भारत की धरा पर समय–समय पर ऐसी अनेक विभूतियों ने जन्म लिया है जिनके उपदेशों तथा कर्मों ने विश्व को एक नया मार्ग दिखाया है।
मध्यकाल में ज्ञान की चेतना को जागृत करने वाले धर्मसुधारक, समाजसुधारक, एकेश्वरवादी एवं गृहस्थ जीवन के पैरोकार सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 (कुछ ग्रंथों में उनका जन्म 20 अक्टूबर, 1469 को बताया गया है और तद्नुसार उनका जन्मदिन कार्तिक पूर्णिमा की 15वीं तिथि को मनाया जाता है) को रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी राय भोई गाँव (अब ननकाना साहिब पाकिस्तान) में भगवान राम के पुत्र कुश की वंशावली के अंतर्गत बेदी खत्री कुल में माता तृप्ता देवी और पिता मेहता कालू जी के घर हुआ था। अधिक संभावना है कि उनके दोनों बालक बालिका का जन्म उनके नाना-नानी के घर में हुआ हो, इसलिए उन्हें और उनकी बड़ी बहन को क्रमशः नानक और नानकी नाम दिया गया हो।
इनके पिता कालूराम पटवारी एक सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाले थे। वे सरकारी कार्य के अलावा कुछ खेती-बाड़ी भी करते थे। आपकी बहन नानकी आपसे 5 वर्ष बड़ी थी जिसने सर्वप्रथम आपमें दिव्यता का अनुभव किया था। नानकी, बालक नानक से अत्याधिक स्नेह करती थीं और नानक का अधिकांश समय बड़ी बहन के साथ ही बीतता था। बीबी नानकी के विवाह (1475 ई.) और उनके सुल्तानपुर चले जाने के बाद, गुरु नानक देव जी और अधिक गंभीर और अंतर्मुखी हो गए। सोलह साल की उम्र में पिता ने उनका विवाह बटाला नगर में रहने वाले मूलचंद और चंदो रानी की सुपुत्री सुलखनी देवी के साथ कर दिया। आपको दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई जिनका नाम श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द था।
नानक का दिव्य बचपन:-
नानक अपने घर की गायें भैंसें चराते हुए अपना अधिकांश समय हिंदू साधुओं और मुस्लिम दरवेशों के साथ ध्यान और ज्ञान चर्चा में बिताते थे। गुरु नानक जी कई मायनों में असाधारण और विशिष्ट बालक थे। सात वर्ष की आयु में उन्होंने हिंदी और संस्कृत सीख ली थी। तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने फारसी और अरबी सीख ली और सोलह वर्ष की आयु में वे उस क्षेत्र के सबसे विद्वान युवक बन गए थे। ईश्वर ने उन्हें चिंतनशील मन और तर्कसंगत चिंतन प्रदान किया था। उनका आंतरिक ज्ञान अल्पायु से ही प्रकट होने लगा था। दिव्य विषयों के बारे में अपने असाधारण ज्ञान से वे अपने शिक्षकों को आश्चर्यचकित कर देते थे। वे उन पहुँचे हुए संतों में से थे जो केवल सत्य के सम्मुख ही नतमस्तक होते हैं। उन्होंने परमात्मा के वास्तविक तत्व को समझ लिया था। इसी कारण वे किसी बाह्य अंधविश्वास में नहीं पड़ते थे।
20 वर्ष की आयु में वे अपनी बहन के पास सुल्तानपुर लोधी चले गए जहाँ उन्हें उनके बहनोई जयराम ने लाहौर के नवाब दौलत खान के यहां अनाज भंडार में काम दिलाया। जहां वे तेरह अंक आते ही ‘तेरा तेरा’ कहते हुए समस्त अनाज बांट दिया करते थे।
जनमसाखी के अनुसार लगभग 30 वर्ष की आयु में गुरु नानक देव जी को इसी नगर की बेईं नदी (काली बेईं – Kali Bein) में स्नान करते हुए ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। माना जाता है कि वे यहाँ स्नान करते समय अदृश्य हो गए थे और तीन दिन बाद पुनः प्रकट होकर उन्होंने ‘इक ओंकार’ (एक ईश्वर) का संदेश दिया और भारतीय भिक्षुओं की परंपरा का पालन करते हुए एक लंबी यात्रा पर निकल पड़े।
सिख पंथ की स्थापना :
गुरु नानक एक भारतीय आध्यात्मिक शिक्षक, रहस्यवादी और कवि थे जिन्हें सिख पंथ का संस्थापक माना जाता है लेकिन विशेष बात यह है कि इस पंथ की स्थापना किसी घोषणा के माध्यम से न होकर 15वीं शताब्दी के अंत में एक आध्यात्मिक-सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में शुरू हुई अर्थात् किसी एक औपचारिक घोषणा के बजाय गुरु नानक जी के आध्यात्मिक उपदेशों, जीवनशैली और ‘करतारपुर’ में लंगर, पंगत व संगत जैसी संस्थाओं के माध्यम से उनके अनुगामियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली गई। और फिर जिसने गुरु की ‘सीख’ ले ली, वो ‘सिख’ (शिष्य) कहलाए और परिणामस्वरूप सिख पंथ अस्तित्व में आया।
गुरु नानक जी की शिक्षाएं:-
ईश्वर एक है और ईश्वर निराकार, सत्य और सर्वव्यापी है। इसलिए उन्होंने कहा ‘एक ओंकार’ जिसे गुरुमुखी लिपि में ੴ लिखा जाता है। यह पंजाबी के अंक ‘1’ (एक) और गुरुमुखी अक्षर ‘ਓ’ (ओ) से मिलकर बना है
गुरु नानक जी ने समानता पर पूरा जोर दिया और जाति-पाति व अंधविश्वास का कड़ा विरोध किया। जाति-पाति का भेदभाव मिटाने के लिए लंगर (निःशुल्क सामुदायिक रसोई), पंगत (एक साथ बैठकर भोजन करना) और संगत (साथ मिलकर सत्संग/प्रार्थना करना) की शुरुआत की गयी।
उन्होंने तीन मुख्य सिद्धांत दिये, नाम जपो (ईश्वर का नाम लो), किरत करो (सत्य निष्ठा से कर्म कर कमाओ) और वंड छक्को (मिल-बांटकर खाओ)।
गुरु नानक देव जी ने स्थूल भौतिकवाद से विरक्त गृहस्थ जीवन पर बल दिया। उन्होंने मानव मन और आत्मा को पवित्र करने के लिए सनातन मान्यताओं के अनुरूप पाँच प्रमुख विकारों या दोषों, “काम क्रोध लोभ मोह अहंकार” का उल्लेख किया है। ये दोष मनुष्य को ईश्वर से दूर ले जाते हैं और आध्यात्मिक उन्नति में बाधा डालते हैं। वे ध्यान (सिमरन) और ईश्वर के नाम के जप के माध्यम से पुनर्जन्म से मुक्ति पर जोर देते हैं।
गुरु नानक देव जी ने सिख पंथ को जाति-विहीन और समतावादी बताते हुए स्पष्ट किया कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं। उन्होंने सरबत दा भला अर्थात् सबकी भलाई के लिये प्रार्थना करने का संदेश दिया। उन्होंने स्वयं को ‘नीचों में नीच’ बताते हुए कहा कि जाति केवल मनुष्यों की बनाया हुआ कृत्रिम विभाजन है जो ईश्वर की एकता के विरुद्ध है। “ना को हिंदू, ना मुसलमान” का नारा देकर उन्होंने धार्मिक व जातिगत कट्टरता का विरोध किया। ‘माटी एक सगल संसारा’ (संसार की मिट्टी एक है) संदेश देकर मानवता की एकता पर जोर दिया।
कुछ विद्वानों का मत है कि सिख पंथ – हिंदू धर्म और मुस्लिम मत का मिश्रित रूप है। गुरुनानक और सूफी संत शेख फरीद के बीच गाढ़ी मैत्री थी, इस बात को नकारा नहीं जा सकता है और गुरु ग्रंथ साहिब में शेख फरीद की रचनाओं का समावेश भी हुआ है लेकिन सिख रहत नामा और खालसा परंपरा में खालसा पंथ को ‘शुद्ध पंथ’ अथवा ‘निर्मल पंथ’ (Pure Panth/Order) की संज्ञा दी गई है।
उनके उपदेश, जो भक्ति गीतों के माध्यम से व्यक्त किए गए हैं जिन्हें आमतौर पर शबद के नाम से जाना जाता है।
जपजी साहिब, आसा-दी-वार, बारा-मह, सिद्ध-गोश्त, कीर्तन सोहिला, ओंकार (दखनी) सहित 974 भजन लिखे जिन्हें श्री गुरु अर्जन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया। गुरु ग्रंथ साहब का आरंभिक पाठ, मूल मंत्र, की उन्होंने रचना की।
“इक ओंकार, सत नाम, कर्ता पुरख, निर्भओ, निर्वैर, अकाल मूरत, अजुनि सइभाओ, गुर प्रसाद।”
जिसका अर्थ है, केवल एक ही ईश्वर है, शाश्वत सत्य ही उनका नाम है, वे सृष्टिकर्ता हैं, भय रहित, घृणा रहित, निराकार, जन्म और मृत्यु से परे, स्वयंभू, गुरु की कृपा से।
वे एक कुशल संगीतकार भी थे। उन्होंने भाई मरदाना के साथ मिलकर विभिन्न भारतीय शास्त्रीय रागों में ऐसी धुनें रचीं, जिन्होंने बाबर जैसे जंगली जानवरों को भी मोहित कर दिया, ऋषि राजाओं को वश में कर लिया, कट्टरपंथियों और अत्याचारियों को क्रोधित कर दिया और बदमाशों और लुटेरों को संत बना दिया।
गुरु नानक के सामाजिक सुधार :
नानक अपने समय के महान समाज-सुधारक थे। उन्होंने समाज में व्याप्त आडंबरों, पाखंडों और कुरीतियों का कड़ा विरोध किया। समाज में तत्कालीन परिस्थितियों के दबाव में चलन में आ गए रीति-रिवाजों जैसे सती-प्रथा, बलि-प्रथा, मूर्ति-पूजा, पर्दा-प्रथा को उन्होंने अस्वीकृत किया। वे बलात् धर्मांतरण के भी कड़े विरोधी थे। उनका मानना था कि सभी प्राणी एक समान हैं और कोई छोटा-बड़ा नहीं है।
मुगलकाल के घोर स्त्री उत्पीड़न युग में गुरु नानक जी कहते हैं कि, “सो किऊँ मंदा आखिए जितु जम्मे राजान“ उस नारी को बुरा किस लिये कहा जा सकता है जिसने अनेक राजाओं को जन्म दिया है। उक्त पंक्ति से गुरु नानक देव जी के मन में स्त्री के प्रति कितना आदर भाव था यह स्पष्ट होता है।
गुरु नानक की धर्म यात्राएं :
सत्य की खोज में गुरु नानक ने अपने दो प्रिय शिष्यों बाला एवं मरदाना के साथ देश -विदेश की यात्राएं कीं थीं। गुरुनानक ने कुल पांच उदासियां जिसमें भारत की चारों दिशाओं की यात्राओं के अतिरिक्त ईरान, अफगानिस्तान, अरब और इराक की यात्राएं भी की, सम्मिलित हैं। उनकी आध्यात्मिक यात्राओं का मूल उद्देश्य तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों को समझना था, जिनका समग्र विश्लेषण-चिंतन कर उनके सारतत्वों को ले, एक नये समाज का निर्माण कर सकें। सिख पंथ में नानक देव जी की इन यात्राओं को ‘उदासियां’ कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन में 28,000 किलोमीटर से अधिक की यात्राएं की।
आपकी इन यात्राओं में आपके अनेक कार्यों/चमत्कारों ने भी लोगों को सत्य मार्ग की ओर अग्रसर किया जिसमें बचपन में सच्चा सौदा के नाम पर पिता द्वारा व्यापार हेतु दिए पैसों से भूखे संतों को भोजन करवाना, काबा में ‘जिस तरफ भगवान ना हो उसे तरफ मेरे पांव मोड़ दो’, ‘अत्याचारी सेठ की रोटी में से खून और निर्धन कृषक की रोटी में से दूध निकलना’, हरिद्वार से अपने खेतों को पानी देना’, ‘अत्याचारियों को बसे रहने का आशीर्वाद और आदर सत्कार करने वालों को उजड़ जाने का शाप’ वर्तमान पाकिस्तान के हसन अब्दाल में वली कंधारी द्वारा फेंकी गई एक चट्टान को अपने पंजे से रोकना, (पंजा साहब गुरुद्वारा) और कारगिल लद्दाख में उन्हें कुचलने को लुढ़काई बड़ी चट्टान का उनकी पीठ से लग कर रुक जाना (गुरुद्वारा पत्थर साहिब) इत्यादि प्रसिद्ध घटनाएं हैं।
इन उदासियों के फलस्वरुप उन्हें विभिन्न देशों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है जैसे अफगानिस्तान में पीर बलगदान, श्रीलंका में नानकाचार्य, तिब्बत में नानक लामा, नेपाल में नानक ऋषि, इराक में नानक पीर, सऊदी अरब में वली हिंदी, मिस्र में नानक वली, रूस में नानक कदमदार और चीन में बाबा फूसा।
गुरुनानक देव जी के सिद्धांत :
1. ईश्वर एक है और उसी की उपासना करो।
2. जगत का कर्त्ता सब जगत और सब प्राणीमात्र में मौजूद है।
3. सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।
4. सत्यनिष्ठा से परिश्रम करके उदरपूर्ति करना चाहिये। और उसमें से ज़रूरतमंद को भी कुछ अंश देना चाहिये।
5. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं।
6. भोजन जीवित रहने के लिये जरूरी है पर लोभ -लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।
7. सदा प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने को क्षमाशीलता मांगना चाहिये।
8. स्त्री और पुरूष समान हैं।
22 सितंबर 1539 को 70 वर्ष की आयु में आपने करतारपुर (वर्तमान पंजाब, पाकिस्तान) में अपनी इहलीला समाप्त कर परलोक गमन किया।
गुरु नानक के जीवन के बारे में जो थोड़ी-बहुत जानकारी उपलब्ध है, वह मुख्य रूप से किंवदंतियों , किस्सों और परंपराओं के माध्यम से ही पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इन किस्सों को ‘साखी’ (साक्षी) या ‘कथाएं’ कहा जाता है।
वे एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्हें सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु के रूप में पूजा जाता है। सिख धर्म एक एकेश्वरवादी धर्म है जो आध्यात्मिक मूल्यों और परंपराओं को समाहित करता है। उनके उपदेश, जो भक्ति गीतों के माध्यम से व्यक्त किए गए हैं जिन्हें आमतौर पर शबद के नाम से जाना जाता है। वे ध्यान (सिमरन) और ईश्वर के नाम के जप के माध्यम से पुनर्जन्म से मुक्ति पर जोर देते हैं। उन्होंने इस लेख के प्रारंभ में उल्लेखित मूल मंत्र की रचना की जो आदि ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब जिसमें सभी 10 सिख गुरुओं की रचनाएँ और बानियाँ (कथन) शामिल हैं, का आरंभिक पाठ है।
गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ।
अमर पदारथु नानका मनि मानिऐ सुख होई॥
