गुरु तेग बहादुर सिख पंथ के नौवें गुरु थे। उनका जन्म 21 अप्रैल 1621 (वैशाख, कृष्ण पंचमी संवत 1678) को माता नानकी और छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद के यहाँ अमृतसर में हुआ था। तेग बहादुर को उनके तपस्वी स्वभाव के कारण बचपन में त्याग मल कहा जाता था। उन्होंने अपना प्रारंभिक बचपन भाई गुरदास के संरक्षण में अमृतसर में बिताया जिन्होंने उन्हें गुरुमुखी, हिंदी, संस्कृत और भारतीय धार्मिक दर्शन सिखाया जबकि बाबा बुड्ढा ने उन्हें तलवारबाज़ी, तीरंदाज़ी और घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिया। केवल 14 वर्ष की आयु में मुगलों के साथ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी तलवार (तेग) के साथ जो पराक्रम दिखाया उससे उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर रख दिया। दसवें गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी, तेग बहादुर के पुत्र थे।
सिखों के आठवें गुरु हर कृष्ण जी के दिव्य ज्योति में समाने के पश्चात तेग बहादुर जी ने 16 अप्रैल 1664 (शनिवार) को 44 वर्ष की आयु में गुरु गद्दी संभाली थी। और उन्होंने 1675 में अपने बलिदान तक सिख पंथ का नेतृत्व किया।
गुरु तेग बहादुर का काल धार्मिक असहिष्णुता और अत्याचार का समय था। इस समय उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए आवाज उठाई और अपने अनुयायियों को एकजुट किया।
उन्हें कश्मीरी पंडितों के बलात् धर्मांतरण का विरोध करने और इस्लाम न अपनाने के कारण दिल्ली में कैद किया गया। लगभग 8 दिनों तक उन पर अमानुषिक अत्याचार किए गए लेकिन गुरुजी अपने धर्म पर अडिग रहे और कहा कि सिर कटा सकते हैं, धर्म नहीं छोड़ सकते।
अंततः औरंगजेब के आदेश पर 24 नवम्बर, 1675 ई॰ (विक्रमी संवत 1732) को जब जल्लाद जलालुद्दीन ने तलवार से गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया तब उनकी आयु मात्र 54 वर्ष थी।
उन्हें ‘हिंद की चादर’ के नाम से भी याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए।
आपके अद्वितीय बलिदान के बारे में गुरु गोविन्द सिंह जी ने ‘बिचित्र नाटक’ में लिखा है-
तिलक जंञू राखा प्रभ ताका॥ कीनो बडो कलू महि साका॥
साधन हेति इती जिनि करी॥ सीसु दीया परु सी न उचरी॥
धरम हेत साका जिनि कीआ॥ सीसु दीआ परु सिररु न दीआ॥ (दशम ग्रंथ)
जहां उनका शीश काटा गया था, आज दिल्ली में उसी स्थान पर उनकी स्मृति में गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया था, वहाँ गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब बना हुआ है।
गुरु तेग बहादुर की हत्या से संपूर्ण हिंदू समाज में भयंकर आक्रोश उत्पन्न हो गया। मुस्लिम शासन और उनके द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के विरुद्ध सामान्यजन का संघर्ष का संकल्प और भी दृढ़ हो गया। फलस्वरुप समाज उनके पुत्र और दशम गुरु गोविंद सिंह जी एवं अन्य संघर्षरत नायकों छत्रसाल, शिवाजी व संभाजी इत्यादि के नेतृत्व में मुस्लिम शासन को उखाड़ने में जुट गया।
तलवार के धनी होने के साथ गुरु तेग बहादुर आध्यात्मिक पुरुष भी थे। आपकी अनेक धार्मिक रचनाओं में 15 राग और 116 शब्द गुरु ग्रंथ साहिब (पृष्ठ 219-1427) में सम्मिलित हैं। इनमें ईश्वर का स्वरूप, मानवीय आसक्तियाँ, मन, दुःख, मृत्यु, शरीर, मान-सम्मान, सेवा और मुक्ति जैसे अनेक विषयों का वर्णन है। उनके रचित 115 श्लोक गुरुग्रन्थ साहब के अंत में सम्मिलित हैं।
आनंदपुर साहिब की मूल रूप से स्थापना गुरु तेग बहादुर जी ने जून 1665 में की थी। उन्होंने सतलुज नदी के किनारे मखोवाल नामक स्थान पर भूमि खरीदकर यह शहर बसाया जिसका नाम उन्होंने अपनी माता नानकी के सम्मान में ‘चक्क नानकी’ रखा था। यह स्थान सिखों के प्रमुख आध्यात्मिक और ऐतिहासिक केंद्रों में से एक है।
विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धान्त की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।
