पंजाब
परंपरागत रूप से, पंजाबी पहचान मुख्य रूप से भाषाई, भौगोलिक और सांस्कृतिक है जो पंथ/मज़हब से स्वतंत्र है। यह उन लोगों को संदर्भित करती है जो पंजाब क्षेत्र में रहते हैं या/और जिनकी मातृभाषा पंजाबी है। पंजाबी एक साझी भाषा, क्षेत्र, जातीयता और संस्कृति साझा करते हैं। पंजाबी भाषा भाषी लोग मूलतः हिंदू सनातन धर्म से थे जिसकी एक शाखा 15वीं से 17वीं शताब्दी में सिख पंथ के रूप में विकसित हुई। वहीं 13वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य मुस्लिम शासन के दौरान अनेक लोग मुस्लिम मजहब में परिवर्तित हुए तो 19वीं और 20वीं शताब्दी में अंग्रेज शासन में एक छोटा सा हिस्सा ईसाई पंथ में भी दीक्षित हुआ।
शब्द-साधन
उत्तर पश्चिमी भारत के एक विशिष्ट क्षेत्र को सप्त-सिंधु प्रदेश’ या ‘सप्त सैंधव प्रदेश’ कहा जाता है जो सात नदियों की भूमि सिंधु, वितस्ता (झेलम), असिकनी (चिनाब), परुष्णी (रावी), विपासा (व्यास), शुतुद्री (सतलुज) और पवित्र सरस्वती अर्थात् सप्त सिंधु के बहाव क्षेत्र को इंगित करता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल में ऋग्वैदिक आर्यों का निवास स्थान था जो वैदिक सभ्यता का मूल स्थान माना जाता है। कालांतर में पांच नदियों के मध्य का स्थान अर्थात् ‘पंचनद’ कहलाया। यह शब्द ‘पंचनद’ सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अकबर के शासनकाल के दौरान परिवर्तित होकर ‘पंजाब’ हो गया। ‘पंजाब’ नाम फारसी मूल का है। संधि विच्छेद करने पर ‘पंज’ और ‘आब’, संस्कृत शब्दों ‘पञ्च’ और ‘अप्’ और हिंदी शब्दों ‘पांच’ ‘जल’ के समरूप हैं जिनका अर्थ समान है। पंजाब अर्थात् ‘पांच जल की भूमि’ जो झेलम , चेनाब , रावी , सतलुज और ब्यास नदियों को संदर्भित करता है। ये सभी सिंधु नदी की सहायक नदियाँ हैं जिनमें सतलुज सबसे बड़ी है । प्राचीन यूनानियों ने भी इस क्षेत्र को पेंटापोटामिया कहा था जिसका अर्थ ‘पंचनद’ अथवा ‘पंजाब’ के समान है।
भौगोलिक वितरण
पंजाब दक्षिण एशिया का एक भू-राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्र है जिसमें पूर्वी पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत के क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की सीमाएँ ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित हैं। इसकी भौगोलिक परिभाषा समय के साथ बदलती रही है। वैदिक काल में सप्त सिंधु क्षेत्र आज का लगभग पूरा सिंध, मैदानी पाकिस्तान और भारत के जम्मू कश्मीर, हिमाचल, हरियाणा, पंजाब इत्यादि क्षेत्र तक विस्तृत था, वहीं पंचनद क्षेत्र, पांच नदियों झेलम, रावी, चिनाब, सतलज और व्यास के विस्तार क्षेत्र तक सीमित था। 16वीं शताब्दी के मुगल राज में ‘पंजाब’ सिंधु और सतलुज नदियों के बीच के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र को संदर्भित करता था।
‘सप्तसिंधु’ का, जो कालांतर में ‘पंचनद’ अथवा ‘पंजाब’ कहलाया, एक समृद्ध इतिहास है जो प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर सिख धर्म के उद्गम स्थल और ब्रिटिश काल के एक प्रमुख प्रांत के रूप में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका तक फैला हुआ है।
1947 में विभाजित इस क्षेत्र में अनेक साम्राज्यों, 19वीं शताब्दी के सिख साम्राज्य और 1966 के पुनर्गठन की विरासत समाहित है।
सप्त सिंधु-पंचनद-पंजाब का प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास
सिंधु घाटी सभ्यता: लगभग 3000 ईसा पूर्व इस क्षेत्र में मोहनजो दारो एवं हड़प्पा जैसे प्रमुख शहरों के साथ एक समृद्ध सभ्यता का विकास हुआ।
वैदिक काल: 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के समय काल में ‘सप्त सिंधु’ (सात नदियों की भूमि) के रूप में जाना जाने वाला यह क्षेत्र वह स्थान था जहाँ वेदों की रचना हुई थी।
विदेशी आक्रमण: 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 550-518 ईसा पूर्व) के दौरान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण फारसी, यूनानी, कुषाण और हूण आक्रमणकारियों के लिए सप्तसिंधु भारत का प्रवेश द्वार था। क्षेत्र के महाबली सम्राटों, राजाओं और योद्धाओं ने इन आक्रमणों का सामना किया।
मध्यकालीन काल: आठवीं शताब्दी में सर्वप्रथम मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा दाहिर को हराकर अल्पकाल के लिए अपना शासन स्थापित किया। तत्पश्चात् 12वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद गोरी ने दिल्ली में अपना शासन स्थापित किया जो बाद में गुलाम, खिलजी, लोधी, मुगल, मराठा से होते हुए अंग्रेज राज का हिस्सा बन गया।
सिख पंथ- इसकी स्थापना गुरु नानक ने 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के रूप में की थी।
सैन्यीकरण: दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने मुगल अत्याचार से लड़ने के लिए 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की।
सिख साम्राज्य (15वीं-19वीं शताब्दी) : मुगलों और अफगानों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के बाद सिखों ने इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित किया।
वर्तमान पंजाब की नींव बंदा सिंह बहादुर के द्वारा रखी गई थी जो गुरु गोविंद सिंह जी की प्रेरणा से एक संन्यासी से योद्धा और सेनापति बने। आपने अपनी सेना के साथ 1709-10 में प्रांत के पूर्वी भाग को मुगल शासन से अस्थायी रूप से मुक्त कराया। 1716 में बंदा सिंह की हार और बलिदान के बाद सिखों का मुगलों और अफगानों के साथ एक लंबा संघर्ष चला। 1764-65 तक सिखों ने इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था।
बंदा सिंह बहादुर के 1716 में सर्वोच्च बलिदान के बाद सिखों का नेतृत्व मुख्य रूप से नवाब कपूर सिंह (सिंहपुरिया मिसल) के हाथों में रहा, जिन्होंने दल खालसा और मिसल प्रणाली (12 सिख मिसलों) के माध्यम से बिखरे हुए सिख जत्थों को संगठित किया। इस दौरान सिख मिसल सरदारों का दौर था, जिसमें जस्सा सिंह अहलूवालिया और अन्य योद्धाओं ने मुग़लों और अफ़गानों के खिलाफ कमान संभाली थी। 1716-1730 के बीच कमान कमजोर रही, लेकिन उसके बाद नवाब कपूर सिंह ने सिखों को ‘बुड्ढा दल’ और ‘तरुणा दल’ में संगठित किया।
मिसल प्रणाली: यह काल मिसल सरदारों का काल कहा जाता है, जहाँ 12 प्रमुख सिख मिसलों ने पंजाब के अलग-अलग हिस्सों को स्वतंत्र किया। नवाब कपूर सिंह के बाद, जस्सा सिंह अहलूवालिया ने भी सिखों का नेतृत्व किया और 1761 में ‘सुल्तान-उल-कौम’ की उपाधि प्राप्त की।
यह काल सिखों द्वारा मुग़ल सत्ता के चंगुल से पंजाब को मुक्त कराने और उसे मिसलों (सरदारों) के अधीन लाने का संक्रमण काल था, जो अंततः रणजीत सिंह के एकीकृत सिख राज्य के रूप में उभरा।
महाराजा रणजीत सिंह (1780-1839) ने बाद में पंजाब को एक शक्तिशाली सिख राज्य के रूप में विकसित किया और 1801 में महाराजा रणजीत सिंह ने मुल्तान, कश्मीर और पेशावर को मिलाकर एक एकीकृत सिख साम्राज्य की स्थापना की।
औपनिवेशिक शासन और विभाजन
ब्रिटिश विलय: दो एंग्लो-सिख युद्धों के बाद,
1849 में पंजाब राज्य ब्रिटिश सेना के हाथों हार गया।ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1849 में पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया। नाममात्र के लिए बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा होने के बावजूद , यह प्रशासनिक रूप से स्वतंत्र था। 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान, अहमद खान खराल के नेतृत्व में हुए विद्रोह और मुर्री विद्रोह को छोड़कर पंजाब अपेक्षाकृत शांत रहा। 1858 में, महारानी विक्टोरिया द्वारा जारी की गई घोषणा के अनुसार , पंजाब ब्रिटेन के प्रत्यक्ष शासन के अधीन आ गया।
औपनिवेशिक शासन का पंजाबी जीवन के सभी क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ा। आर्थिक रूप से इसने पंजाब को भारत का सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्र बना दिया। सामाजिक रूप से इसने बड़े जमींदारों की शक्ति को बनाए रखा और राजनीतिक रूप से इसने जमींदार समूहों के बीच अंतर-सामुदायिक सहयोग को प्रोत्साहित किया। इस दौरान पंजाब ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती का प्रमुख केंद्र भी बन गया ।
प्रशासनिक रूप से अंग्रेजों ने नौकरशाही और कानून की व्यवस्था स्थापित की। शासक वर्ग की ‘पितृसत्तात्मक’ व्यवस्था को कानूनों, संहिताओं और प्रक्रियाओं की प्रणाली के साथ ‘मशीन शासन’ द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। नियंत्रण के उद्देश्य से, अंग्रेजों ने डाक प्रणाली, रेलवे, सड़कों और टेलीग्राफ सहित संचार और परिवहन के नए रूप स्थापित किए। 1860 और 1947 के बीच पश्चिमी पंजाब में नहर उपनिवेशों के निर्माण से 14 मिलियन एकड़ भूमि कृषि के अंतर्गत आई और इस क्षेत्र में कृषि पद्धतियों में क्रांति ला दी। कृषि और वाणिज्यिक वर्ग के साथ-साथ एक पेशेवर मध्यम वर्ग भी उभरा जो अंग्रेजी शिक्षा के उपयोग से सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ा था जिसने कानून, सरकार और चिकित्सा में नए पेशे खोले।
इन विकास कार्यों के बावजूद अंग्रेज शासन शोषण के लिए ही था। निर्यात के उद्देश्य से अधिकांश बाह्य व्यापार ब्रिटिश निर्यात बैंकों द्वारा नियंत्रित किया जाता था। अंग्रेजी सरकार ने पंजाब के वित्त पर नियंत्रण रखा और अधिकांश आय सरकार द्वारा रख ली जाती थी।
जलियांवाला बाग
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक 1919 की घटना थी, ‘जलियांवाला नरसंहार’ जो ब्रिटिश जनरल द्वारा दिए गए आदेश का परिणाम था।रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लागू किए गए नए राष्ट्र-विरोधी नियमों के विरोध में एकत्रित लगभग 10,000 भारतीयों के समूह पर गोली चलाई। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में लगभग 400 लोग मारे गए और लगभग 1,200 घायल हुए।
इस कांड ने पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन को क्रोध के साथ एक नई ऊर्जा और गति प्रदान की।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंजाब का पुनर्गठन
1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली तो ब्रिटिश प्रांत पंजाब को धार्मिक आधार पर भारत और पाकिस्तान के नव-संप्रभु राज्यों के बीच विभाजित कर दिया गया और इसका बाद पश्चिमी हिस्सा पाकिस्तान का तो छोटा पूर्वी भाग भारत का हिस्सा बन गया।
स्वतंत्रता के बाद, भारतीय पंजाब का इतिहास एक अलग पंजाबी भाषी राज्य के लिए सिख आंदोलन से प्रभावित रहा जिसका नेतृत्व तारा सिंह और बाद में उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी संत फतेह सिंह द्वारा किया गया था। हालाँकि नवंबर 1956 में, भाषायी आधार पर विभाजित करने के बजाय पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पेप्सू), स्वतंत्रता-पूर्व रियासतों पटियाला, जींद, नाभा, फरीदकोट, कपूरथला, कलसिया, मलेरकोटला और नालागढ़ का एकीकरण करके पंजाब का पुनर्गठन किया गया। सरदार प्रताप सिंह कैरों, जो 1956 से 1964 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे, ने पंजाब के विस्तार के बाद मुख्य रूप से पंजाबी भाषी क्षेत्रों को शामिल करते हुए एक अलग भारतीय राज्य की मांग को और तेज कर दिया। अंततः भारत सरकार ने इस मांग को मान लिया। सन 1966 में ‘पंजाब स्टेट्स पुनर्गठन एक्ट’ पास किया गया । भारतीय राज्य पंजाब को पंजाबी भाषी पंजाब और हिंदी भाषी हरियाणा में और पहाड़ी क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश में विभाजित किया गया। नवनिर्मित शहर चंडीगढ़ और उसके आसपास का क्षेत्र एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गया। चंडीगढ़ को हरियाणा और पंजाब दोनों का संयुक्त प्रशासनिक मुख्यालय या राजधानी बनाए रखा गया
उग्रवाद की चपेट में
1980 से 1992 के बीच पंजाब में खालिस्तान की स्थापना की मांग ने जोर पकड़ा। अनेक उग्रवादी समूहों ने आतंकवाद का सहारा लेना शुरू कर दिया जिसमें पंजाबी हिंदुओं और यहां तक कि खालिस्तान के निर्माण का विरोध करने वाले सिखों की भी अंधाधुंध हत्याएं हुईं। जून 1984 में हरमंदिर साहिब में काबिज़ उग्रवादियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना को विवशतः सैनिक कार्यवाही करने पर विवश होना पड़ा। उग्रवादी नेताओं के साथ लगभग 100 भारतीय सैनिक भी मृत्यु को प्राप्त हुए। इस कार्यवाही से उपजे आक्रोश के फलस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। 1990 के दशक की शुरुआत से राज्य में अपेक्षाकृत स्थिरता लौट आई थी।
वर्तमान पंजाब
आज यह भारत का एक समृद्ध कृषि प्रधान राज्य है जिसे “भारत का अन्न भंडार” के नाम से जाना जाता है।
2011 तक भारत की कुल जनसंख्या में पंजाबी भाषी लोगों की संख्या 2.74% थी। भारत की जनगणना में जातीयता दर्ज न होने के कारण कुल भारतीय पंजाबियों की संख्या अज्ञात है। सिख मुख्य रूप से आधुनिक पंजाब राज्य में केंद्रित हैं जो जनसंख्या का 57.7% हैं, जबकि हिंदू 38.5% हैं। माना जाता है कि दिल्ली की कुल जनसंख्या में कम से कम 40% जातीय पंजाबी हैं जिनकी वर्तमान पीढ़ी मुख्य रूप से हिंदी व पंजाबी भाषी हिंदू हैं। भारतीय जनगणना में मूल भाषाओं का रिकॉर्ड तो रखा जाता है लेकिन नागरिकों के वंश का नहीं। इस प्रकार, दिल्ली और अन्य भारतीय राज्यों की जातीय संरचना पर कोई ठोस आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
भारतीय पंजाब में मुसलमानों और ईसाइयों के छोटे समूह भी रहते हैं। पूर्वी पंजाब के अधिकांश मुसलमान 1947 में पश्चिमी पंजाब चले गए हालाँकि आज भी मलेरकोटला में एक छोटा समुदाय मौजूद है।
विदेशों में पंजाबी
ब्रिटिश भारत में पंजाबी समुदाय का बड़ी संख्या में दुनिया के कई हिस्सों में पलायन हुआ विशेषतः ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में। 20वीं सदी के आरंभ में, कई पंजाबी संयुक्त राज्य अमेरिका में बसने लगे जिनमें ग़दर पार्टी का गठन करने वाले स्वतंत्रता कार्यकर्ता भी शामिल थे। यूनाइटेड किंगडम में पाकिस्तान और भारत दोनों देशों से आए पंजाबियों की अच्छी खासी संख्या है। सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्र लंदन, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और ग्लासगो हैं। कनाडा में विशेष रूप से वैंकूवर, टोरंटो और कैलगरी में तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में विशेष रूप से कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के साथ-साथ न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी क्षेत्र में भी इनकी अच्छी खासी संख्या पाई जाती है। 1970 के दशक में पाकिस्तानी पंजाबियों एक बड़ा पलायन मध्य पूर्व के देशों संयुक्त अरब अमीरात , सऊदी अरब और कुवैत में शुरू हुआ। पूर्वी अफ्रीका में भी इनकी बड़ी आबादी है जिनमें केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देश शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के अतिरिक्त दक्षिण पूर्व एशिया में भी पंजाबी समुदाय के लोग बस चुके हैं जिनमें मलेशिया , फिलीपींस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, सिंगापुर और हांगकांग शामिल हैं। हाल के दिनों में कई पंजाबी इटली और यूरोप के अनेक देशों में भी जाकर बस गए हैं।
कह सकते हैं कि पंजाबियों की उपस्थिति आज वैश्विक स्तर पर है और सभी जगह में पंजाबियत का झंडा बुलंद किए हुए हैं।
संकलनकर्ता : रमन कुमार सूद, उदयपुर
सहयोगी: दिवाकर जावा, भीलवाड़ा
