लोमहर्षक

तुस्सी कट्टो बापूजी, मैं मुसलमानी नहीं बनांगी…

दिल दहलाने वाली सत्य घटना…

1 बाप, 7 बेटियां और गुजरांवाला का एक कुआं…

गुजरांवाला, पाकिस्तान पंजाब का एक शहर। सरदार हरि सिंह नलवा की जमीन। यहां कभी एक पंजाबी हिंदू खत्री परिवार रहता था। मुखिया थे, लाला जी उर्फ बलवंत खत्री। बड़े जमींदार। शानदार कोठी थी। लाला जी का एक भरा पूरा परिवार इस कोठी में रहता था। पत्नी थी, प्रभावती और बच्चे थे आठ। सात बेटियां और एक बेटा।

लाला जी के बेटे बलदेव की उम्र तब 20 साल थी। उससे छोटी लाजवंती (लाजो) 19 साल की थी। राजवती (रज्जो) 17 तो भगवती (भागो) 16 की थी। पार्वती (पारो) 15 साल और गायत्री (गायो) 13 तथा ईश्वरी (इशो) 11 बरस की थी। सबसे छोटी उर्मिला (उर्मी) 9 बरस की थी। जल्द ही फिर से कोठी में किलकारियां गूंजने वाली थी। प्रभावती पेट से थीं।
यह साल 1947 की बात है। हम आजाद हो गए थे। भारत का बंटवारा हो गया था। जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान कर दिया था। गुजरांवाला के आसपास के इलाकों से हिंदू सिखों के कत्लेआम की खबरें आने लगी थी। ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शोर करती भीड़ यलगार करती, काफिरों की औरतें भारत न जा पाएं। हम उन्हें हड़प लेंगे।

पर लाला जी बेफिक्र थे। उन्हें गांधी के आदर्शों पर यकीन था। उन्हें लगता था ये कुछ मजहबी मदांध हैं। दो चार दिन में शांत हो जाएंगे। और गुजरांवाला तो जट, गुज्जरों और राजपूत मुसलमानों का शहर है। सब ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया’ गाने वाले लोग हैं। बाबा बुल्ले शाह और बाबा फरीद की कविताएं पढ़ते हैं। सूफी मजारों पर जाते है। लाला जी का मन कहता था, सब भाई हैं। एक दूसरे का खून नहीं बहाएंगे।

18 सितंबर 1947। एक सिख डाकिया हांफते हुए हवेली पहुचा। चिल्लाया, लाला जी इस जगह को छोड़ दो। तुम्हारी बेटियों को उठाने के लिए वे लोग आ रहे हैं। लज्जो को सलीम ले जाएगा। रज्जो को शेख मुहम्मद। भगवती को… लाला बलवंत ने उस डाकिए को जोरदार तमाचा जड़ा। कहा, क्या बकवास कर रहे हो। सलीम, मुख्तार भाई का बेटा है। मुख्तार भाई हमारे परिवार की तरह हैं।

उसका जवाब था, “मुख्तार भाई ही भीड़ लेकर निकले हैं, लाला जी। सारे हिंदू-सिख भारत भाग रहे हैं। 300-400 लोगों का एक जत्था घंटे भर में निकलने वाला है। परिवार के साथ शहर के गुरुद्वारे पहुंचिए।” यह कह वह सिख डाकिया सरपट भागा। उसे दूसरे घर तक भी शायद खबर पहुंचानी रही होगी।

लाला जी पीछे मुड़े तो सात महीने की गर्भवती प्रभावती की आंखों से आंसू निकल रहे थे। उसने सारी बात सुन ली थी। उसने कहा, लाला जी हमे निकल जाना चाहिए। मैंने बच्चों से गहने, पैसे, कागज बांध लेने को कहा है। पर लाला जी का मन नहीं मान रहा था। कहा, हम कहीं नहीं जाएंगे। सरदार झूठ बोल रहा है। मुख्तार भाई ऐसा नहीं कर सकते। मैं खुद उनसे बात करूंगा। प्रभावती ने बताया, वे पिछले महीने घर आए थे। कहा कि सलीम को लाजो पसंद है। वे चाहते हैं कि दोनों का निकाह हो जाए। लज्जो ने भी बताया था कि सलीम अपने दोस्तों के साथ उसे छेड़ता है। इसी वजह से उसने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। लाला बलवंत बोले, तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई। मैं मुख्तार भाई से बात करता। प्रभावती बोलीं, आप भी बहुत भोले हैं। मुख्तार भाई खुद लाजो का निकाह सलीम से करवाना चाहते हैं। अब उसे जबरन ले जाने के लिए आ रहे हैं।
गुरुद्वारा हिंदू सिखों से खचाखच भरा था। पुरुषों के हाथों में तलवारें थी। गुजरांवाला पहलवानों के लिए मशहूर था। कई मंदिरों और गुरुद्वारों के अपने अखाड़े थे। हट्टे कट्टे हिंदू सिख गुरुद्वारे के द्वार पर सुरक्षा में मुस्तैद थे। कुछ लोग छत से निगरानी कर रहे थे। कुछ लोग कुएं के पास रखे पत्थरों पर तलवारों को धार दे रहे थे। महिलाएं, लड़कियां और बच्चे दहशत में थे। माएं नवजातों और बच्चों को सीने से चिपकाए हुईं थी।
अचानक एक भीड़ की आवाज आनी शुरू हुई। यह भीड़ बड़ी मस्जिद की तरफ से आ रही थी। वे नारा लगा रहे थे,

– पाकिस्तान का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह

– हंस के लित्ता पाकिस्तान, मार के लवांगे हिंदुस्तान

– वड्डना-कट्टना असी सिखावांगे

– किसी मंदर विच घंटी नहीं वजेगी हुण

– हिंदू दी जनानी बिस्तर विच, ते हिंदू मसान विच

प्रभावती गुरुद्वारे की एक खिड़की के पास बेटियों के साथ बैठी थी। इकलौता बेटा मुख्य दरवाजे के बाहर मुस्तैद था। अचानक भीड़ की आवाज शांत हो गई। फिर मिनट भर के भीतर ही ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का वही शोर शुरू हो गया। हर सेकेंड के साथ शोर बढ़ती जा रही थी। भीड़ में शामिल लोगों के हाथों में तलवार, फरसा, चाकू, चेन और अन्य हथियार थे। गुरुद्वारा उनका निशाना था।

गुरुद्वारे का प्रवेश द्वार अंदर से बंद था। कुछ लोग द्वार पर तो कुछ दीवार से सट कर हथियारों के साथ खड़े थे। अचानक पास के मंदिर के पुजारी और पहलवान सुखदेव शर्मा की आवाज गूंजी। वे बोले, “वे हमारी मां, बहन, पत्नी और बेटियों को लेने आ रहे हैं। उनकी तलवारें हमारी गर्दन काटने के लिए है। वे हमसे समर्पण करने और धर्म बदलने को कहेंगे। मैंने फैसला कर लिया है। झुकूंगा नहीं, अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा, न ही उन्हें अपनी स्त्रियों को छूने दूंगा” चंद सेकेंड के सन्नाटे के बाद “हर हर महादेव” “जय भवानी” “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह” के जोशीले नारे गूंजने लगे। वहां मौजूद हर किसी ने हुंकार भरी, हममें से कोई अपने पुरखों का धर्म नहीं छोड़ेगा।

50-60 लोगों ने गुरुद्वारे में घुसने की कोशिश की। देखते ही देखते रणबांकुरों ने सबके सिर धड़ से अलग कर दिए। गुरुद्वारे में मौजूद लोगों को कोई नुकसान नहीं हुआ था। महिलाएं और बच्चे भी अंदर हॉल में सुरक्षित थे। यह देख वह मज़हबी भीड़ गुरुद्वारे से थोड़ा पीछे हट गई। करीब 30 मिनट तक मंदिर से 50 मीटर दूर वे खड़े होकर मज़हबी नारे लगाते रहे। ऐसा लग रहा था मानो उन्हें किसी चीज का इंतज़ार है। जिसका इंतज़ार था, वे आ गए थे। हजारों का हुज़ूम। गुरुद्वारे के अंदर मुश्किल से 400 हिंदू-सिख। उनमें 50-60 युवा। बाकी बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे।

अंतिम लड़ाई का क्षण आ चुका था। भीड़ एक सिख महिला को कहीं से पकड़ लाई थी, उसे आगे खींचा। वह पूर्णतः नग्न और अचेत थी। भीड़ में शामिल कुछ लोग उसे नोंच रहे थे। अचानक किसी ने उसका वक्ष तलवार से काट डाला और उसे गुरुद्वारे के भीतर फेंक दिया।

गुरुद्वारे में मौजूद गुजरांवाला के हिंदू-सिखों ने इससे पहले इस तरह की बर्बरता के बारे में सुना ही था। पहली बार आंखों से देखा। अब हर कोई अपनी स्त्री के बारे में सोचने लगा। यदि उनकी मौत के बाद उनकी स्त्री इनके हाथ लग गईं तो क्या होगा? उन्हें अब केवल मौत ही सहज लग रही थी। उसके अलावा सब कुछ भयावह।

भीड़ ने दरवाजे पर चढ़ाई की। कत्लेआम मच गया। हिंदू सिख लड़े बांकुरों की तरह। पर गिनती के लोग, हजारों के हुज़ूम के सामने कितनी देर टिकते…

लाजो ने कहा, तुस्सी कट्टो बापूजी, मैं मुसलमानी नहीं बनांगी। बापूजी यानि लाला बलवंत रोने लगे। आवाज नहीं निकल पा रही थी। लाजो ने फिर कहा, जल्दी करो बापूजी, मुसलमान पहुंचने ही वाले हैं। लालाजी रोते ही रहे। भला कोई बाप अपने हाथों अपनी बेटियों की हत्या कैसे करे? लाजो ने कहा, बापूजी यदि आपने नहीं मारा तो वे मेरी छातियां…! बात पूरी होने से पहले ही लाला जी ने लाजो का सिर धड़ से अलग कर दिया। अब राजो की बारी थी। फिर भागो… पारो… गायो… इशो… और आखिरकार उर्मी। लाला जी हर बेटी का माथा चूमते गए और सिर धड़ से अलग करते गए। सबको एक-एक कर मुक्ति दे दी। लेकिन उस मज़हबी भीड़ से मृत महिलाओं का शरीर भी सुरक्षित नहीं था। नरपिशाचों के हाथ बेटियों का शरीर न छू ले, यह सोच सबके शवों को लाला जी ने गुरुद्वारे के कुएं में डाल दिया।

लालाजी ने प्रभावती से कहा, गुरुद्वारे के पिछले दरवाजे पर तांगा खड़ा है, तुम बलदेव के साथ निकलो। कुछ लोग तुम्हें सुरक्षित स्टेशन तक लेकर जाएंगे। वहां से एक जत्था भारत जाएगा। तुम दोनों निकलो। प्रभावती ने कहा, मैं आपके बिना कहीं नहीं जाऊंगी। लाला जी बोले, तुम्हें अपने पेट में पल रहे बच्चे के लिए जिंदा रहना होगा। तुम जाओ, मैं पीछे से आता हूं। लाला जी ने प्रभावती का माथा चूमा। बलदेव को गले लगाया और कहा, जल्दी करो। तांगा प्रभावती और बलदेव को लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

फिर लाला जी ने खुद को चाकुओं से गोदा और उसी कुएं में छलांग लगा दी जिसमें सात बेटियों को काट कर डाला था। आखिर दो बच्चों के पास उनकी मां थी। सात बच्चों के पास उनके पिता का होना तो बनता था..!

आज सामने लाला जी के बेटे बलदेव का पोता है जो अपने दादा, पिता से सुनी कहानी अक्षरश: बयान कर रहा है।
दोनों गाल आंसुओं से भीगे हुए थे,
उसके ही नहीं, मेरे भी…!
भारत विभाजन में उन्होंने अपने परिवार के 28 सदस्य खोए थे। लालाजी और उनकी सात बेटियां, लाला जी के भाई बहन और उनके परिवार के कई लोग। लाला जी की पत्नी, बेटे बलदेव और अजन्मे संतान के साथ जान बचाकर भारत आने में कामयाब रही थीं। वे पंजाब के अमृतसर में आकर रहने लगे थे।

भारत पाक विभाजन

1947 में भारत के विभाजन के दौरान पंजाब की त्रासदी इतिहास की सबसे हिंसक और दर्दनाक घटनाओं में से एक थी, जिसमें 20 लाख से भी अधिक लोगों की जान गई और 1.46 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए।

पंजाब का विभाजन केवल एक भौगोलिक सीमा रेखा का खिंचना नहीं था बल्कि यह एक समृद्ध सभ्यता, संस्कृति और लाखों परिवारों का विखंडन था।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन की औपचारिक घोषणा 3 जून 1947 को की गई थी जिसे ‘माउंटबेटन योजना’ के नाम से जाना जाता है। अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने देश को भारत और पाकिस्तान में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित कर इस योजना को मंजूरी दी।

विभाजन की घोषणा के बाद सीमाओं के निर्धारण का बेहद संवेदनशील काम था। पंजाब और बंगाल प्रान्तों को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया जाना था। इसके लिए दो बाउंड्री कमीशन एक पंजाब और एक बंगाल के लिए बनाये गये। प्रत्येक कमीशन में चार उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, दो हिन्दू और दो मुसलमानों को शामिल किया गया था लेकिन दोनों ही कमीशन किसी निर्णायक स्थिति पर नहीं पहुंच पा रहे थे। ऐसे में इस कार्य के तीव्र निर्धारण के लिए एक ब्रिटिश वकील सायरिल रेडक्लिफ को दो सीमा आयोगों की अध्यक्षता करने के लिए नियुक्त किया – एक बंगाल के लिए और एक पंजाब के लिए।

भारत आने से पहले रेडक्लिफ को लन्दन स्थित ब्रिटिश सरकार के परमानेंट अंडर सेक्रेटरी ने बुलाया और एक बड़े से नक्शे के माध्यम से मात्र 30 मिनट में बता दिया कि उसे 9 करोड़ लोगों के नए घरों, जीवनयापन और राष्ट्रीयता को कैसे निर्धारित करना है। अपनी नियुक्ति से पहले, रेडक्लिफ ने कभी भारत का दौरा नहीं किया था और न ही वहाँ किसी को जानता थे। अंग्रेजों और आपस में लड़ रहे मुस्लिम लीग व कांग्रेस के राजनेताओं, दोनों के लिए, इस तटस्थता को एक गुण माना जाता था। उन्हें ब्रिटेन को छोड़कर किसी भी पक्ष के प्रति निष्पक्ष माना जाता था। केवल उनके निजी सचिव क्रिस्टोफर ब्यूमोंट, पंजाब के प्रशासन और जीवन से परिचित थे। निष्पक्षता का आभास बनाए रखने के लिए रेडक्लिफ ने वायसराय माउंटबेटन से भी दूरी बनाए रखी।

आयोग को निर्देश दिया गया था कि वह “मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों” का पता लगाकर बंगाल व पंजाब के दो भागों की सीमाओं का सीमांकन करे। ऐसा करते समय, वह अन्य कारकों को भी ध्यान में रखेगा। अन्य कारक अपरिभाषित थे जिससे रेडक्लिफ को कुछ छूट मिली लेकिन उनमें “प्राकृतिक सीमाओं, संचार, जलमार्गों और सिंचाई प्रणालियों” के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक विचार भी शामिल थे। प्रत्येक आयोग में चार प्रतिनिधि भी शामिल किए गए—दो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से और दो मुस्लिम लीग से। बंगाल सीमा आयोग में कांग्रेस के न्यायमूर्ति सी.सी. बिस्वास, बी.के. मुखर्जी और मुस्लिम लीग के अबू सालेह मोहम्मद अकरम और सारा रहमान शामिल थे। पंजाब आयोग के कांग्रेस के सदस्य न्यायमूर्ति मेहर चंद महाजन व तेजा सिंह तथा मुस्लिम लीग के दीन मोहम्मद और मोहम्मद मुनीर थे । दोनों पक्षों के हितों में गतिरोध और उनके कटु संबंधों को देखते हुए, अंतिम निर्णय अनिवार्य रूप से रेडक्लिफ का ही था।

8 जुलाई 1947 को भारत पहुंचने के बाद रेडक्लिफ को सीमा निर्धारण के लिए केवल पांच सप्ताह का समय दिया गया था। वे अपने सहपाठी माउंटबेटन से मिले और आयोग के सदस्यों, मुख्य रूप से कांग्रेस से नेहरू और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष जिन्ना से मिलने के लिए लाहौर और कलकत्ता की यात्रा की।

आश्चर्यजनक बात यह रही कि इस काम के लिए रेडक्लिफ को दिए मात्र पांच सप्ताह का समय में ही उसने अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंप दी। कहा जाता है कि विवादों और देरी से बचने के लिए दो देशों को निर्धारित करने वाली सीमा रेखा रेडक्लिफ ने अविभाजित भारत के नक्शे पर खींच दी थी और इसे वास्तविक विभाजन होने के दो दिन बाद तक प्रकाशित नहीं करके गुप्त रखा गया था। इससे लोगों में डर और भ्रम की स्थिति और बढ़ गई क्योंकि उन्हें यह पता नहीं लग रहा था कि वे किस देश में जाने वाले हैं। ऐसे में अफवाहों का बाजार गर्म था।

सीमा रेखा खींचने वाले व्यक्ति का निर्णय महज एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह लाखों लोगों के जीवन और मृत्यु का मामला था। गौरतलब है कि सीमाओं के निर्धारण का काम दो महीनों से भी कम समय में हो गया। निर्धन के बाद इसका क्रियान्वयन भी कम जल्दबाजी में नहीं हुआ था। 16 अगस्त 1947 को शाम 5:00 बजे भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को रिपोर्ट की प्रतियों का अध्ययन करने के लिए केवल दो घंटे का समय दिया गया था।

विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान की नवगठित सरकारों पर अपने अपने देशों की सीमाओं को व्यवस्थित करने की पूरी ज़िम्मेदारी आ गई। अगस्त में लाहौर का दौरा करने के बाद वायसराय माउंटबेटन ने लाहौर के आसपास शांति बनाए रखने के लिए जल्दबाजी में पंजाब सीमा बल का गठन किया लेकिन 50,000 सैनिक, लाखों हत्याओं को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थे जिनमें से 77% हत्याएं ग्रामीण क्षेत्रों में हुई थीं। क्षेत्र के आकार को देखते हुए, यह बल प्रति वर्ग मील एक सैनिक से भी कम था। यह शहरों की रक्षा के लिए भी पर्याप्त नहीं था और उन लाखों विस्थापितों के काफिलों की रक्षा के लिए तो और भी कम था जो अपने गांवों-शहरों से भाग कर भारत जा रहे थे। 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ की वह रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिससे सीमा के दोनों ओर रह रहे लोग अचानक अपनी ही ज़मीन पर “विदेशी” बन गए।  रेडक्लिफ ने इस आकस्मिक विभाजन को इस सर्वमान्य तथ्य से उचित ठहराया कि चाहे वह कुछ भी करे, लोगों को कष्ट सहना ही पड़ेगा। इस औचित्य के पीछे की सोच शायद कभी ज्ञात न हो सके क्योंकि रेडक्लिफ ने भारत छोड़ने से पहले अपने सभी कागजात नष्ट कर दिए थे।

रेडक्लिफ तो भारत विभाजन वाले दिन ही ब्रिटेन चला गया लेकिन अभी इतिहास का सबसे क्रूरतम अध्याय लिखा जाना बाकी था।

अंततः जैसा बाबासाहेब आंबेडकर ने कल्पना की थी, वैसा ही हुआ। सांप्रदायिक विभाजन का हश्र बहुत ही भयावह था। लियोनार्ड मोसेली अपनी पुस्तक के पृष्ठ 279 पर लिखते हैं, अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 46 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 10-20 लाख लोगों की हत्या कर दी गयी। नन्हे मुन्ने बच्चों को पैरों से पकड़ कर उनके सिर दीवार पे फोड़ दिये गए। युवा महिलाओं व छोटी छोटी बच्चियों से सामूहिक बलात्कार किया गया, उनके स्तन काटे गये। गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल कर और कहीं शिशुओं को भालों की नोक पर किसी ट्रॉफी की तरह घुमाया गया।
त्रासदी के प्रमुख पहलू

बड़े पैमाने पर विस्थापन: पंजाब ने दुनिया का सबसे बड़ा मानव विस्थापन देखा। लगभग 1.46 करोड़ लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा के उस पार जाना पड़ा। विस्थापितों से भरी रेलों पर हमले किए गए और उन लाशों के खून से लथपथ रेलें भारत के स्टेशनों पर पहुंचने लगीं।

महिलाओं पर अत्याचार: विभाजन के दौरान महिलाओं को सबसे अधिक कष्ट झेलना पड़ा। लगभग 90,000 महिलाओं का अपहरण किया गया और उनके साथ बलात्कार व जबरन धर्म परिवर्तन जैसी घटनाएं हुईं। कई परिवारों ने अपनी “मर्यादा” बचाने के नाम पर अपनी ही बेटियों और पत्नियों की हत्या कर दी।

पंजाब की पांच नदियों (सतलुज, ब्यास, रावी, चेनाब और झेलम) का क्षेत्र बँट गया। भगवान राम के पुत्र लव के बसाये नगर लाहौर जैसा सांस्कृतिक केंद्र पाकिस्तान के पास चला गया, पंजाबियों की कुलदेवी हिंगलाज माता, महर्षि पाणिनि की जन्मस्थली शालातुर, तत्कालीन समय के विश्व विख्यात विश्वविद्यालय तक्षशिला, गुरु नानक की जन्मस्थली ननकाना साहिब, बप्पा रावल की रावलपिंडी और सर्वाधिक उपजाऊ भूमि भी पाकिस्तान में चली गई।

1947 में भारत का विभाजन सिर्फ एक भौगोलिक बंटवारा नहीं था, बल्कि सदियों से एक जमीन पर साथ रह रहे समुदायों का हिंसक विच्छेद था।

पंजाब की यह त्रासदी आज भी लोगों के मानस पटल पर एक अमिट छाप छोड़े हुए है। भारत सरकार ने  उन लोगों की स्मृति में जिन्होंने वास्तव में स्वतंत्रता की कीमत अपनी जान-इज्जत, जमीन-जायदाद गंवा कर चुकाई, उनकी पीड़ा की स्मृति में एवं हताहत हुए नागरिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है।

विभिन्न शहरों में विभाजन विभीषिका

लाहौर

विभाजन के दौरान लाहौर शहर के भविष्य को लेकर गहरा विवाद हुआ जिसके चलते सीमा आयोग के समक्ष कार्यवाही में यह सबसे विवादित क्षेत्र बन गया। लाहौर तत्कालीन पंजाब प्रांत की राजधानी, सबसे बड़ा शहर और पंजाब का प्रमुख वाणिज्यिक एवं विनिर्माण केंद्र था।

1941 की भारत जनगणना के अनुसार लाहौर की आधी से कुछ अधिक आबादी मुस्लिम थी, शेष हिंदू और सिख थे। विभाजन के दौरान सीमा आयोग के समक्ष हिंदू और सिख राजनेताओं ने इन आंकड़ों पर आपत्ति जताई। उन्होंने 1945 के राशन कार्ड के आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि वास्तव में मुस्लिम, आबादी का केवल 54% हिस्सा थे जो मामूली बहुमत था। वहीं हिंदुओं और सिखों के पास लाहौर की अधिकांश भूमि का मालिकाना हक था। साथ ही इसके आर्थिक, औद्योगिक व शैक्षिक क्षेत्रों पर भी दोनों समुदायों का ही वर्चस्व था। उन्होंने जोर देकर आयोग को कहा कि शहर की अर्थव्यवस्था में उनके योगदान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लाहौर की 67% दुकानें और 80% कारखाने उनके स्वामित्व में थे। वे बिक्री कर का कहीं अधिक संग्रह करते थे और बैंकों और स्टॉक एक्सचेंज पर उनका वर्चस्व था। उन्होंने शहर के सांस्कृतिक, शैक्षिक और अन्य सार्वजनिक संस्थानों में अपने योगदान दर्शाते हुए लाहौर शहर पर हिंदूओ व सिखों का मजबूत दावा पेश किया।

कह सकते हैं कि लाहौर पर हिंदुओं के पुख्ता दावे को देखते हुए ही उन्हें सबसे भीषण हिंसा का सामना करना पड़ा। अगस्त में विभाजन से पहले मार्च और अप्रैल के महीनों में यहाँ बड़े पैमाने पर दंगे हुए। 17 अगस्त, 1947 को लाहौर, पाकिस्तान को दिया गया जिसके बाद इसके हिंदू और सिख समुदायों को पूरी तरह से हटा/भगा दिया गया जो इसके आर्थिक, औद्योगिक व सांस्कृतिक पतन का कारण बना और लाहौर का पुराना राजनीतिक महत्व भी खो गया।

अविभाजित पंजाब के लाहौर (पश्चिम पंजाब) और अमृतसर (पूर्वी पंजाब) सबसे बड़े शहर थे और वही इस त्रासदी के केंद्र बिंदु बने जो महज 50 किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद दो अलग-अलग देशों के प्रतीक बन गए।

लाखों हिंदुओं सिखों का पलायन होने से लाहौर की मिश्रित संस्कृति स्थायी रूप से नष्ट हो गई। लाहौर ने अपने जीवंत ‘कल्ट’ को खो दिया। जो शहर हिंदुओं के भगवान राम के पुत्र “लव का नगर” माना जाता था, वह रातोंरात एक मुस्लिम शहर में बदल गया।

साहित्यिक गतिविधियों का उन दिनों में मुख्य केंद्र लाहौर से यशपाल और साहिर लुधियानवी, कृष्ण चंदर, भीष्म साहनी और राजिंदर सिंह बेदी जैसे हिंदू-सिख लेखक चले गए जिससे लाहौर के साहित्यिक जगत में शून्य व्याप्त हो गया।

रावलपिंडी

विभाजन से पूर्व पंजाब में हुआ “रावलपिंडी नरसंहार” सांप्रदायिक हिंसा का पहला और सबसे भीषण उदाहरण था। यह दंगा 6 मार्च 1947 को शुरू हुआ। इससे कुछ ही दिनों पूर्व हिंदू सिख समुदाय पर हुए हमलों में पंजाब सरकार में शामिल मुस्लिम लीग के नेताओं की सीधी एवं स्पष्ट भागीदारी थी। इसके विरोध में सिखों-हिंदुओं ने जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया। इस जुलूस के बाद पुनः सुनियोजित हमले हुए। ये हमले रावलपिंडी डिवीजन के ग्रामीण इलाकों में भी फैल गए। और उन्होंने इतना भीषण रूप ले लिया गांव के गांव मरघट में बदल गए। स्थानीय पुलिस और प्रशासन की मदद से की गई इस हिंसा में हिंदुओं और सिखों को सुनियोजित तरीके से खत्म किया गया। बड़ी संख्या में महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और धर्म परिवर्तन किया गया। सैंकड़ों महिलाओं ने सम्मान बचाने के लिए आत्महत्या की। इन सुनियोजित हमलों को ‘रावलपिंडी का बलात्कार’ भी कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप अप्रैल 1947 के अंत तक अधिकांश हिंदू और सिख आबादी रावलपिंडी छोड़ कर दिल्ली अमृतसर की ओर पलायन कर गई।

यह भीषण नरसंहार, जिसे पूरी तरह से भुला दिया गया, विभाजन की त्रासदी के दौरान सबसे भयावह और क्रूर अत्याचारों में से एक था।

गुजरांवाला

1947 के विभाजन के दौरान गुजरांवाला, पंजाब के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों का केंद्र था। यहाँ मुस्लिम भीड़ ने शहर में हिंदुओं और सिखों को सुनियोजित तरीके से निशाना बना कर उनके इलाकों को नष्ट कर दिया। स्थानीय मुस्लिम लोहारों द्वारा किए गए हमले विशेष रूप से क्रूर थे। यह हिंसा इतनी व्यापक थी कि इसे आधुनिक मानकों के अनुसार जातीय सफ़ाया (ethnic cleansing) माना जा सकता है। गुजरांवाला में 15,000 से अधिक हिंदू और सिख अल्पसंख्यक मारे गए थे। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 15,000 तो सिख ही हताहत हुए। सितंबर 1947 में भी कामोके में भारत जा रही एक ट्रेन पर हमला कर लगभग 340 हिंदू/सिख विस्थापितो को मार दिया गया था।

परिणामत: यह क्षेत्र भारत से आने वाले मुसलमानो का ठिकाना बना जबकि अधिकांश स्थानीय गैर-मुस्लिम आबादी या तो मारी गई या भारत पलायन कर गई।

मुल्तान

1947 में विभाजन के दौरान पाकिस्तानी पंजाब के मुल्तान में हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को भीषण हिंसा, अत्याचार और जबरन पलायन का सामना करना पड़ा। लगभग 42% गैर-मुस्लिम आबादी वाले इस शहर में उन्हें घर, जमीन और संपत्ति छोड़कर, जान बचाकर भारत भागना पड़ा जिसे अक्सर “कसाईखाना” जैसी त्रासदी के रूप में याद किया जाता है।

बंटवारे के ऐलान के बाद मुल्तान में हिंदू-सिख बस्तियों पर हमले हुए जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। लोगों को रातों-रात अपना घर छोड़ना पड़ा। यहाँ तक कि कई परिवारों को तंदूर में पकती रोटियां छोड़कर भागना पड़ा। हजारों महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। शुरुआती दौर में, स्थानीय प्रशासन और पुलिस अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में विफल रहे। अपना सबकुछ मुल्तान में छोड़ कर ये लोग भिखारियों की सी स्थिति में भारत आए।

मुल्तान की इस दर्दनाक कहानी को अक्सर “विस्थापित बस्तियों” के आंसू और उन यादों के रूप में याद किया जाता है, जहाँ एक समृद्ध, सुसंस्कृतिक और कथित भाईचारे वाला शहर, रातों-रात एक अनजान एवं शत्रु देश का हिस्सा बन गया।

बहावलपुर

बहावलपुर में भयानक त्रासदी हुई जहाँ लाखों हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को अपना घर, संपत्ति और जान गँवानी पड़ी। हिंदू और सिख समुदाय के लोगों का सुनियोजित हिंसा से भारी रक्तपात हुआ। महिलाओं के अपहरण और बलात्कार की घटनाएं भी व्यापक रूप से हुईं। जान बचाने के लिए लोगों को रातों-रात अपना पुश्तैनी घर छोड़कर भारत की तरफ पलायन करना पड़ा। विस्थापितों को भारत ले जा रही ट्रेनों पर भी संगठित एवं नियोजित रूप से हुए भयावह हमलों के कारण लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ी। हजारों लोग शरणार्थी बनकर भारत की ओर भागने को मजबूर हुए जबकि हजारों की ही संख्या में पीछे छूट गए परिजन मारे गए या लापता हो गए।

बहावलपुर का यह अध्याय विभाजन के सबसे दर्दनाक पन्नों में से एक है, जो सांप्रदायिक घृणा और विस्थापन की भयावहता को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक गांव शहरों में असंख्य हिंदू और सिखों के साथ में अमानवीय अत्याचार हुए जिसका कहीं कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है लेकिन उनके परिवार के बचे हुए सदस्य ही अपने आप में एक रिकॉर्ड हैं।

*विस्थापन संकट*

पंजाब के विभाजन के परिणामस्वरूप, एक बड़ा विस्थापन संकट पैदा हुआ। लाखों हिंदू और सिख शरणार्थी पश्चिमी पंजाब से पूर्वी पंजाब में आए। इस दौरान विस्थापितो को भयानक परिस्थितियों यथा भुखमरी, बीमारी, चोरी, हिंसा और खुले आसमान के नीचे बिना छत के वर्षा ऋतु के कोप का सामना करना पड़ा।

भारत में विस्थापितों हेतु व्यवस्था

1947 में भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए भारत सरकार ने विशेष रूप से उत्तर और पश्चिम भारत में आपातकालीन शरणार्थी कैंप (Refugee Camps) स्थापित किए थे। यह विस्थापन वैश्विक इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक पलायन में से एक था। 

प्रमुख शरणार्थी कैंप पंजाब व दिल्ली में लगे थे।
दिल्ली (मुख्य केंद्र) था जिसमें
• किंग्सवे कैंप : वर्तमान में गुरु तेगबहादुर नगर में सबसे बड़ा कैंप था। यहाँ लगभग 3 लाख लोग रह रहे थे।
• पुराना किला : यहाँ भी लाखों शरणार्थियों ने अस्थायी शरण ली थी।
• हुमायूं का मकबरा, फिरोजशाह कोटला और सफदरजंग मकबरा: ऐतिहासिक इमारतों का इस्तेमाल भी कैंप के तौर पर किया गया।

पंजाब (सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र):
• अमृतसर: यहाँ शरणार्थियों का सैलाब आया था, जहाँ बिजली पहलवान के घर सहित कई कैंप लगे थे। अमृतसर का हॉल बाजार क्षेत्र और स्वर्ण मंदिर के आस-पास का इलाका बड़ी संख्या में लाहौर से आए विस्थापितों के लिए शिविरों में तब्दील हो गया।
• जालंधर, फिरोजपुर, गुरदासपुर, लुधियाना, और अंबाला: यहाँ भी कई शिविर थे।

अन्य स्थान:
• राजस्थान: जयपुर (सिंधी कैंप), जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर।
• उत्तर प्रदेश: मेरठ, सहारनपुर।
• बॉम्बे (मुंबई): कल्याण कैंप। 

विस्थापित कैंपों की व्यवस्था:
विस्थापितों के अचानक और बड़े पैमाने पर आ जाने के कारण कैंपों में शुरुआत में स्थिति बहुत विकट थी।
• आवास व्यवस्था: शुरुआत में लोग खुले आसमान के नीचे, तंबुओं (Tents) में, या पुरानी इमारतों/कब्रों में रहने को मजबूर थे। बाद में सरकार ने टीन शेड और तंबू लगाए।
• भोजन और रसद: सरकार, आरएसएस (RSS), और गांधीजी के स्वयंसेवकों ने मिलकर भोजन की व्यवस्था की। राशन कार्ड बांटे गए और प्रति व्यक्ति दो रोटियों की व्यवस्था थी जो बाद में सुधरी।
• स्वास्थ्य और स्वच्छता: स्वास्थ्य सुविधाएं (मेडिकल एड) बहुत कम थीं। हैजा और पेचिश जैसी बीमारियां फैल गईं। मल-मूत्र त्याग के लिए भी अस्थायी, अपर्याप्त और बहुत ही बुनियादी व्यवस्था थी।
• महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा: महिलाओं का अपहरण और शोषण एक बड़ी समस्या थी। कैंपों के भीतर सुरक्षा के लिए पुलिस और वालंटियर्स तैनात किए गए थे और बिछड़े परिवारों को मिलाने के लिए कैंपों में विशेष केंद्र बनाए गए थे।
• पुनर्वास की शुरुआत: धीरे-धीरे सरकार ने इन कैंपों को बस्तियों में बदला। दिल्ली में लाजपत नगर, राजेंद्र नगर, पंजाबी बाग, मोती नगर, पटेल नगर, कालकाजी, मालवीय नगर और किंग्सवे कैंप जैसी कॉलोनियां शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए ही बसाई गईं। 

विभाजन के समय लगे इन कैंपों में भुखमरी, बीमारियों और हिंसा से पीड़ित विस्थापितों ने महीनों बिताए जिसके बाद वे भारत में अपना नया जीवन शुरू कर पाए।

*पुनर्वास और पुनर्निर्माण*

पंजाब के विभाजन के बाद, भारत सरकार ने शरणार्थियों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए कई कदम उठाए। पूर्वी पंजाब में शरणार्थी शिविर स्थापित किए गए, और शरणार्थियों को देश के विभिन्न हिस्सों में जमीन और अन्य संसाधन प्रदान किए गए।
निष्कर्ष*

पंजाब विभाजन, विगत शताब्दी की विश्व की सबसे लोमहर्षक एवं दर्दनाक घटना थी जिसने लाखों लोगों को प्रभावित किया।

1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुई भीषण सांप्रदायिक हिंसा में अनुमानतः 10 -20 लाख हिंदू और सिख मारे गए थे। यह हिंसा मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल में हुई जहाँ लाखों हिंदू और सिख विस्थापितों ने अपना घर-बार छोड़कर भारत पलायन किया।

यहां यह भी भी ध्यान देना योग्य है कि विभाजन के दौरान हुई मौतों का कोई एक आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, क्योंकि उस समय की अफरातफरी में सही गिनती करना असंभव था।
पंजाब में सबसे भयानक हिंसा, मारकाट अपहरण और बलात्कार हुए जिसका विश्व इतिहास में कोई सानी नहीं मिलता। लगभग 1.46 करोड़ लोगों ने सीमा पार विस्थापित हुए।

1947 में पाकिस्तान के बंगाल व पंजाब के अधिकांश शहरों में हिंदुओं की संख्या मुसलमानों के लगभग बराबर थी जो विभाजन के बाद घटकर 2% से भी कम रह गई।

आज भी हृदय व्यथित-द्रवित हो जाता है हमारे उन पूर्वजों के बारे में जानकर जिन्होंने सब कुछ छोड़ा किंतु धर्म नहीं छोड़ा, देश नहीं छोड़ा और सब कुछ त्याग कर चले आए अपने देश की माटी पर ताकि अपने धर्म में ही रहते हुए प्राण जाएं, इस संकल्प के साथ अपार कठिनाइयों से जूझते हुए, प्राण हथेली पर लेकर कहीं रेल, कहीं बस, कहीं बैलगाड़ी और कहीं पैदल ही बच्चों को गोद में लिये, सिर पर गठरी उठाए, वे येन-केन-प्रकारेण, लुटे-पिटे शेष भारत में आए। चूंकि वे किसी दूसरे देश से नहीं आए थे इसलिए वे शरणार्थी नहीं थे। वे तो शताब्दियों से इसी भारत भूमि पर रह रहे थे। फिरंगियों और देश के राजनेताओं ने उन्हें अपने ही देश में पराया कर दिया। इसलिए कहता हूं कि वह शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित होने के लिए विवश किए गए थे।

हमारे पूर्वजों में वह सजा भुगती, जिसकी खता किसी ओर की थी…

“खता उनकी थी जिन्हें ताज पहनना था,
सज़ा उन्हें मिली जिन्हें बस अपने घर में रहना था।”

उन समस्त पूर्वजों को शत शत नमन…
जिनके कारण हम आज भी अपने धर्म में गर्व से बने हुए हैं।

रमन कुमार सूद
820 976 9820