“पंजाबी” जब हम ये शब्द सुनते हैं तो हमारी कल्पना में क्या चित्र बनता है..?

कौन होते हैं पंजाबी..?

क्या यह कोई जाति है.. अथवा वर्ण है..?

“पंजाबी” सुनते ही किसी के भी मन में जो भाव चित्र बनते हैं…

वो शौर्य-उल्लास-उमंग-मस्ती-त्यौहार-ज़िंदादिली-अतिथि सत्कार-सबका स्वागत-अपनापन-अज़नबियों के लिए भी द्वार खोल देना-गले लगा लेना …

उपरोक्त विशेषताएं लिए यह भाव चित्र आपके मानस पटल पर केवल और केवल पंजाबियों के लिए उभरता है… है न…!
यदि पूछा जाए कि ऐसी समस्त विशेषताओं के साथ क्या विश्व में कोई अन्य समुदाय भी है..? कदाचित् उत्तर मिलेगा… नहीं…।
यही हमारी पहचान है।

ये हमारी संस्कृति है।
और संस्कृति..
रातों रात विकसित नहीं होती…
लंबे समय तक एक निश्चित भूभाग में निवास करने वाले “जन” की एक साझी भाषा-वेशभूषा-रहन सहन-खान-पान-तीज त्यौहार-जीवनमरण-धर्म-अध्यात्म मार्ग का एक स्वाभाविक क्रमिक विकास, उस भूभाग की भूमि, उसकी मिट्टी-पर्वत-खेत-खलिहानों-नदियों-तालाबों-नालों-वनों-उद्यानों के साथ-साथ अपने ऋषियों-मनीषियों, महापुरुषों के प्रति आस्था-निष्ठा-श्रद्धा का भाव और सामूहिक सुख-दुख के समान कारण इत्यादि कारक जो उस “जन” को एक सूत्र में पिरोती है…

वह बनती है संस्कृति… और जो उस जन विशेष की सामूहिक पहचान बनती है।

भारत के उत्तर पश्चिमी भूभाग में शताब्दियों तक जो जनसमूह एक साथ रहा और उनमें उपर्युक्त कारक समान रूप से विकसित हुए, उसे आज हम पंजाबी संस्कृति के रूप में जानते पहचानते हैं।

प्रारंभ में इस भूभाग को “सप्त सिंधु” का नाम मिला। कालांतर में इसे “पंचनद” भी कहा गया और देश में फारसी भाषा का प्रभाव हो जाने के कारण उसे ही पंजाब कहा गया जो विभाजन के बाद “इधर भी” और “उधर भी” आज तक चलन में है।

पंजाबी सभ्यता का उद्गम

वैदिक काल में उत्तर-पश्चिम भारत (आधुनिक पंजाब, हरियाणा ,हिमाचल, जम्मू और कश्मीरऔर पाकिस्तान का पंजाब, सिंध, पेशावर इत्यादि ) को सप्त सिंधु प्रदेश कहा गया, क्योंकि यह क्षेत्र सात प्रमुख नदियों सिंधु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), असिकनी (चिनाब), परुष्णी (रावी), विपाशा (व्यास), शतद्रु (सतलुज) से घिरा हुआ था। इसे आर्यों का प्रारंभिक निवास स्थान माना जाता है जहाँ उन्होंने अपनी संस्कृति और वेदों की रचना की।

इनमें से पांच नदियों झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज और व्यास नदी के मध्य का क्षेत्र पंचनद कहलाया। महाभारत के युद्ध में इस प्रदेश के शासकों ने कौरव सेना के पक्ष में युद्ध लड़ा जिसमें मद्रराज शल्य और शकुनि जैसे प्रमुख लोग सम्मिलित थे। पंचनद के एक छोर पर दुर्योधन की माता गांधारी के पिता का गांधार देश स्थित था। महाभारत में पंचनद का नामोल्लेख है-
‘कृत्स्नं पंचनद चैव तथैवामरपर्वतम्, उत्तरज्योतिष चैव तथा दिव्यकटं पुरम्’
इस प्रदेश को पाण्डव नकुल ने अपनी दिग्विजय यात्रा में जीता था-
‘तत: पंचनद गत्वा नियतो नियताशन:’।
महाभारत वनपर्व से पंचनद की तीर्थ रूप में भी मान्यता सिद्ध होती है।
पंचनद अग्निपुराण में भी उल्लिखित है।
विष्णुपुराण में श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के पश्चात् और द्वारका के समुद्र में बह जाने पर अर्जुन द्वारा द्वारकावासियों को पंचनद प्रदेश में बसाए जाने का उल्लेख है-
‘पार्थ: पंचनदे देशे बहुधान्यधनान्विते, चकारवासं सर्वस्य जनस्य मुनिसत्तम’।
उपर्युक्त श्लोक में पंचनद को धन-धान्य से संपन्न देश बताया गया है जो इस प्रदेश की आज भी विशेषता है।

इसी सप्त सिंधु, जिसे कालांतर में पंचनद और फिर पंजाब के नाम से जाना गया, की धरती पर चारों वेदों की रचना हुई। महर्षि कश्यप के नाम पर कश्मीर का नामकरण हुआ। द्वापर काल में हुए प्रथम विश्व युद्ध ‘महाभारत’ का शंखनाद भी इसी भूमि पर हुआ जिसका केंद्र कुरुक्षेत्र था।

विश्व की पाँच सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक सिंधु सभ्यता 5000 ईसा पूर्व से 1800 ईसा पूर्व इसी क्षेत्र में फली-फूली। सबसे प्राचीन शहर हड़प्पा, रावी नदी के प्राचीन तट पर स्थित है। सिंधु सभ्यता को प्राचीन पंजाबी सभ्यता कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

खरोष्ठी युग के बाद 300 ई.पू का समय पंजाब का एक महत्वपूर्ण युग था। इसका सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रभाव चीन तक फैला हुआ था जिसके भाषाई प्रमाण उज़्बेकिस्तान तक मिलते हैं। इस काल में विदेशों से भी कलात्मक कौशल भारत तक पहुंचे। तक्षशिला शिखर शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था।

इस संस्कृति के प्रादुर्भाव से जो एक सभ्यता विकसित हुई, उसमें वैदिक काल के चारों वर्ण थे, समस्त जातियां उपजातियां भी उपस्थित थीं। अतः पंजाबी संस्कृति के वाहक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी रहे।

“क्षत्रिय” का अपभ्रंश “खत्री”

अतीत के संदर्भों को वर्तमान से जोड़ना बहुत कठिन एवं कष्टसाध्य प्रयास है। जहां तक खत्री जाति का प्रश्न है अपने रंग-रूप, कद, बनावट, परम्पराओं एवं रीति-रिवाज़ों के अनुसार खत्री एक श्रेष्ठ क्षत्रिय आर्य जाति है। खत्री शब्द का मूल संस्कृत का क्षत्रिय है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘क्’ और ‘ष’ की युक्ति से ‘क्ष’ अक्षर बना। प्राकृत भाषा में यहीं ‘क्ष’ ‘ख’ में रूपान्तरित होकर प्रयोग में लाया जाता रहा है। साधारण बोलचाल में ‘क्ष’ अक्षर का उपयोग ‘ख’ के रूप में होने से ‘क्षत्रिय’ ‘खत्री’ के रूप में पहचाने लगे।

भगवान श्रीराम के वंशज “खत्री”

दशम गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने ग्रंथ ‘बचित्र नाटक’ में अध्याय 2 से 4 में खत्रियों का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है – “सब खत्री सूर्यवंश के हैं, सूर्यवंशी भगवान् राम के दो पुत्र थे – लव और कुश। लव के वंशज बेदी और कुश के वंशज सोढ़ी कहलाए। लव ने लाहौर और कुश ने कुशावाटी अथवा कुशुर (वर्तमान कसूर) नामक शहरों की नींव रखी।”

अकबर के इतिहासकार अबुल फजल ने आईन-ए-अकबरी में भी अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल की खत्री जाति का उल्लेख किया है। इसी में उसने यह भी लिखा कि अब खत्री, राजा (,शासक) अथवा सैनिक नहीं रहे बल्कि उन्होंने अन्य व्यवसाय अपना लिए।

सम्राट जहांगीर (1605 – 1627) ने अपनी आत्मकथा जहांगीरनामा में जातियों के बारे में बात करते हुए कहा, “जाति व्यवस्था में ब्राह्मणों के बाद दूसरी सबसे उच्च जाति छतरी है, जिसे खत्री भी कहा जाता है। छतरी जाति का उद्देश्य उत्पीड़ितों को उत्पीड़कों के आक्रमण से बचाना है।

एक खत्री कपूर राजवंश ने बंगाल के बर्दवान राज्य ने।शासन (1657-1955) किया जिसके परिणामस्वरूप पंजाब से बंगाल में खत्रियों का प्रवास बढ़ गया। जब गुरु तेग बहादुर ने 1666 में बंगाल का दौरा किया तो स्थानीय खत्रियों ने उनका स्वागत किया।

तत्कालीन पंजाब के भेरा के सुखजीवन मल खत्री का उल्लेख आता है जो अहमद शाह अब्दाली की विशाल अफगान सेनाओं को हरा कर 1754 में कश्मीर के शासक बने।

ईस्ट इंडिया कपंनी ने एक पुस्तक ‘ग्लोसरी ऑफ जूडिशियल एंड रेवेन्यू टर्म्स’ का प्रकाशन किया था जिसके लेखक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात प्रोफेसर एच. एच. विल्सन द्वारा 1885 में किए शोध के अनुसार सैनिकों व राजाओं का वर्ण संस्कृत में क्षत्रिय और हिंदी में “खत्री” शब्द है।

खत्री जाति मुख्य रूप से पंजाब और उत्तर-पश्चिमी भारत की एक प्राचीन, ऐतिहासिक रूप से योद्धा जाति रही है, जो संस्कृत के ‘क्षत्रिय’ शब्द का अपभ्रंश मानी जाती है। भगवान राम के सूर्यवंश से संबद्ध इस समुदाय ने अनेक शताब्दियों तक इस पूरे उत्तर पश्चिम क्षेत्र में शासन किया। पंजाबी खत्री समाज ने उत्तरी पश्चिमी भारत के इतिहास में अपने शौर्य और बलिदान से अनेक स्वर्णिम पृष्ठ जोड़े हैं, विशेष रूप से सप्त सिंधु अथवा पंचनद अथवा पंजाब के इतिहास में।और इस विस्तृत भूभाग में अपने साम्राज्य, शौर्य, प्रशासनिक कुशलता और उच्च शिक्षा के लिए जाने जाते रहे हैं अनेक शताब्दियों तक यह समुदाय भारत की उत्तरी पश्चिमी सीमा का प्रहरी बन कर डटा रहा।
                                 
लेकिन कालांतर में राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे व्यापार करने लगे और शीघ्र ही व्यापार में भी अग्रणी हो गए। 19वीं सदी में इनका व्यापार अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यहाँ तक कि ईरान तक फैला हुआ था। अविभाजित पंजाब और अफगानिस्तान के व्यापार पर तो लगभग एकाधिकार था।

खत्री सदा सनातन हिंदू समुदाय के अंग होकर हिंगलाज माता की अपनी कुलदेवी के रूप में आराधना करते रहे हैं। गुरुनानक देव जी के अनुयायियों ने उनसे जब सीख/शिक्षा ले ली तो उनके शिष्य सिख कहलाने लगे जिन्हें दशम गुरू गोविंद सिंह जी ने ‘पांच ककार’ (केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछहरा) धारण करा कर एक अलग वेश व पहचान दी। सिख पंथ के सभी दस गुरुओं में से प्रथम तीन गुरू बेदी, त्रेहन और भल्ला तथा शेष सात सोढ़ी खत्री परिवार से थे।

भारत पाक विभाजन पश्चात् ये पूरे उत्तर भारत अर्थात् पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, हिमाचल में प्रमुख रूप से बस गए। आधुनिक समय में, खत्री समुदाय भारतीय सेना, व्यापार, उद्योग और प्रशासन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।

प्रसिद्ध ऐतिहासिक विवाद एवं वर्ग निर्माण

खत्री जाति के इतिहास का जो विवरण ‘अशरफ-उल-तारीख’ एवं ‘तवारिखे कौम क्षत्रियान’ में मिलता है। इस विवरण के अनुसार सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल (1296-1316 ) में खत्री समुदाय के “संपूर्ण संगठन” में “पूर्ण परिवर्तन” आया जब विधवा पुनर्विवाह को लेकर एक सभा दिल्ली में बुलाई गई। हालांकि इस सभा में निर्णय तो विधवा पुनर्विवाह के विरोध में ही हुआ परन्तु खत्री जाति के कुछ वर्गों का निर्माण सभा में पहुंचने के क्रमानुसार भी हो गया। सभा स्थल पर सबसे पहले मेहरा/मल्होत्रा, कपूर एवं खन्ना जाति के आधे लोग ही आए इस जत्थे को “ढाई घर” कहा गया। दूसरा जत्था जिसमें मेहरा, कपूर, शेष खन्ना एवं सेठ जाति के लोग आए को “चार घर” एवं अन्य जत्थे जिसमें बेरी, वाही, विज, सहगल एवं बहल जाति के लोग आए उन्हें ‘पंज घर’ या ‘पांच घर’ कहा गया। इसी क्रम में बावन जातियों के जत्थे को ‘बावन जाति’ या ‘बावन जय’ के नाम से संबोधित किया गया। सरीन जो कि सभा में तो समय पर आए थे परन्तु विधवा विवाह के समर्थन में थे, उस समय समाज से अलग-थलग पड़ गए। हालांकि यह एक सामान्य विभाजन मात्र था।

खत्री समुदाय बहुत विविधतापूर्ण है जिसमें लगभग 4600 से अधिक उपनाम शामिल हैं। इन अनेक उपजातियों या अल्लों में मुख्य समूह हैं – ढाई घर, चार घर, पांच घर, बारह घर, बावनजाही और अरोड़वंशी। इन सबसे अलग खुखरायन बिरादरी और भाटिया नामक समूह हैं। इसके अलावा गुजरात में जो खत्री रहते हैं उन में शनिश्चरा, सोनेजी, मच्छर, विंछी, सौदागर, मामतोरा आदि आते हैं।

1) ढाई घर/चार घर के खत्री: ढाई घर में मुख्य रूप से कपूर, खन्ना और मेहरा/मल्होत्रा सम्मिलित हैं। संख्या 3 होने के बावजूद इसे ‘ढाई घर’ कहा जाता है क्योंकि तीन को अशुभ माना जाता था। अतः इसे प्रतीकात्मक रूप से 2.5 माना गया।

2)चार घर में ढाई घर के तीनों कुलों के साथ सेठ वंश को जोड़कर चार प्रमुख कुल माने जाते हैं।

3) ‘पांच घर’ में बेरी, वाही, विज, सहगल एवं बहल जातियों को ‘पंज घर’ कहा गया।

4) बारह घर के खत्री- ये खत्रियों का एक और वर्ग है जिसमें मुख्यतः 12 उपनाम होते हैं जैसे चोपड़ा, तलवार, टंडन, वोहरा, सहगल, धवन, कपूर, खन्ना, मेहरा/मल्होत्रा, सेठ, बेरी, वाधवा/वधावन, वाही, गुजराल आदि आते हैं।

5) बावनजाही खत्री- ये खत्रियों का एक अन्य वर्ग है जिसमें मुख्यतः 52 उपनाम पाए जाते हैं। जैसे वोहरा, भल्ला, बेदी, सरीन, धवन, सहगल, ओबेरॉय, खन्ना, आनंद, चड्ढा, कोहली, घई, सभरवाल, साहनी, सेठी, सूरी, टण्डन, तलवार, महेन्द्र, चड्ढा, कोचर आदि। इन्हें बावन जात के खत्री भी कहा जाता है।

6) अरोडवंशी खत्री- ये खत्रियों में सबसे बड़ा समूह है जिसकी उत्पति महाराजा अरुट जी से मानी गयी है। इनमे से बहुत से अरोडवंशी अपने नाम के आगे अरोड़ा लगते है। इनके लगभग 1000 उपनाम है जैसे बत्रा, बठला, आहूजा, तनेजा, खुराना, चुघ, चावला, वीरमानी, जुनेजा, नागपाल, कालरा आदि

7) खुखरायन खत्री- खुखरायन खत्रियों की उत्पत्ति खोखर नामक कबीले से हुई। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, मोहम्मद गोरी को 15 मार्च 1206 को सिंधु नदी के किनारे दमयक (झेलम के तट) में राजा खोखर आनंद ने मारा था जो इसी वर्ग से थे। इनमें भी कई उपनाम सम्मिलित हैं जैसे पुरी, आनंद, सूरी, सभरवाल साहनी, कोहली आदि।

8) भाटिया खत्री- खत्रियों की यह उपजाति पंजाब (वर्तमान में जिला हनुमानगढ़, राजस्थान) के भटनेर नामक स्थान में बसे खत्रियों को भाटिया कहा गया। ये अपने उपनाम(surname) के साथ भाटिया शब्द का ही प्रयोग करते है। यह भाटी राजपूतो की उपशाखा से सम्बन्ध रखते है। इनकी कुलदेवी जेसेलमेर तनोट मे स्थित है ।

9) सूद खत्री- ये भी खत्रियों की एक अन्य उपजाति है जो अधिकतर पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में बसी है।

10) ब्रह्मक्षत्रिय खत्री – इनकी विशेष बसावट कच्छ, काठियावाड़, गुजरात, मध्यभारत, बम्बई और मारवाड़ में है। इन ब्रह्मक्षत्रिय खत्री परिवारों में भी विवाह के समय तलवार या कटार धारण करते हैं, सेहरा बांधते हैं और विवाह के पूर्व कन्या वर को वरमाला पहनाती है। इनकी जाति परम्परा क्षत्रियत्व की सर्वोत्कृष्ट स्मारक है। सारस्वत ब्राह्मण ही इनके कुल पुरोहित होते हैं।

इसके अतिरिक्त खत्रियों में विवाह संबंधों में गोत्र का भी ध्यान रखा जाता है। इन परंपराओं में आमतौर पर तीन पीढ़ियों (पिता, माता और दादी/नानी) के गोत्र को छोड़कर विवाह किया जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, पिता की ओर से 7 और माता की ओर से 5 पीढ़ियों तक समान गोत्र से बचने की सलाह दी जाती है ताकि आनुवंशिक बीमारियां नयज्ञ, हवन एवं विवाह इत्यादि मंगल कार्यों में पुरोहित, यजमान की गोत्र का उच्चारण करवाते हैं।

अरोड़ा खत्री

खत्रियों के एक वर्ग अरोड़ा खत्री, भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के प्रथम खंड के सातवें अध्याय में दिए गए एक श्लोक को अपना आधार मानते हैं जो इस प्रकार है-
“नागवंशोद्भव दिव्याः क्षत्रियाःस्म मुदाहृतः।
   ब्रह्मवंशोद्भवाश्चन्ये तथा ऽरूतवंशसंभवः॥”
अर्थात् नाग वंश, ब्रह्मवंश और अरूत वंश में उत्पन्न होने वाले श्रेष्ठ क्षत्रिय वंश कहलाए।

ब्रह्मा जी से प्रारंभ जिस ब्रह्मवंश का उल्लेख उक्त श्लोक में आया है उसी में भगवान राम हुए हैं। जयपुर के पंडित मोतीलाल ओझा एवं अन्य विद्वानों ने सूर्यवंश की उत्पत्ति भगवान नारायण एवं ब्रह्मा से मानी है जो इस प्रकार है 1. नारायण, 2. ब्रह्मा, 4. मनु 5. इक्ष्वाकु 11. पृथु 13. आर्द (चन्द्र) 25. मानधाता 36. हरिश्चंद्र 44. सागर 47. दिलीप 48. भगीरथ 65. रघु 67. दशरथ 68. राम 69. लव कुश 70. अतिथि 128. सुमित।

इस प्रकार ऐतिहासिक उद्धरणों से यह बात स्पष्ट होती है कि ब्रह्मवंश से क्षत्रिय वर्ग खत्री-अरोड़ा समाज की उत्पत्ति हुई।
                                                          
खत्रियों ने क्षत्रिय कर्म को छोड़कर व्यवसाय क्यों अपनाया, इसके पीछे कई तर्क हैं। सबसे प्रसिद्ध तर्क, जिसका विवरण अनेक विद्वानों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में दिया है, के अनुसार भगवान परशुराम जी के क्षत्रिय संहार के संकल्प के दृष्टिगत खत्रियों के कुलपुरोहित सारस्वत ब्राह्मणों ने मध्यस्थता की जिसके जिसके फलस्वरूप खत्रियों ने क्षात्र धर्म के अतिरिक्त अन्य व्यवसाय अपनाए। भविष्योत्तर पुराण अध्याय 40 एवं 41 में सारस्वत ब्राह्मणों द्वारा खत्री या क्षत्रिय समाज के लिए परशुराम जी से अभयदान मांगने एवं उनका क्रोध शांत होने की घटना का वर्णन किया गया है। भगवान् परशुराम के ब्रह्मत्व की श्रेष्ठता स्वीकार करने पर उन्होंने क्षत्रियों को अभयदान दिया।

आदि पुरुष श्री अरूट जी महाराज

अरूट राय जी का जन्म प्रभु श्री राम के पुत्र लव की वंशबेल में लाहौर के शासक राजा कालराय जी के यहां हुआ। उनके दो पुत्र थे – सोढ़ी राय और अरूट राय।

अरूट राय का स्वभाव शांत और भक्ति भाव से भरा था और वे ईश्वर के ध्यान में मग्न रहते थे। उनकी इस प्रकृति से उनके पिता राजा कालराय चिंतित थे क्योंकि वे चाहते थे कि उनका पुत्र शासकीय गुणों में निपुण हो।

राजा कालराय के सामने दुविधा थी कि उत्तराधिकारी के रूप में किसे चुना जाए। उन्हें स्पष्ट था कि यदि अरूट राय को राजकाज सौंपते हैं तो सोढ़ी राय निश्चित ही कुपित होकर आक्रमण करके राज्य छीन लेंगे। इसलिए, मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श के पश्चात् उन्होंने निर्णय लिया कि अरूट राय को सम्पत्ति दी जाए और सोढ़ी राय को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाए।

अरोड़वंश का उद्धव

किंवदंती है कि त्रेता युग में जिस समय भगवान परशुराम क्षत्रियों के संहार पर निकले हुए थे। उसी अंतराल में अरुट जी की परशुराम जी से भेंट हुई। उनकी साधुवृत्ति, सद्गुणों और निडर स्वभाव के कारण भगवान परशुराम उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें अपने किए संकल्प के विपरीत अभयदान देते हुए सिंध में एक नया राज्य बसाने का आशीर्वाद प्रदान किया। परशुराम जी के आदेशानुसार, अरूट जी अपने सैनिकों और अनुयायियों के साथ लाहौर छोड़कर सिंधु नदी के किनारे गए और एक भव्य नगर ‘अरोड़कोट’ (वर्तमान में अरोड़ या रोहरी) की स्थापना की। भगवान् परशुराम जी का आशीर्वाद प्राप्त होने से महाराजा श्री अरूट जी ने लंबे समय तक अरोड़कोट पर राज्य किया।

वे एक आध्यात्मिक और न्यायप्रिय सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने कभी किसी से द्वेष और अन्याय नहीं किया। उन्होंने धर्म, न्याय, समरसता और सेवा पर आधारित राज्य स्थापित किया। उनके राज्य में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। उनका जीवन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

अरोड़कोट की स्थापना के साथ ही अरूट राय जी के वंशजों, प्रजाजनों को अरोड़वंशी अथवा अरोड़ा खत्री कहा जाने लगा। यह वंश पंचनद प्रदेश के इतिहास, संस्कृति, विकास और समृद्धि में एक महत्वपूर्ण घटक रहा है।

अरोड़ा समाज, हिंदू और सिख दोनों, उन्हें अपना आदि प्रवर्तक और पितामह मानते हैं और प्रत्येक वर्ष 30 मई को उनके जीवन मूल्यों को स्मरण कर उनकी जयंती बड़े उत्साह से मनाते हैं।

गोत्र एवं जाति व्यवस्था तथा पंजाबी समाज

समस्त आर्य जाति का वर्गीकरण गोत्र के आधार पर ही है। मुख्यतः गोत्र ही पहचान का प्रमुख आधार है। संसार की जीवित संस्कृतियों में यदि कोई ऐसी संस्कृति है जो अपना वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार रखती है तो वह है आर्य या वैदिक संस्कृति। आज भी विवाह, यज्ञ-हवन इत्यादि में पुरोहित “आर्यावर्ते, जम्बूद्वीपे, भरतखण्डे…” संकल्प मंत्र से पूजा-पाठ प्रारंभ करते हुए अपने यजमान से उनकी गोत्र का उच्चारण करवाते हैं।

जिस प्रकार वास्तुशास्त्र में आठ दिशाओं का महत्व माना गया है, उसी प्रकार गौत्र का स्त्रोत या जनक आठ ऋषियों को माना जाता है।

गोत्र के संदर्भ में दो प्रसिद्ध श्लोक निम्न है –

  1. सप्तानां सप्तर्षिणां अगस्त्यष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रिमित्यचक्षते।
                                                                        – बौद्धायन सूत्र (प्रवर मंजरी)
     विश्वामित्रों जमदग्निभरद्वाजोऽगौतमः।
     अत्रिवसिष्ठः कश्यप इत्येते सप्तऋष्यः।।
                                                      -प्रवर मंजरी
    अर्थात् विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ एवं कश्यप सप्तऋषि हैं। उक्त सप्त ऋषियों एवं ऋषि अगस्त्य अर्थात् आठ ऋषियों की संतानें सहगौत्र कही जाती हैं।

गोत्र और जाति:
अक्सर लोग गोत्र और जाति में अंतर नहीं कर पाते और भ्रमित हो जाते हैं।

गोत्र और जाति हिंदू समाज की दो अलग-अलग वंशानुगत प्रणालियां हैं। गोत्र हमें बताती है कि हम किस ऋषि की संतान हैं अर्थात् हमारा डीएनए किस ऋषि से संबंधित है। वहां जातियां विभिन्न व्यवसायों, कार्य विशेष, क्षेत्रीय समानताओं एवं उपाधियों के कारण उत्पन्न हुई हैं।

तद्नुसार हिंदू परंपरा में आनुवांशिक विविधता एवं स्वस्थ संतान के लिए एक ही गोत्र में विवाह निषिद्ध है क्योंकि वे एक ही रक्त, गुण, परिवार के माने जाते हैं, जबकि विवाह साधारणतया अपनी ही जाति के भीतर होते हैं।

गोत्र पूरे भारत में एक समान रूप से पाए जाते हैं यद्यपि विभिन्न जातियों में भी एक गोत्र हो सकता है, लेकिन जातियां अक्सर क्षेत्रीय होती हैं।

जाति समय के साथ बदल सकती है या अनुकूलन कर सकती है (हालांकि वर्तमान काल में यह जन्म से ही निर्धारित होती है) लेकिन गोत्र (डीएनए) अपरिवर्तनीय होता है और केवल वंशज के माध्यम से चलता है ।

संक्षेप में, गोत्र व्यक्ति को उसके ‘मूल वंश’ से जोड़ता है, जबकि जाति उसे ‘सामाजिक वर्ग’ की पहचान देती है।
शास्त्र में अवंटक एवं बोलचाल की भाषा में सरनेम कहते हैं, उस जाति शब्द का निर्माण, क्षेत्र विशेष में निवास, कार्य अथवा किसी परिस्थिति विशेष में होता है।

उदाहरणार्थ अरोड़ा जाति के क्षत्रियों को एक क्षेत्र विशेष के निवासी होने एवं महाराजा अरूट के राज्य में निवास करने की वजह से अरोड़ा नाम से जाना जाता है।
अरब आक्रमणकारियों के हमले एवं अन्य घटनाओं की वजह से अरोड़कोट के निवासियों ने नए क्षेत्रों की ओर प्रस्थान किया। उनमें जो उत्तर दिशा में गए वे उत्तराधी/उत्‍तराधा, दक्षिण दिशा में जाने वाले दक्खपणे/दक्षिणाधा कहलाए और पश्चिम दिशा को जानेवाला दाहिरा कहलाये परन्तु यह भेद भी दिशाओं के आधार पर माना गया। इस प्रकार जातियों का निर्माण समय-समय पर अपने ढंग से होता रहा।
 
जातियों के निर्माण के स्त्रोत चाहे पद/उपाधि, कार्य/व्यवसाय, पितृपुरुष, गुण, क्षेत्र या अन्य कोई घटना विशेष रहे हों परन्तु वैदिक काल से समाज का आधार मुख्यतः गोत्र व्यवस्था ही रहा है।

“खत्री कुल चन्द्रिका” के अनुसार सेठ शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ या गुणवान। महेन्द्र या महेंद्रू को उपाधिसूचक शब्द माना गया है जो कि मही+इन्द्र के संयोग से बना। इसी प्रकार खन्ना जाति को पंजाब के खन्ना क्षेत्र के निवासी होने के आधार पर संबोधित किया जाता रहा है। हालांकि मुंशी सांवरलाल के अनुसार वैदिक काल में जिस परिवार के आधे लोग ब्राह्मण एवं आधे क्षत्रिय कर्म से जुड़े थे। उन्हें अर्द्धकौत्स अर्थात् खन्ना नाम से पुकारा जाने लगा। वोहरा शब्द वास्तव में संस्कृत का शब्द ‘व्यूह’ है जिसमें इसका अर्थ सेनानियों के एक टुकड़ी या दल विशेष से है। चोपड़ा खत्री, वे खत्री हैं, जिनके पूर्वज चौपड़ खेल में पासा फेंकने में निपुण थे। एक मान्यता के अनुसार सूरी शब्द वीरतासूचक शब्द है जो उन क्षत्रियों के लिए प्रयुक्त हुआ जिन्होंने युद्धस्थल में अत्यधिक शौर्य दिखाया। वहीं महात्मा आनन्दस्वामी सरस्वती के जीवन परिचय में स्व. श्री रणवीर (भूतपूर्व संपादक-मिलाप) ने इस शब्द का अर्थ सूर्य की उपासना करने वाला से लगाया है। “उप्पल” एक अलंकारिक शब्द है जिसका अर्थ है कठोर अथवा मजबूत। “कोचर” कवचधारी खत्रियों के लिए प्रयोग में लाया गया था तो “चड्ढा” घुड़सवारी में निपुण क्षत्रियों के लिए प्रयोग किया गया शब्द है। “वेदी” वेदों के ज्ञाता के लिए, “भंडारी” भंडार रक्षकों के लिए प्रयुक्त हुआ था। “मेहता” या “महथा” शब्द का अर्थ है “माननीय” जो कि जागीरदार एवं वरिष्ठ राज्य कर्मचारियों के लिए पदवीसूचक शब्द है। सोनी (सुनार), बजाज (कपड़े के व्यापारी) एवं सर्राफ कार्यसूचक शब्द है। कानूनगो भी इसी प्रकार प्रयोग में आया हुआ श्रेष्ठ शब्द है। टंडन शब्द का स्त्रोत सूर्य या मार्तण्ड है। ‘धवन’ शब्द संस्कृत के ‘धावन’ शब्द का ही एक रूप है जिसका अर्थ उस क्षत्रिय वर्ग से है जो कि संदेशवाहक या दूत का कार्य करते थे। इसी प्रकार आहूजा शब्द का अर्थ है आहु की संतान तो मनोजा या मनोचा शब्द का अर्थ है मनु की संतान। इनका विस्तार से उल्लेख क्षत्रिय सभा लाहौर द्वारा प्रकाशित “क्षत्रिय इतिहास” में पंडित भक्तराम शर्मा झींझण की पुस्तक में किया गया है। ‘

कुछ ऐसा ही विभाजन माता-पिता के नाम पर भी खत्री समाज एवं अन्य समाजों में मिलता है। उदाहरणार्थ भगवान राम को उनके पिता के साथ जोड़कर ‘दशरथपुत्र’ ‘राघव'(रघु के वंशज), ‘रघुनंदन’ ‘रघुवर ‘और ‘रघुपति’ जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है। वही माता के साथ जोड़कर ‘कौशल्या नंदन’ भी कहा जाता है भगवान कृष्ण को उनके जैविक पिता ‘वसुदेव’ के नाम के साथ जोड़कर अक्सर ‘वासुदेव ‘ कहकर पुकारा जाता है तो पालक पिता नंद के नाम के साथ जोड़कर ‘नंदलाल’ भी कहा जाता है। वहीं माता के नाम के साथ जुड़ा ‘देवकीनंदन’ भी उनका चिरपरिचित नाम है। पांडवों अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम, युधिष्ठिर आदि को भी ‘कौन्तेय’ अर्थात् ‘कुन्ती का पुत्र’ कहा गया।

शब्द-साधन

उत्तर पश्चिमी भारत के एक विशिष्ट क्षेत्र को सप्त-सिंधु प्रदेश’ या ‘सप्त सैंधव प्रदेश’ कहा जाता है जो सात नदियों की भूमि सिंधु, वितस्ता (झेलम), असिकनी (चिनाब), परुष्णी (रावी), विपासा (व्यास), शुतुद्री (सतलुज) और पवित्र सरस्वती अर्थात् सप्त सिंधु के बहाव क्षेत्र को इंगित करता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल में ऋग्वैदिक आर्यों का निवास स्थान था जो वैदिक सभ्यता का मूल स्थान माना जाता है। कालांतर में पांच नदियों के मध्य का स्थान अर्थात् ‘पंचनद’ कहलाया। यह शब्द ‘पंचनद’ सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अकबर के शासनकाल के दौरान परिवर्तित होकर ‘पंजाब’ हो गया। ‘पंजाब’ नाम फारसी मूल का है। संधि विच्छेद करने पर ‘पंज’ और ‘आब’, संस्कृत शब्दों ‘पञ्‍च’ और ‘अप्’ और हिंदी शब्दों ‘पांच’ ‘जल’ के समरूप हैं जिनका अर्थ समान है। पंजाब अर्थात् ‘पांच जल की भूमि’ जो झेलम , चेनाब , रावी , सतलुज और ब्यास नदियों को संदर्भित करता है। ये सभी सिंधु नदी की सहायक नदियाँ हैं जिनमें सतलुज सबसे बड़ी है । प्राचीन यूनानियों ने भी इस क्षेत्र को पेंटापोटामिया कहा था जिसका अर्थ ‘पंचनद’ अथवा ‘पंजाब’ के समान है।  

भौगोलिक वितरण

पंजाब दक्षिण एशिया का एक भू-राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्र है जिसमें पूर्वी पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत के क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की सीमाएँ ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित हैं। इसकी भौगोलिक परिभाषा समय के साथ बदलती रही है। वैदिक काल में सप्त सिंधु क्षेत्र आज का लगभग पूरा सिंध, मैदानी पाकिस्तान और भारत के जम्मू कश्मीर, हिमाचल, हरियाणा, पंजाब इत्यादि क्षेत्र तक विस्तृत था वहीं पंचनद क्षेत्र, पांच नदियों झेलम, रावी, चिनाब, सतलज और व्यास के विस्तार क्षेत्र तक सीमित था। 16वीं शताब्दी के मुगल राज में ‘पंजाब’ सिंधु और सतलुज नदियों के बीच के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र को संदर्भित करता था।

‘सप्तसिंधु’ कालांतर में ‘पंचनद’ अथवा पंजाब का एक समृद्ध इतिहास है जो प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर सिख धर्म के उद्गम स्थल और ब्रिटिश काल के एक प्रमुख प्रांत के रूप में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका तक फैला हुआ है।

1947 में विभाजित इस क्षेत्र में अनेक साम्राज्यों, 19वीं शताब्दी के सिख साम्राज्य और 1966 के पुनर्गठन की विरासत समाहित है।

प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास

सिंधु घाटी सभ्यता: लगभग 3000 ईसा पूर्व इस क्षेत्र में मोहनजो दारो एवं हड़प्पा जैसे प्रमुख शहरों के साथ एक समृद्ध सभ्यता का विकास हुआ।.
वैदिक काल: 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के समय काल में ‘सप्त सिंधु’ (सात नदियों की भूमि) के रूप में जाना जाने वाला यह क्षेत्र वह स्थान था जहाँ वेदों की रचना हुई थी।
विदेशी आक्रमण: 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 550-518 ईसा पूर्व) के दौरान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण फारसी, यूनानी, कुषाण और हूण आक्रमणकारियों के लिए सप्तसिंधु भारत का प्रवेश द्वार था। क्षेत्र के महाबली सम्राटों, राजाओं और योद्धाओं ने इन आक्रमणों का सामना किया।
मध्यकालीन काल: आठवीं शताब्दी में सर्वप्रथम मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा दाहिर को हराकर अल्पकाल के लिए अपना शासन स्थापित किया। तत्पश्चात् 12वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद गोरी ने दिल्ली में अपना शासन स्थापित किया जो बाद में गुलाम, खिलजी, लोधी, मुगल, मराठा से होते हुए अंग्रेज राज का हिस्सा बन गया।

सिख पंथ- इसकी स्थापना गुरु नानक ने 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के रूप में की थी।
सैन्यीकरण: दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने मुगल अत्याचार से लड़ने के लिए 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की।
सिख साम्राज्य (15वीं-19वीं शताब्दी) : मुगलों और अफगानों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के बाद सिखों ने इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित किया।

अविभाजित पंजाब राज्य की नींव बंदा सिंह बहादुर के द्वारा रखी गई थी जो गुरु गोविंद सिंह जी की प्रेरणा से एक संन्यासी से योद्धा और सेनापति बने। आपने अपनी सेना के साथ 1709-10 में प्रांत के पूर्वी भाग को मुगल शासन से अस्थायी रूप से मुक्त कराया। 1716 में बंदा सिंह की हार और बलिदान के बाद सिखों का मुगलों और अफगानों के साथ एक लंबा संघर्ष चला। 1764-65 तक सिखों ने इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था।

बंदा सिंह बहादुर के बलिदान के बाद सिखों का नेतृत्व मुख्य रूप से नवाब कपूर सिंह (सिंहपुरिया मिसल) के हाथों में रहा, जिन्होंने दल खालसा और मिसल अर्थात् जत्थे प्रणाली के माध्यम से बिखरे हुए सिख जत्थों को संगठित किया और 12 प्रमुख सिख मिसलों का गठन हुआ। इस दौरान सिख मिसल सरदारों का दौर था जिसमें जस्सा सिंह अहलूवालिया और अन्य योद्धाओं ने मुग़लों और अफ़गानों के खिलाफ कमान संभाली थी जिसने पंजाब के अलग-अलग हिस्सों को स्वतंत्र कराया। 1716-1730 के बीच संघर्ष कुछ कमजोर रहा लेकिन उसके बाद नवाब कपूर सिंह ने सिखों को ‘बुड्ढा दल’ और ‘तरुणा दल’ में संगठित कर संघर्ष को आगे बढ़ाया। नवाब कपूर सिंह के बाद जस्सा सिंह अहलूवालिया ने सिखों का नेतृत्व किया।

यह काल सिखों द्वारा मुग़ल सत्ता के चंगुल से पंजाब को मुक्त कराने और उसे मिसलों (सरदारों) के अधीन लाने का संक्रमण काल था। महाराजा रणजीत सिंह को इसमें अभूतपूर्व सफलता मिली जिन्होंने (1780-1839) पंजाब को एक शक्तिशाली सिख राज्य के रूप में विकसित किया और 1801 में मुल्तान, कश्मीर और पेशावर को मिलाकर एक एकीकृत सिख साम्राज्य की स्थापना की।

औपनिवेशिक शासन और विभाजन

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से हारने के उपरान्त 1849 में पंजाब और कंपनी का राज हो गया। यद्यपि यह बंगाल प्रेसीडेंसी के हिस्से के रूप में था, बावजूद इसके यह प्रशासनिक रूप से स्वतंत्र था। 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान अहमद खान खराल के नेतृत्व में हुए विद्रोह और मुर्री विद्रोह को छोड़कर पंजाब अपेक्षाकृत शांत रहा। 1858 में महारानी विक्टोरिया द्वारा जारी की गई घोषणा के अनुसार भारत के अन्य अनेक राज्यों के साथ पंजाब भी ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर ब्रिटेन के प्रत्यक्ष शासन के अधीन आ गया।

औपनिवेशिक शासन का पंजाबी जीवन के सभी क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ा। आर्थिक रूप से इसने पंजाब को भारत का सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्र बना दिया। सामाजिक रूप से इसने बड़े जमींदारों की शक्ति को बनाए रखा और राजनीतिक रूप से इसने जमींदार समूहों के बीच अंतर-सामुदायिक सहयोग को प्रोत्साहित किया। इस दौरान पंजाब ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती का प्रमुख केंद्र भी बन गया ।

प्रशासनिक रूप से अंग्रेजों ने सरकार के नौकरशाही स्वरूप (जो आज भी स्थापित है) और फारसी के स्थान पर अंग्रेजी कानून व्यवस्था स्थापित की। नियंत्रण के उद्देश्य से अंग्रेजों ने डाक प्रणाली, रेलवे, सड़कों और टेलीग्राफ सहित संचार और परिवहन के नए मशीनी रूप स्थापित किए। 1860 और 1947 के बीच पश्चिमी पंजाब में नहरों के निर्माण से 14 मिलियन एकड़ भूमि सिंचित कृषि के अंतर्गत आई जिसने इस क्षेत्र में कृषि पद्धतियों में क्रांति ला दी। कृषि और वाणिज्यिक वर्ग के साथ-साथ एक पेशेवर मध्यम वर्ग भी उभरा जो अंग्रेजी शिक्षा के उपयोग से सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ा था जिसने कानून, सरकार और चिकित्सा में नए पेशों यानि वकील, आईसीएस, क्लर्क, डॉक्टर, नर्स इत्यादि का निर्माण किया।

इन विकास कार्यों के बावजूद अंग्रेज शासन मूलतः शोषण के लिए ही था। अधिकांश बाह्य व्यापार ब्रिटिश बैंकों द्वारा नियंत्रित किया जाता था। अंग्रेज सरकार अधिकांश आय हड़प जाया करती थी।

जलियांवाला बाग

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक जलियांवाला नरसंहार की घटना थी जिसे लाकर पूरे भारत को बल्कि पूरे विश्व को झकझोर के रख दिया था। इस घटना ने भारत में औपनिवेशिक सरकार के द्वारा किये जा रहे अमानवीय व्यवहार को उजागर कर दिया था। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण ढंग से अंग्रेज सरकार के विरोध में प्रदर्शन हेतु एकत्रित निहत्थे भारतीयों के समूह पर गोली चला कर लगभग 400 लोगों की हत्या कर दी गई और लगभग 1,200 घायल हुए।
इस कांड ने पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन को क्रोध के साथ एक नई ऊर्जा और गति प्रदान की।

विभाजन के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति

लंबे संघर्ष के पश्चात 1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली तो ब्रिटिश प्रांत पंजाब को धार्मिक आधार पर भारत और पाकिस्तान के नव-संप्रभु राज्यों के बीच विभाजित कर दिया गया और इसका बाद पश्चिमी हिस्सा पाकिस्तान का तो छोटा पूर्वी भाग भारत का हिस्सा बन गया।

स्वतंत्रता उपरांत पंजाब का पुनर्गठन

स्वतंत्रता के बाद भारतीय पंजाब का इतिहास एक अलग पंजाबी भाषी राज्य के लिए सिख आंदोलन से प्रभावित रहा जिसका नेतृत्व तारा सिंह और बाद में उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी संत फतेह सिंह द्वारा किया गया था। हालाँकि नवंबर 1956 में, भाषायी आधार पर विभाजित करने के बजाय पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पेप्सू), स्वतंत्रता-पूर्व रियासतों पटियाला, जींद, नाभा, फरीदकोट, कपूरथला, कलसिया, मलेरकोटला और नालागढ़ का एकीकरण करके पंजाब का पुनर्गठन किया गया। सरदार प्रताप सिंह कैरों, जो 1956 से 1964 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे, ने पंजाब के विस्तार के बाद मुख्य रूप से पंजाबी भाषी क्षेत्रों को शामिल करते हुए एक अलग भारतीय राज्य की मांग को और तेज कर दिया। अंततः भारत सरकार ने इस मांग को मान लिया। 1966 में ‘पंजाब स्टेट्स रिस्ट्रक्चर एक्ट’ पास किया गया। पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब, हिंदी भाषी क्षेत्रों को हरियाणा और पहाड़ी क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश में विभाजित किया गया। नवनिर्मित शहर चंडीगढ़ और उसके आसपास का क्षेत्र एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गया। चंडीगढ़ को हरियाणा और पंजाब दोनों का संयुक्त प्रशासनिक मुख्यालय या राजधानी बनाए रखा गया।

उग्रवाद की चपेट में

1980 से 1992 के बीच पंजाब में खालिस्तान की स्थापना की मांग ने जोर पकड़ा। अनेक उग्रवादी समूहों ने आतंकवाद का सहारा लेना शुरू कर दिया जिसमें पंजाबी हिंदुओं और यहां तक कि खालिस्तान के निर्माण का विरोध करने वाले सिखों की भी अंधाधुंध हत्याएं हुईं। जून 1984 में हरमंदिर साहिब में काबिज़ उग्रवादियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना को विवशतः सैनिक कार्यवाही करने पर विवश होना पड़ा। उग्रवादी नेताओं के साथ लगभग 100 भारतीय सैनिक भी मृत्यु को प्राप्त हुए। इस कार्यवाही से उपजे आक्रोश के फलस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। 1990 के दशक की शुरुआत से राज्य में अपेक्षाकृत स्थिरता लौट आई थी।

वर्तमान पंजाब

आज यह भारत का एक समृद्ध कृषि प्रधान राज्य है जिसे “भारत का अन्न भंडार” के नाम से जाना जाता है।

2011 तक भारत की कुल जनसंख्या में पंजाबी भाषी लोगों की संख्या 2.74% थी। भारत की जनगणना में जातीयता दर्ज न होने के कारण कुल भारतीय पंजाबियों की संख्या अज्ञात है। सिख मुख्य रूप से आधुनिक पंजाब राज्य में केंद्रित हैं जो जनसंख्या का 57.7% हैं, जबकि हिंदू 38.5% हैं। माना जाता है कि दिल्ली की कुल जनसंख्या में कम से कम 40% जातीय पंजाबी हैं जिनकी वर्तमान पीढ़ी मुख्य रूप सेहिंदी व पंजाबी भाषी हिंदू हैं। भारतीय जनगणना में मूल भाषाओं का रिकॉर्ड तो रखा जाता है लेकिन नागरिकों के वंश का नहीं। इस प्रकार, दिल्ली और अन्य भारतीय राज्यों की जातीय संरचना पर कोई ठोस आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।

भारतीय पंजाब में मुसलमानों और ईसाइयों के छोटे समूह भी रहते हैं। पूर्वी पंजाब के अधिकांश मुसलमान 1947 में पश्चिमी पंजाब चले गए हालाँकि आज भी मलेरकोटला में एक छोटा समुदाय मौजूद है।

विदेशों में पंजाबी

ब्रिटिश भारत में पंजाबी समुदाय का बड़ी संख्या में दुनिया के कई हिस्सों में पलायन हुआ विशेषतः ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में। 20वीं सदी के आरंभ में, कई पंजाबी संयुक्त राज्य अमेरिका में बसने लगे जिनमें ग़दर पार्टी का गठन करने वाले स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे। यूनाइटेड किंगडम में पाकिस्तान और भारत दोनों देशों से आए पंजाबियों की अच्छी खासी संख्या है। सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्र लंदन, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और ग्लासगो हैं। कनाडा में वे विशेष रूप से वैंकूवर, टोरंटो और कैलगरी में बसे वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के साथ-साथ न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी क्षेत्र में भी इनकी अच्छी खासी संख्या पाई जाती है। 1970 के दशक में पाकिस्तानी पंजाबियों एक बड़ा पलायन मध्य पूर्व के देशों संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कुवैत में शुरू हुआ। पूर्वी अफ्रीका में भी इनकी बड़ी आबादी है जिनमें केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देश शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के अतिरिक्त दक्षिण पूर्व एशिया में भी पंजाबी समुदाय के लोग बस चुके हैं जिनमें मलेशिया , फिलीपींस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, सिंगापुर और हांगकांग शामिल हैं। हाल के दिनों में पंजाबियों की संख्या यूरोप और खाड़ी के देशों में भी बढ़ी है।

आज पंजाबी समाज के लोग दुनिया के प्रत्येक देश में स्थापित है और उन देशों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में अपना अमूल्य योगदान कर रहे हैं।

इस प्रकार से भारत के उक्त विशिष्ट भूभाग में रहने वाले क्षत्रिय पंजाबी समाज का शौर्य वीरता और संघर्ष का इतिहास रहा है और समय परिवर्तन के साथ जब उन्होंने राज/क्षात्र धर्म छोड़ कर वैश्य कर्म अपना लिया तो उसमें भी शीर्ष स्थान पर स्थापित हो गए और आज देश समाज में प्रत्येक क्षेत्र में नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

“गुरुओं की वाणी, और पौरुष की अभिलाषा,
संघर्ष की गाथा ही है, पंजाबियों की परिभाषा।

लंगर की सेवा हो या समर का आह्वान,
पंचनद के वीरों की, है जग में अलग पहचान।।”

संकलनकर्ता: रमन कुमार सूद, उदयपुर