भव्य समारोह में आमंत्रित किया गया था। हरि सिंह नलवा को भी अमृतसर में होना था, लेकिन बीमार होने के कारण वे पेशावर में थे।

उचित मौका जान दोस्त मोहम्मद ने अपनी सेना को पाँच पुत्रों और अपने मुख्य सलाहकारों के साथ जमरुद की ओर कूच करने का आदेश दिया था। उसका इरादा शबकदर , जमरुद और पेशावर के किलों पर कब्जा करने का था। हरि सिंह को भी लाहौर से अतिरिक्त सैनिक आने तक अफगानों से युद्ध न करने का निर्देश दिया गया था । हरि सिंह के लेफ्टिनेंट महान सिंह 600 सैनिकों और सीमित रसद के साथ जमरुद के किले में थे। उसे समय हरि सिंह पेशावर के मजबूत किले में थे लेकिन उन्हें अपने सैनिकों को बचाने के लिए ज़मरूद कूच करना पड़ा, जो बिना पीने के पानी के छोटे किले में अफगान सेनाओं से चारों ओर से घिरे हुए थे। सिख सैनिकों की संख्या बेहद कम थी, फिर भी हरि सिंह नलवा बिजली की गति से वहां पहुंचे तथा अफ़ग़ानों की 14 तोपें छीन लीं और अफगानों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

आमने-सामने के भीषण युद्ध में 30 अप्रैल 1837 को हरि सिंह नलवा के सीने में दो गोलियां लगी। गंभीर रूप से घायल होकर वे जमरूद के किले में पहुंचे। अंत समय निकट जान कर उन्होंने अपने लेफ्टिनेंट से कहा कि जब तक अतिरिक्त सेना न आ जाए, उनकी मृत्यु की खबर बाहर न आने दें, और लेफ्टिनेंट ने ऐसा ही किया। हालांकि अफगानों को पता था कि हरि सिंह घायल हो गए हैं फिर भी उनके खौफ के कारण अफगान सेना आगे बढ़ने का साहस नहीं कर सकी और वे एक सप्ताह से अधिक समय तक निष्क्रिय रहे, जब तक कि उनकी मृत्यु की पुष्टि नहीं हो गई।
जमरुद किले में उनका अंतिम संस्कार किया गया। पेशावर के बाबू गज्जूमल कपूर ने 1892 में किले में श्रद्धांजलि स्वरुप उनका एक स्मारक बनवाया।

महाराजा रणजीत सिंह के दुलारे हरि सिंह
अफ़गानों पर हरि सिंह की बहादुरी और अनेक युद्धों में विजय के बारे में अपने दरबार में रणजीत सिंह अक्सर बातें करते थे। इन विजयों को अमर बनाने के लिए उन्होंने कश्मीर से 5000 रुपये की रिकॉर्ड कीमत पर एक शॉल मंगवाई, जिस पर अफ़गानों के साथ लड़ी गई लड़ाइयों के दृश्य चित्रित थे।

दृढ़ता और इच्छाशक्ति
ऐसा कहा जाता है कि एक बार हरि सिंह नलवा ने पेशावर में वर्षा होने पर अपने किले से देखा कि अनेक अफ़ग़ान अपने-अपने मकानों की छतों को ठोक तथा पीट रहे हैं, क्योंकि छतों की मिट्टी बह गई थी। पीटने से छतें, जो कुछ बह गई थीं, पुन: ठीक हो गई थीं। इसे देखकर हरि सिंह नलवा के मन में विचार आया कि अफ़ग़ान की मिट्टी ही ऐसी है जो ठोकने तथा पीटने से ठीक रहती है। अत: हरि सिंह ने वहां के लड़ाकू तथा झगड़ालू अफ़ग़ान कबीलों पर पूरी दृढ़ता तथा शक्ति से अपना नियंत्रण किया तथा राज्य स्थापित किया।

श्रेष्ठतम सिख योद्धा
सरदार हरि सिंह नलवा का नाम श्रेष्ठतम सिक्ख योद्धाओं की गिनती में आता है। निहत्थे ही बाघ को चित्त कर अपनि वीरता, साहस, शारीरिक बल का परिचय किशोरावस्था में ही महाराजा रणजीत सिंह जी को दे दिया था। सभी युद्धों में वे अग्रिम दस्ते में रहते हुए नेतृत्व किया करते थे। युद्ध क्षेत्र में उन्होंने कभी पीठ नहीं दिखाई। संख्या बल में काम होने के बावजूद अनेक युद्ध में उन्होंने मुस्लिम आक्रताओं को धूल चटाई। अपने अंतिम युद्ध में भी दोस्त मोहम्मद के विशाल सेवा के सम्मुख अपने क्षीण सैन्य बल की जानकारी होने के बावजूद जमरूद के किले में अपने सेना को बचाने के लिए रुग्ण अवस्था में भी पहुंचे थे और लड़ते हुए वीरगति पाई।

वह महाराजा रणजीत सिंह की सिख फौज के सबसे बड़े जनरल थे। महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य (1799-1849) को ‘सरकार खालसाजी’ के नाम से भी निर्दिष्ट किया जाता था। ।

श्रेष्ठ सेनापति
सरदार हरि सिंह नलवा, महाराजा रणजीत सिंह के सेनाध्यक्ष थे। जिस एक व्यक्ति का भय पठानों और अफ़ग़ानियों के मन में, पेशावर से लेकर काबुल तक, सबसे अधिक था; उस शख्सियत का नाम जनरल हरि सिंह नलवा था। सिख फौज के सबसे बड़े जनरल हरि सिंह नलवा ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर अपना लोहा मनवाया। यही नहीं, काबुल पर भी सेना चढ़ाकर जीत दर्ज की। खैबर दर्रे से होने वाले इस्लामिक आक्रमणों से देश को मुक्त किया। नोशेरा के युद्ध में हरि सिंह नलवा ने महाराजा रणजीत सिंह की सेना का कुशल नेतृत्व किया था। रणनीति और रणकौशल की दृष्टि से हरि सिंह नलवा की तुलना दुनिया के श्रेष्ठ सेनानायकों से की जा सकती है।

इतिहासकारों के अनुसार हरि सिंह नलवा ने अपने जीवनकाल में लगभग 20 से अधिक युद्ध लड़े और उन सभी में जीत हासिल की।
अहमदशाह अब्दाली के पश्चात् तैमूर लंग के काल में अफ़ग़ानिस्तान विस्तृत तथा अखंडित था। इसमें कश्मीर, लाहौर, पेशावर, कंधार तथा मुल्तान भी थे। हेरात, कलात, बलूचिस्तान, फारस आदि पर उसका प्रभुत्व था।

हरि सिंह नलवा ने उक्त क्षेत्रो में महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य विस्तार में मुख्य भूमिका निभाई और कई दुर्गम क्षेत्रों को जीता। उन्होंने कसूर, सियालकोट, अटक, मुल्तान, कश्मीर, पेशावर और जमरुद में खालसा सेना की विजय पताका फहरायी थी। जमरुद की जंग में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। हरि सिंह नलवा की मृत्यु के बाद इस क्षेत्र में सिख साम्राज्य को कोई और विजय प्राप्त नहीं हुई। अंग्रेजों द्वारा पंजाब को अपने सीधे नियंत्रण में लेने तक खैबर दर्रा सिख साम्राज्य की सीमा बना रहा।

कुशल प्रशासक
सिख साम्राज्य के विस्तार के पश्चात् उन सबसे अशांत क्षेत्रों में सशक्त और कुशल प्रशासन की परंपरा स्थापित करने की उनसे अपेक्षा थी। सरदार हरि सिंह नलवा उन तीन व्यक्तियों में से एक थे जिन्हें सिंधु नदी पर स्थित अटक से सतलुज नदी पर स्थित फिल्लौर तक शासन स्थापितं करने के लिए नियुक्त किया गया था।
हरि सिंह का प्रशासनिक शासन सिख साम्राज्य के एक तिहाई हिस्से पर फैला हुआ था। उन्होंने कश्मीर (1820-21), ग्रेटर हजारा (1822-1837) के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और उन्हें दो बार पेशावर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। एक ब्राह्मण सिख महान सिंह प्रशासन से संबंधित कई मामलों में उनके द्वितीय अधिकारी थे।

कश्मीर में सिख शासन को मुसलमान दमनकारी मानते थे क्योंकि सिखों ने कई कानून बनाए जिनमें गौहत्या के लिए मृत्युदंड देना, श्रीनगर में जामिया मस्जिद को बंद करना और अज़ान पर प्रतिबंध लगाना शामिल था। मुसलमान का ऐसा मानने के पीछे एक यह भी महत्वपूर्ण कारण था कि सदियों से मुसलमानों के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में सिखों का शासन मुसलमानों के राजनीतिक इतिहास में अपवाद था। ‘ काफिरों ‘ द्वारा शासित होना किसी भी मुसलमान के लिए सबसे बड़ा अपमान माना जाता था। 1819 ईस्वी में सिखों के कश्मीर आने से पहले अफ़गानों ने 67 वर्षों तक इस पर शासन किया था। मुसलमानों के लिए सिख शासन उस स्थान के इतिहास का सबसे अंधकारमय काल था, जबकि कश्मीरी हिंदुओं के लिए अफ़गान शासन से भी बदतर कुछ नहीं था। वहां हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन, महिलाओं से बलात्कार, मंदिरों को अपवित्र करना और गायों का वध करना आम बात थी। हिंदूओं के दमन के कारण ही महाराजा रणजीत सिंह ने हरि सिंह नलवा को कश्मीर विजय के लिए नियुक्त किया था।

दूरदराज के क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के सिखों के प्रयासों के कारण उन्हें मस्जिदों को बंद करना पड़ा और नमाज़ के लिए अज़ान पर प्रतिबंध लगाना पड़ा क्योंकि मुस्लिम मौलवी हर बहाने ‘ जिहाद ‘ का आह्वान करके आबादी को उन्माद में धकेल रहे थे। गाय की हत्या हिंदू आबादी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती थी और इसलिए सिख साम्राज्य में इसके लिए मृत्युदंड दिया जाता था। मुस्लिम आतताईयों और अन्य धर्मावलंबियों के प्रति उनके व्यवहार को ध्यान में रखते हुए हरि सिंह ने सख्त रवैया अपनाया।

कूटनीतिक प्रतिभा
1831 में, हरि सिंह नलवा को ब्रिटिश भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक के पास एक राजनयिक मिशन का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया गया था। इसके तुरंत बाद महाराजा रणजीत सिंह और ब्रिटिश भारत के प्रमुख के बीच रोपड़ बैठक हुई । ब्रिटिश रणजीत सिंह को सिंधु नदी को व्यापार के लिए खोलने के लिए राजी करना चाहते थे। महाराजा ने इसे अपने पुत्र खरक सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित करवाने का एक अच्छा अवसर समझा । हरि सिंह नलवा ने इस तरह के किसी भी कदम का कड़ा विरोध किया।

उत्कृष्ट निर्माण कार्य
नलवा एक कुशल निर्माता भी थे। कम से कम 56 इमारतों का निर्माण उनसे जुड़ा हुआ है, जिनमें किले, प्राचीरें, मीनारें, गुरुद्वारे, तालाब, समाधियाँ , मंदिर, मस्जिदें, कस्बे, हवेलियाँ , सराय और उद्यान शामिल हैं।

उन्होंने 1822 में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत स्थित हजारा में हरि सिंह के नाम पर बसाए गए हरिपुर जिला और तहसील में किलेबंद शहर का निर्माण किया। यह इस क्षेत्र का पहला सुनियोजित शहर था, जिसमें एक उत्कृष्ट जल वितरण प्रणाली थी। पहाड़ों की तलहटी में घाटी में स्थित उनके बेहद मजबूत किले हरकिशनगढ़ में चार द्वार थे। यह चार गज मोटी और 16 गज ऊंची दीवार से घिरा हुआ था। नलवा की उपस्थिति ने इस क्षेत्र में सुरक्षा की ऐसी भावना पैदा की कि जब ह्यूगल ने 1835-36 में हरिपुर का दौरा किया, तो उन्होंने शहर को चहल-पहल से भरा पाया। बड़ी संख्या में खत्री वहाँ आकर बस गए और एक समृद्ध व्यापार स्थापित किया। , , उनके नाम पर नामित हैं।
नलवा ने 1799 में जागीर के रूप में प्राप्त गुजरांवाला की समृद्धि में उल्लेखनीय योगदान किया जो मृत्युपर्यन्त उनके शासन तले रहा।
उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा के सिंधु नदी पार क्षेत्र में सिख साम्राज्य के सभी मुख्य किलों का निर्माण करवाया।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व
एक धार्मिक व्यक्ति, नलवा ने हरिपुर के दक्षिण-पश्चिम और रावलपिंडी के उत्तर-पश्चिम में स्थित हसन अब्दाल कस्बे में गुरु नानक की उस क्षेत्र की यात्रा की स्मृति में गुरुद्वारा पंजा साहिब का निर्माण करवाया। उन्होंने अमृतसर में हरमंदिर साहिब परिसर के भीतर अकाल तख्त के गुंबद को ढकने के लिए आवश्यक सोना दान किया था।

अपूर्व वीरता का प्रदर्शन
नलवा की लड़ाई की विरासत ने अफगानिस्तान पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि अफगानी माताएं शरारती बच्चों को डराने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करती थीं, ‘चुप हो जा बेटा, नहीं तो नलवा आ जाएगा।’

एक और विशेष बात यह है कि अनेक मुस्लिम और भारतीय इतिहासकार जिन अफगानों की वीरता के किस्से गाते नहीं थकते, नलवा ने उनको युद्ध क्षेत्र में यह कहते हुए अभयदान दिया कि तुम लोगों को सैनिक वेशभूषा छोड़कर महिलाओं के वेशभूषा धारण करनी होगी। तत्पश्चात् सारे अफगान सैनिकों ने अपनी जान बचाने के लिए महिलाओं की सलवार कमीज पहनी और तब से लेकर आज तक महिलाओं की सलवार कमीज पहने दृष्टिगोचर होते हैं।

हरि सिंह नलवा की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र जवाहर सिंह नलवा और अर्जन सिंह नलवा ने सिख राज्य की संप्रभुता की रक्षा के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, जिनमें से जवाहर सिंह नलवा चिल्लियांवाला की लड़ाई में अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध हैं ।

हरि सिंह नलवा का जीवन युद्ध गाथागीतों का एक लोकप्रिय विषय बन गया।
उनके शुरुआती जीवनीकार कादिर बख्श उर्फ कादरयार, मिस्र हरि चंद उर्फ कादरयार और राम दयाल सभी 19वीं सदी के कवि थे।

20वीं शताब्दी में, 1967 की बॉलीवुड फिल्म उपकार के गीत ‘ मेरे देश की धरती’ में नायक के इस कथन के साथ उनकी प्रशंसा की गई है, ‘ रंग हरा हरि सिंह नलवे से’। अमर चित्र कथा ने हरि सिंह नलवा की जीवनी पहली बार 1978 में प्रकाशित की।

30 अप्रैल 2013 को भारतीय संचार मंत्री कपिल सिबल ने हरि सिंह की पुण्यतिथि की 176वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

हरि सिंह नलवा, खालसा के चैंपियन 1791-1837 , जनरल के प्रत्यक्ष वंशज वनीत नलवा द्वारा लिखित जीवनी 2009 में प्रकाशित हुई थी। इसे ऑलमाइटी मोशन पिक्चर की प्रभलीन कौर द्वारा एक भारतीय फीचर फिल्म में रूपांतरित किया जा रहा है।

भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा , उनकी पांचवीं पीढ़ी के प्रत्यक्ष वंशज हैं।

निष्कर्ष
हरि सिंह नलवा का भारतीय इतिहास में एक सराहनीय एवं महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वे केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी निर्माता भी थे।
भारत के उन्नीसवीं सदी के समय में उनकी उपलब्धियों की मिसाल पाना महज असंभव है। इनका निष्ठावान जीवनकाल हमारे इस समय के इतिहास को सर्वाधिक सशक्त करता है। परंतु इनका योगदान स्मरणार्थक एवं अनुपम होने के बावज़ूद भी पंजाब की सीमाओं के बाहर अज्ञात बन कर रहे गया है। इतिहास की पुस्तकों के पन्नो भी इनका नाम लुप्त है। जहाँ ब्रिटिश, रूसी और अमेरिकी सैन्य बलों को विफलता मिली, इस क्षेत्र में सरदार हरि सिंह नलवा ने अपनी सामरिक प्रतिभा और बहादुरी की धाक जमाने के साथ सिख-संत सिपाही होने का उदाहरण स्थापित किया था। यह इतिहास में पहली बार हुआ था कि पेशावरी पश्तून, पंजाबियों द्वारा शासित थे। इसलिये रणनीति और रणकौशल की दृष्टि से हरि सिंह नलवा की तुलना दुनिया के श्रेष्ठ जनरलों से की जाती है।

नोट: पंजाबी समाज के इतिहास की अधिकृत जानकारी का अभाव है। त्रेता युग में भगवान राम एवं अरुट जी महाराज के शासन काल के पश्चात्वर्ती द्वापर युग एवं कलयुग की प्रारंभिक शताब्दियों के बारे में इतिहासकार मौन हैं। इसी क्रम में महाराज पोरस के शासनकाल के पश्चात् 315 ईसा पूर्व से लेकर गुरु नानकदेव जी तक के कालखंड की सूचनाओं का भी अभाव है।

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