अरूट राय जी का जन्म प्रभु श्री राम के पुत्र लव की वंशबेल में लाहौर के शासक राजा कालराय जी के यहां हुआ। उनके दो पुत्र थे – सोढ़ी राय और अरूट राय।

अरूट राय का स्वभाव शांत और भक्ति भाव से भरा था और वे ईश्वर के ध्यान में मग्न रहते थे। उनकी इस प्रकृति से उनके पिता राजा कालराय चिंतित थे क्योंकि वे चाहते थे कि उनका पुत्र शासकीय गुणों में निपुण हो।

राजा कालराय के सामने दुविधा थी कि उत्तराधिकारी के रूप में किसे चुना जाए। उन्हें स्पष्ट था कि यदि अरूट राय को राजकाज सौंपते हैं तो सोढ़ी राय निश्चित ही कुपित होकर आक्रमण करके राज्य छीन लेंगे। इसलिए, मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श के पश्चात् उन्होंने निर्णय लिया कि अरूट राय को सम्पत्ति दी जाए और सोढ़ी राय को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाए।

अरोड़वंश का उद्धव

किंवदंती है कि त्रेता युग में जिस समय भगवान परशुराम क्षत्रियों के संहार पर निकले हुए थे। उसी अंतराल में अरुट जी की परशुराम जी से भेंट हुई। उनकी साधुवृत्ति, सद्गुणों और निडर स्वभाव के कारण भगवान परशुराम उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें अपने किए संकल्प के विपरीत अभयदान देते हुए सिंध में एक नया राज्य बसाने का आशीर्वाद प्रदान किया। परशुराम जी के आदेशानुसार, अरूट जी अपने सैनिकों और अनुयायियों के साथ लाहौर छोड़कर सिंधु नदी के किनारे गए और एक भव्य नगर ‘अरोड़कोट’ (वर्तमान में अरोड़ या रोहरी) की स्थापना की। भगवान् परशुराम जी का आशीर्वाद प्राप्त होने से महाराजा श्री अरूट जी ने लंबे समय तक अरोड़कोट पर राज्य किया।

वे एक आध्यात्मिक और न्यायप्रिय सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने कभी किसी से द्वेष और अन्याय नहीं किया। उन्होंने धर्म, न्याय, समरसता और सेवा पर आधारित राज्य स्थापित किया। उनके राज्य में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। उनका जीवन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

अरोड़कोट की स्थापना के साथ ही अरूट राय जी के वंशजों, प्रजाजनों को अरोड़वंशी अथवा अरोड़ा खत्री कहा जाने लगा। यह वंश पंचनद प्रदेश के इतिहास, संस्कृति, विकास और समृद्धि में एक महत्वपूर्ण घटक रहा है।

अरोड़ा समाज, हिंदू और सिख दोनों, उन्हें अपना आदि प्रवर्तक और पितामह मानते हैं और प्रत्येक वर्ष 30 मई को उनके जीवन मूल्यों को स्मरण कर उनकी जयंती बड़े उत्साह से मनाते हैं।

महाराज अरूट जी का पश्चात्वर्ती अरोड़कोट

सिकंदर को भी महाराजा अरूट के वंशजों से लडना पडा था। इतिहास लेखक प्लिनी ने भी अरोड़ा को अरोटुरी लिखा है। कालांतर में अरोड़ राज्‍य की गद्दी देवाजी ब्राह्मण के हाथ में आ गयी । देवा जी ब्राह्मण के वंशज बौद्ध हो गए थे और उनकी राजधानी सिंधु नदी के पूर्वी किनारे पर अलोर या अरोड़कोट ही थी जिसे आजकल रोडी कहते हैं। अरबों के आक्रमण के समय अरोड़कोट के अंतिम राजा दाहर बडे प्रतापी थे। उनके शासनकाल में अरब आक्रमणकारियों ने समुद्र मार्ग से कई हमले किए थे जिन्हें बार बार विफल किया जाता रहा। लेकिन दुर्भाग्य से मुहम्‍मद बिन कासिम के आक्रमण के समय आपसी फूट के कारण अरोड़कोट हमलावरों के हाथ में चला गया। आक्रमणकारियों के अत्याचारों से बचने के लिए अरोडवंशियो का एक दल उत्‍तर दिशा की ओर गया जो उत्‍तराधा कहलाया। दक्षिण दिशा को जानेवाला दक्षिणाधा और पश्चिम दिशा को जानेवाला दाहिरा कहलाया। इसके बाद अरोड वंशियों ने व्‍यापार और खेती को जीवनयापन का मुख्‍य साधन बनाया।

इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड की राय है कि अरूट नगर सिंधु नदी के किनारे पर वर्तमान रोडी या अरोडी नगर से पांच मील पूर्व की ओर था। सिंधु नदी किसी समय में अरोड नगर के नीचे बहा करती थी।

लाहौर विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय में मौजूद फारसी में लिखी दो हस्‍त लिखित पुस्‍तक के अनुसार अरोट, सिंध की राजधानी थी। अरबों के आक्रमण के बाद आठवीं शताब्‍दी के प्रारंभ में अरोड़ा सिंधु नदी के किनारे किनारे उत्‍तर की ओर बढते गए , जहां उन्‍हें उचित स्‍थान मिला , वहां बसते गए तथा जो व्‍यवसाय धंधे मिलते गए , उसे अपनाते गए।

करीब तीन सौ वर्ष बाद जब पंजाब में आक्रमण हुए तो अनेक अरोडवंशी सिंध की ओर लौटे। वहां उन्‍होने स्‍वयं को लोहावरणा या लोहावर कहा। धरे धीरे उच्‍चारण भेद से वे लोहाणे कहलाने लगे। आजकल भी लोहाणे में जो गीत गाए जाते हैं, वे लाहौर की ओर ही इशारा करते हैं। अरोडवंशियों की दिशांतर भेदों के अलावा धीरे धीरे स्‍थान और पूर्वजों के आधार पर भी अनेक शाखाएं हो गईं जैसा कि उनके सैकडों अल्‍लों से पता चलता है। अरोडवंशी स्‍वयं को कश्‍यप गोत्र के क्षत्रिय मानते हैं।

ग्‍यारहवीं शताब्‍दी के प्रारंभ में जब पंजाब पर विदेशी आक्रमण हुए तो कुछ अरोडवंशी राजस्‍थान की ओर भी चले गए। चिरकाल तक उनका संबंध पंजाबी अरोडवंशियों के साथ बना रहा। राजस्‍थान में अरोड़वंशी खत्रियों के 84 अल्‍ले हैं। यहां के अरोड़वंशियों में उत्‍तराधी, दरबने, डाहरे आदि का कोई भेद नहीं है। अधिकांश लोग इन भेदों से अनभिज्ञ हैं। लोगों के रीति रिवाजों को देखने पर राजस्‍थान के अरोड़ा, दरबने प्रतीत होते हैं। राजस्‍थान के अरोड़ वंशियों में ज्‍यादातर व्‍यापार में ही लगे हैं। इस शताब्‍दी के प्रारंभ में राजस्‍थान के अरोड़ा समुदाय में एक विधवा के विवाह को लेकर फूट पड़ गयी और पूरी बिरादरी दो दलों में बंट गयी। यह दलबंदी अब भी देखने में आती है। एक दल का नाम जोधपुरी अरोड़ा खत्री तथा दूसरे दल वाले नागौरी अरोड़ा खत्री कहलाते हैं।