“शेरे पंजाब” महाराजा रणजीत सिंह (1780-1839) का जन्म 13 नवंबर 1780 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बचपन में चेचक के कारण उनकी बाईं आंख की रोशनी चली गई थी। मात्र 12 वर्ष की आयु में पिता महा सिंह के निधन के बाद उन्होंने शुकरचकिया मिसल की कमान संभाली। उन्होंने विभिन्न सिख मिसलों को एकजुट कर 1801 में खुद को “पंजाब का महाराजा” घोषित किया।

महाराजा रणजीत सिंह ने 19वीं शताब्दी में एक न्यायपूर्ण, संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष एवं अत्यन्त शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी लाहौर थी। यह साम्राज्य पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में सतलुज नदी तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में सिंध तक फैला हुआ था। इसमें आज का पाकिस्तानी पंजाब, भारतीय पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और खैबर पख्तूनख्वा शामिल थे।

महाराजा रणजीत ने अफ़ग़ानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया जिससे पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर उनका अधिकार हो गया। यह पहला अवसर था जब पश्तूनों पर किसी ग़ैर-मुस्लिम ने राज किया। उसके बाद उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया।

तत्कालीन समय में यूरोपीय पद्धति पर आधारित आधुनिकतम “सिख ख़ालसा सेना” गठित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है जिसमें फ्रांस सहित कई विदेशी अधिकारी शामिल थे। उनके नेतृत्व में पंजाब बहुत शक्तिशाली राज्य बन गया था। इसकी शक्तिशाली सेना के कारण ब्रिटेन लंबे समय तक पंजाब को हड़प नहीं पाया। एक समय में पंजाब ही एकमात्र ऐसा राज्य था जिस पर अंग्रेजों का अधिकार नहीं था। ब्रिटिश इतिहासकार जे टी व्हीलर के मतानुसार यदि वो एक पीढ़ी पुराने होते तो पूरे हिंदुस्थान पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेते।

बहुमूल्य हीरा कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के ख़ज़ाने की रौनक था जो उन्होंने 1813 में अफ़गान शासक शाह शुजा दुर्रानी को हरा कर लाहौर में प्राप्त किया था। 1839 में महाराजा रणजीत सिंह का निधन हो गया। उनके जाने के बाद सिख साम्राज्य कमजोर होता चला गया। ऐतिहासिक अंग्रेज-सिख युद्ध के बाद 30 मार्च 1849 के दिन पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया गया और बहुमूल्य कोहिनूर हीरा इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया जो आज भी ब्रिटेन के राज प्रमुख के मुकुट में जड़ा हुआ है।

महाराजा रणजीत सिंह जी स्वयं अनपढ़ थे लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक धार्मिक स्थानों का पुनरुद्धार किया।

अमृतसर में हरमिंदर साहिब पर सोना मढ़वाया जिससे इसे स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। 1835 में काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी में उन्होंने मंदिर के कलश को स्वर्णपत्र से मढ़ने के लिए लगभग 1 टन सोना दान किया था। बिहार में गुरु गोविंद सिंह जी के जन्मस्थान पर तख्त श्री पटना साहिब का पुनरुद्धार और भव्य गुरुद्वारे का निर्माण कराया। उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जी के निर्वाण स्थल नांदेड़, महाराष्ट्र में तख्त श्री हजूर साहिब का पुनर्निर्माण कराया। इनके समय में अमृतसर में गुरुद्वारा बाबा अटल की नौ मंजिला मीनार का निर्माण भी हुआ।

वे एक धर्मनिरपेक्ष शासक थे जिनके दरबार में हिंदू, मुस्लिम और सिख सभी शामिल थे। उन्होंने अपने राज्य में न्याय और सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया।

27 जून 1839 को लाहौर में उनका निधन हो गया।उनकी समाधि आज भी लाहौर में स्थित है।

महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल पंजाब के इतिहास में वीरता, आधुनिकता, समृद्धि और सांप्रदायिक सौहार्द का सुनहरा युग माना जाता है