सिखों के आठवें गुरु श्री गुरु हरकिशन साहिब जी थे। उन्हें ‘बाल गुरु’ और ‘बाला पीर’ के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म 7 जुलाई 1656 कीरतपुर रोपड़ में पिता गुरु हरराय एवं माता किशन कौर के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ।

1661 में 5 वर्ष की अल्प आयु में गुरू हरकिशन साहिब जी को उनके पिता गुरु हर राय ने अष्ठम्‌ गुरू के रूप में उत्तराधिकारी चुना। दुर्भाग्यवश इस गद्दी पर वे केवल तीन वर्ष तक रह पाए।

इस प्रकार से नाराज होकर राम राय जी ने औरंगजेब से इस बात की शिकायत की। इस संबंध में शाहजहां ने राम राय का पक्ष लेते हुए महाराजा जय सिंह को गुरू हर किशन जी को उनके समक्ष उपस्थित करने का आदेश दिया ताकि गुरुजी की आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा ले सकें। राजा जय सिंह ने अपना संदेशवाहक कीरतपुर भेजकर गुरू को दिल्ली लाने का आदेश दिया। पहले तो गुरू साहिब ने अनिच्छा जाहिर की परन्तु उनके गुरसिखों एवं राजा जय सिंह के बार-बार आग्रह करने पर वो दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गये।

इसके बाद पंजाब के सभी सामाजिक समूहों ने आकर गुरू साहिब को विदाई दी। उन्होंने गुरू साहिब को अम्बाला के निकट पंजोखरा गांव तक छोड़ा। इस स्थान पर गुरू साहिब ने लोगों को अपने अपने घर वापस जाने का आदेश दिया। गुरू साहिब अपने परिवारजनों व कुछ सिखों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुये। परन्तु इस स्थान को छोड़ने से पहले गुरू साहिब ने ईश्वर प्रदत्त अपनी शक्ति का परिचय दिया।

लाल चन्द नाम के एक हिन्दू साहित्य के प्रखर विद्वान एव आध्यात्मिक पुरुष थे जो इस बात से विचलित थे कि एक बालक को गुरुपद कैसे दिया जा सकता है। गुरु महाराज के सामर्थ्य पर शंका करते हुए लालचंद ने गुरू साहिब को गीता के श्लोकों का अर्थ करने की चुनौती दी। गुरू साहिब जी ने चुनौती स्वीकार की। लालचंद अपने साथ एक गूँगे बहरे निशक्त व अनपढ़ व्यक्ति छज्जु नामक पानी भरने वाले को लाया। गुरु जी ने छज्जु को सरोवर में स्नान करवा कर बैठाया और उसके सिर पर अपनी छड़ी इंगित कर के उसके मुख से संपूर्ण गीता सार सुनवा कर लाल चन्द को हतप्रभ कर दिया। इस स्थान पर आज के समय में एक भव्य गुरुद्वारा सुशोभित है जिसके बारे में लोकमान्यता है कि यहाँ स्नान करके शारीरिक व मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिलता है। इसके पश्चात लाल चन्द ने सिख धर्म को अपनाया एवं गुरू साहिब को कुरूक्षेत्र तक छोड़ा।

जब गुरू साहिब दिल्ली पहुंचे तो राजा जय सिंह एवं दिल्ली में रहने वाले सिखों ने उनका बड़े ही गर्मजोशी से स्वागत किया। गुरू साहिब को राजा जय सिंह के महल में ठहराया गया और उन्होंने औरंगजेब के दरबार में न जाकर वहीं से अपनी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय दिया। उनसे प्रभावित होकर सभी धर्म के लोगों का महल में गुरू साहिब के दर्शन के लिए तांता लग गया। बाद में चेचक की महामारी के दौरान बीमार लोगों की निस्वार्थ सेवा की।

इस दौरान एक बार राजा जयसिंह ने भी उनकी परीक्षा ली। उन्होंने एक समान सजी संवरी बहुत सी महिलाओं को गुरु साहिब के सामने उपस्थित किया और कहा कि वे असली रानी को पहचाने। गुरू साहिब एक महिला, जो कि नौकरानी की वेशभूषा में थी, की गोद में जाकर बैठ गये जो कि असली रानी थी। इसके अलावा भी सिख इतिहास में उनकी बौद्धिक क्षमता को लेकर बहुत सी साखियाँ प्रचलित हैं।

बहुत ही कम समय में गुरू हर किशन साहिब जी ने सामान्य जनता के साथ अपने मित्रतापूर्ण व्यवहार से राजधानी में लोगों से लोकप्रियता हासिल की। इसी दौरान दिल्ली में हैजा और छोटी माता जैसी बीमारियों का प्रकोप महामारी लेकर आया। मुगल राज जनता के प्रति असंवेदनशील थी। जात पात एवं ऊंच नीच को दरकिनार करते हुए गुरू साहिब ने सभी भारतीय जनों की सेवा का अभियान चलाया। खासकर दिल्ली में रहने वाले मुस्लिम उनकी इस मानवता की सेवा से बहुत प्रभावित हुए एवं वो उन्हें बाला पीर कहकर पुकारने लगे। जनभावना एवं परिस्थितियों को देखते हुए औरंगजेब भी उन्हें नहीं छेड़ सका। परन्तु साथ ही साथ औरंगजेब ने राम राय जी को शह भी देकर रखी ताकि सामाजिक मतभेद उजागर हों।

दिन रात महामारी से ग्रस्त लोगों की सेवा करते करते गुरू साहिब एक दिन छोटी चेचक के प्रकोप से ग्रस्त होकर तेज ज्वर से पीड़ित हो गये। जब उनकी हालत कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गयी तो उन्होने अपनी माता को अपने पास बुलाया और कहा कि उनका अन्त अब निकट है। जब उन्हें अपने उत्तराधिकारी को नाम लेने के लिए कहा तो उन्होंने बस ‘बाबा बकाला’ का नाम लिया। यह शब्द गुरू तेगबहादुर जी, जो कि पंजाब में ब्यास नदी के किनारे स्थित बकाला गांव में रह रहे थे, के लिए प्रयोग हुआ था।

अपने अन्त समय में गुरू साहिब ने सभी लोगों को निर्देश दिया कि कोई भी उनकी मृत्यु पर रोयेगा नहीं बल्कि गुरूबाणी में लिखे शबदों को गायेंगे। इस प्रकार बाला पीर 9 अप्रैल 1664 को धीरे से वाहेगुरू शबद् का उच्चारण करते हुए ज्योतिजोत समा गये। गुरू गोविन्द साहिब जी ने अपनी श्रद्धाजंलि देते हुए अरदास में दर्ज किया,

‘श्री हरकिशन धियाइये, जिस डिट्ठे सब दुख जाए’

दिल्ली में जिस महल में वे रहे, वह महल, जयपुर के महाराज जय सिंह ने सिख समुदाय को भेंट कर दिया। आज वहां ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब स्थित है।