दादा दाता एक है, सबको देवनहार।
देंदा तोट न आवै, अगणित भरे भंडार॥
गुरु अमरदास जी (1479–1574) सिख पंथ के तीसरे गुरु थे। उनका जन्म 5 मई 1479 को अमृतसर के बासरके गाँव में माता बख्त कौर जिन्हें सुलखनी, लखमी देवी या रूप कौर के नाम से भी जाना जाता था और पिता तेज भान के यहां हुआ था। उनका परिवार खत्री जाति के भल्ला गोत्र से संबंधित था। अमर दास पिता के चार पुत्रों में सबसे बड़े थे। उन्होंने कृषक और व्यापारी के रूप में काम किया। उनका विवाह मंसा देवी के साथ हुआ और उनके चार संतानें हुईं जिनमें दो बेटियां दानी और भानी तथा दो बेटे मोहन और मोहरी थे। भानी चारों बच्चों में उनकी सबसे प्रिय संतान थी।
अमर दास ने अपने जीवन का अधिकांश समय हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा का पालन करते हुए बिताया। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने हिमालय में लगभग बीस तीर्थयात्राएँ कीं। 1539 में एक तीर्थयात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक साधु से हुई जिसने उन्हें बताया कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिलता। तो अमर दास को लगा कि जिस परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु वो भटक रहे हैं, उसके लिए एक सद्गुरु होना आवश्यक है।
गुरु की खोज में तीर्थयात्रा पर जाते समय उन्होंने अपने भतीजे की पत्नी बीबी अमरो को गुरु नानक का भजन गाते हुए सुना और उससे अत्यंत प्रभावित हुए। अमरो सिख परम्परा के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी की पुत्री थीं। अमर दास ने अमरो को उनके पिता से मिलवाने के लिए कहा।
1539 में साठ वर्ष की आयु में वे गुरु अंगद से मिले और उनसे प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए और स्वयं को गुरु के प्रति समर्पित कर दिया। वे सिख परंपरा में गुरु अंगद की अथक सेवा के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके बारे में किंवदंतियाँ प्रचलित हैं कि वे सुबह जल्दी उठकर अपने गुरु के स्नान के लिए पानी लाते थे। गुरु के साथ स्वयंसेवकों के लिए सफाई और खाना बनाते थे। साथ ही सुबह और शाम को ध्यान और प्रार्थना में काफी समय व्यतीत करते थे।
गुरु अंगद और संगत की ग्यारह वर्षों की अत्यंत समर्पित सेवा और निस्वार्थ भक्ति के कारण, गुरु अंगददेव जी ने 29 मार्च 1552 को अमर दास को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी नामित किया। इससे गुरु अंगद देव के पुत्र उनसे नाराज हो गए। तीसरे गुरु के रूप में नामित होने के बाद वे गुरु अंगद देव के पुत्र दातू से किसी प्रकार के विवाद को टालने के उद्देश्य से गोइन्दवाल चले गए। दातू ने गोइंदवाल पहुंचकर उनसे अपमानपूर्वक व्यवहार किया किंतु गुरु अमरदास शांत रहे। दातू ने स्वयं को गुरु घोषित कर दिया लेकिन कोई भी सिख उनका अनुयायी बनने को तैयार ना हुआ। बाबा बुड्ढा के कहने पर गुरु अमरदास वापस गोइन्दवाल आ गए। उन्होंने 73 वर्ष की आयु में गुरु गद्दी संभाली और 22 वर्षों तक सेवा की।
उन्होंने भजनों को एक पुस्तक में संकलित किया, जिसने अंततः आदि ग्रंथ के निर्माण में योगदान दिया। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी और श्री गुरु अंगद देव जी के भजनों की कई प्रतियां तैयार करवाईं। उन्होंने आनंद साहिब सहित 869 (कुछ अभिलेखों के अनुसार ये 709 अथवा 900 थे) श्लोकों की रचना की और श्री गुरु अर्जन देव जी ने सभी शबदों को गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनाया।
गुरु अमर दास ने 22 मंजी (धार्मिक प्रशासन के क्षेत्रीय केंद्र) स्थापित किए जिनमें से प्रत्येक का प्रभार एक धर्मनिष्ठ सिख को सौंपा गया था। उन्होंने स्वयं भारत के विभिन्न भागों का दौरा किया और सिख धर्म का प्रसार करने के लिए सिख मिशनरियों को भेजा। मंजी के समान एक अन्य संगठन पीरी था जिसमें सिख सभाओं और समुदायों के लिए 52 महिला उपदेशक और प्रचारक शामिल किए जिन्हें महिलाओं, विशेषकर मुस्लिम पृष्ठभूमि से संबंधित महिलाओं के बीच, सिख धर्म का प्रसार करने का निर्देश दिया गया था।
मंजी और पीरी प्रणालियों की स्थापना से पंजाब में सिख पंथ में आने वाले नए मतांतरितों की बड़ी संख्या थी। इन मतांतरित लोगों को सिख मान्यताओं और आचार संहिता के बारे में निर्देश देने के लिए उपदेशकों और प्रचारकों को नियुक्त किया गया था। उन्होंने अफगानिस्तान और कश्मीर क्षेत्र में भी महिलाओं को सामुदायिक नेता नियुक्त किया। सिख पंथ की शिक्षाओं को महिलाओं तक पहुंचाने की पीरी प्रणाली का नेतृत्व करने के लिए भानी (उनकी छोटी बेटी), बीबी दानी (उनकी बड़ी बेटी) और बीबी पाल जैसी विदुषी महिलाएं नियुक्त की गई थीं। पीरी प्रणाली ने महिलाओं को सामाजिक और धार्मिक मानदंडों और रीति-रिवाजों में भी शिक्षित किया।
सिखों में आय का दसवां हिस्सा गुरु के नाम पर और सामुदायिक धार्मिक संसाधनों के रूप में देने की प्रणाली शुरू की।
उन्होंने सिख धर्म की प्रसिद्ध लंगर परंपरा की शुरुआत की जहाँ बिना किसी भेदभाव के कोई भी व्यक्ति समुदाय के एकत्रीकरण में मुफ्त भोजन प्राप्त कर सकता था।
उन्होंने “पहिले पंगत, पाछे संगत” का सिद्धांत दिया, अर्थात लंगर में भोजन करने के बाद ही गुरु से मिला जा सकता है। एक बार सम्राट अकबर गुरु जी से मिलने आए और गुरु जी से मिलने से पहले उन्हें सामान्य लोगों के साथ बैठकर लंगर में रखा हुआ चावल खाना पड़ा। वे इस व्यवस्था से बहुत प्रभावित हुए और गुरु के लंगर के लिए राजमहल से कुछ दान करने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन गुरु साहब ने आदरपूर्वक इसे अस्वीकार कर दिया। श्री गुरु अमरदास जी ने अकबर को यमुना और गंगा पार करते समय गैर-मुसलमानों से लिया जाने वाला तीर्थयात्री शुल्क माफ करने के लिए कहा। सिख जीवनी, जिन्हें जनम-साखियाँ कहा जाता है, में उल्लेख है कि गुरु अमरदास ने अकबर को हरिद्वार जाने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों पर लगने वाले कर को समाप्त करने के लिए राजी किया।
उन्होंने गोइंदवाल में 84 मंजिला बावड़ी नामक सीढ़ीदार कुएं का भी उद्घाटन किया जिसमें विश्राम स्थल भी था। यह भारतीय धर्मशाला की परंपरा पर आधारित था जो बाद में सिख तीर्थस्थल बन गया।
गुरु अमरदास जी का जीवन विनम्रता, सेवा और समर्पण का प्रतीक था। उन्होंने सिख समुदाय को संगठित करने और सामाजिक समानता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुरु अमर दास ने एक समाज सुधारक के रूप में क्षत्रियों को उनका क्षात्र धर्म समझाते हुए लोगों की रक्षा और न्याय के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मुसलमानों की भांति सिख महिलाओं में पर्दा प्रथा के अंधानुकरण का विरोध करके, विधवा पुनर्विवाह की अनुमति देकर, अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देकर, एकविवाह को प्रोत्साहित करके, सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाकर और पर्दा प्रथा को हतोत्साहित करके जैसे सामाजिक सुधार भी किए। उन्होंने जन्म, विवाह और मृत्यु से संबंधित नए रीति-रिवाजों की शुरुआत की। उन्होंने आनंद कारज विवाह समारोह की शुरुआत की। इस प्रकार उन्होंने नवजात सिख धर्म के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाया और इसके परिणामस्वरूप उन्हें कतिपय रूढ़िवादी हिंदुओं और मुस्लिम कट्टरपंथियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने हिंदू तीर्थ स्थलों की यात्रा करना और मुस्लिम स्थलों पर श्रद्धांजलि अर्पित करना निषिद्ध किया था। उन्होंने सिखों के लिए तीन गुरुपर्व निर्धारित किए: दिवाली, वैशाखी और माघी।
श्री गुरु अमरदास जी ने अपने किसी भी पुत्र को गुरु पद के योग्य नहीं समझा और इसके बजाय अपने दामाद रामदास जी को अपना उत्तराधिकारी चुना। यह भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से एक सही कदम था, क्योंकि बीबी भानी जी और गुरु रामदास साहब में सच्ची सेवा भावना थी और सिख सिद्धांतों की उनकी गहरी समझ इस पद के लिए उपयुक्त थी। यह प्रथा दर्शाती है कि गुरु पद सिख धर्म के लिए उपयुक्त किसी भी व्यक्ति को सौंपा जा सकता है, न कि किसी एक ही परिवार या अन्य परिवार के सदस्य को।
श्री गुरु अमरदास जी का 95 वर्ष की परिपक्व आयु में 1 सितंबर, 1574 (भादों सुदी 14, संवत 1631) को चौथे नानक श्री गुरु रामदास जी को गुरु पद की जिम्मेदारी सौंपने के बाद गोइंदवाल साहिब में निधन हो गया। वे एक महत्त्वपूर्ण विरासत छोड़ गए जो आज भी सिख समुदाय को प्रेरित कर रही है।
सबदि रती सोहागणी, सतिगुर कै भाइ पिआरि।
सदा रावे पिवु आपणा, सवै प्रेमि पिआरि॥
