हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइिआ।
वडभागी हरि नामु धिआइिआ।।
गुरु राम दास (1534–1581) सिख धर्म के दस गुरुओं में से चौथे गुरु थे । उनका जन्म 9 अक्टूबर, 1534 को लाहौर के चूना मंडी में एक गरीब हिंदू परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम हरिदास और माता का नाम अनूप देवी था। आप सोढ़ी खत्री जाति के थे। अपने घर का ज्येष्ट पुत्र होने के कारण उनका नाम भाई जेठा रख गया था। वे जब 7 वर्ष के थे, उनके माता-पिता का देहांत होने से वे अनाथ हो गए और वे अपनी दादी के साथ बसारके गाँव चले गए। वृद्ध दादी के लिए तीन भाई बहनों का पालनपोषण कठिन था। अपनी आजीविका के लिए उन्हें विवशतः बचपन से ही काम करना पड़ा। लगभग नौ वर्ष की आयु में, जेठा बसारके के स्थानीय बाज़ार में उबले हुए चने और उबला हुआ गेहूँ बेचकर जीविका कमाते थे।
12 वर्ष की आयु में, भाई जेठा और उनकी दादी गोइन्दवाल चले गए जहाँ उनकी मुलाकात गुरु अमरदास से हुई। जेठा ने गुरु अमरदास जी को अपना गुरु माना और गुरुजी से अपनी सेवा में रखने का अनुरोध किया। जेठा को लंगर में बर्तनों की सफाई और पीने का पानी परोसने का काम सौंपा गया था। साथ ही उन्हें पंगत से संबंधित अतिरिक्त काम भी दिए गए थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने वहां पानी की टंकी के निर्माण हेतु खुदाई का काम भी किया। उन्होंने गुरु अमर दास जी के साथ धार्मिक यात्राएं भी की और उनकी सेवा की। गुरु की सेवा करते हुए वे धीरे धीरे गुरू अमरदास जी के अति प्रिय व विश्वासपात्र शिष्य बन गए।
गुरु अमर दास के संरक्षण में भाई जेठा ने उत्तर भारतीय संगीत परंपरा में शिक्षा प्राप्त की। उनका सेवाभाव और सद्चरित्र देख कर गुरुजी ने 1553 में अपनी पुत्री भानी बीबी का विवाह उनसे कर दिया और वे गुरु के परिवार का हिस्सा बन गए। उनके तीन पुत्र हुए। पृथ्वी चंद, महादेव और अरजन।
सिख धर्म के पहले दो गुरुओं की तरह गुरु अमरदास ने अपने पुत्रों को उत्तराधिकारी चुनने के बजाय भाई जेठा को अपना उत्तराधिकारी चुना जिन्हें गुरु बनने से पहले कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा और उनका नाम बदलकर रामदास रखा गया जिसका अर्थ है “राम का सेवक”।
1574 में जेठा जी गुरु रामदास के नाम से सिख पंथ के चौथे गुरु बने। उन्हें गुरु अमरदास के पुत्रों के साथ शत्रुता का सामना करना पड़ा जिससे उन्हें अपना आधिकारिक केंद्र गुरु-दा-चक्क में स्थानांतारित करना पड़ा। सिख ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार गुरु अमरदास ने जेठा जी से एक नया शहर बसाने के लिए भूमि खोजने को कहा था जिसे वे अपना आधार बनाएंगे। तदुपरांत इस स्थान का चयन गुरु अमर दास ने किया था जैसे कि उन्होंने गुरु दा चक्क नाम दिया।
1574 में अपने राज्याभिषेक के बाद गुरु अमर दास के पुत्रों के कड़े विरोध के बावजूद गुरु रामदास जी ने 1577 में उक्त गुरु दा चक्क स्थान पर अपने नाम पर चक रामदास की स्थापना की और पवित्र अमृत सरोवर की खुदाई शुरू करवाई। गुरू जी ने स्वयं विभिन्न व्यापारों से सम्बन्धित व्यापारियों को इस शहर में आमंत्रित किया। यह कदम आर्थिक और नगरीय विकास की दृष्टि से बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। देखते ही देखते यह शहर व्यापारिक दृष्टि से लाहौर की ही तरह महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। यहाँ भक्तों के लिए भजन-ध्यान का स्थान और सरोवर बनाया गया जो कालांतर में हरिमंदिर (स्वर्ण मंदिर) और अमृत सरोवर कहलाया। इस प्रकार सिख पंथ के लिए ननकाना साहब और करतारपुर के पश्चात् श्रद्धा का यह नया केंद्र निर्मित हुआ।
श्री गुरु रामदास जी अपने कार्यकाल के दौरान 30 रागों में 638 शबदों का लेख किया, जिनमें पौउड़ी 138 श्लोक 31 अष्टपदी और 4 वारें शामिल है, जिन्हें बाद में धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में भी उतारा गया। उन्होंने ‘आनंद कारज’ (सिख विवाह पद्धति) की रचना की और 30 रागों में 638 भजनों का सृजन किया।
गुरू रामदास साहिब जी ने सिख धर्म को ‘आनन्द कारज’ के लिए ‘चार लावों’ (फेरों) की रचना की और सरल विवाह की गुरमत मर्यादा को समाज के सामने रखा। इस प्रकार उन्होने सिक्ख पंथ के लिए एक विलक्षण वैवाहिक पद्धति दी।
सिख परंपरा में उन्हें मंजी (धार्मिक नियुक्तियों और दान के संचालन के लिए संगठन) के विस्तार और सिख आंदोलन को धार्मिक और आर्थिक रूप से समर्थन देने के लिए भी याद किया जाता है।
प्रारंभ के चार गुरुओं ने अपने वंशजों को अपना उत्तराधिकारी नामित नहीं किया। उसके विपरीत ज्योति जोत में समाने से पूर्व, गुरु रामदास जी ने अपने छोटे पुत्र अरजन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना जिसका कि उनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वी चंद ने बहुत विरोध किया। इसके पश्चात् गुरु का पद वंशानुगत हो गया।
अपने अंत समय में वे अमृतसर छोड़कर गोइन्दवाल चले गये और 1 सितम्बर 1581 को गुरु ज्योति-ज्योत में समा गए। उन्होंने मानव कल्याण के लिए जो-जो भी सेवा कार्य किए, वे आज भी पूरी दुनिया के लिए एक बेहतरीन सीख है। आज गुरु रामदास जी के लिखे श्लोक व् भजन पूरे संसार को ज्ञान व् भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते है।
सिख परंपरा में गुरु रामदास को अमृतसर के पवित्र शहर की स्थापना के लिए जाना जाता है। गुरु रामदास जिस भूमि पर बसे थे, उसके बारे में कहानी के दो संस्करण प्रचलित हैं। एक संस्करण में, अभिलेख के आधार पर, यह भूमि सिख दान से तुंग गांव के मालिकों से 700 रुपये में प्राप्त की गई थी। दूसरे संस्करण में, सम्राट अकबर ने गुरु रामदास की पत्नी को भूमि दान में दी थी।
और पास में ही अपना आधिकारिक केंद्र और निवास स्थान बनाया। उन्होंने भारत के अन्य भागों से व्यापारियों और कारीगरों को अपने साथ इस नए शहर में बसने के लिए आमंत्रित किया। गुरु अर्जन के समय में यह शहर दान से वित्तपोषित और स्वयंसेवी श्रम से निर्मित होकर विस्तारित हुआ। शहर का विस्तार हुआ और इसका नाम बदलकर अमृतसर कर दिया गया। आधार स्थल एक विशाल मंदिर में विकसित हुआ, जहाँ बाद में उनके पुत्र ने हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा बनवाया और 1604 में सिख धर्म के ग्रंथों को नए मंदिर में रखा।
1574 और 1604 के बीच निर्माण गतिविधि का वर्णन महिमा प्रकाश वर्तक में किया गया है , जो एक अर्ध-ऐतिहासिक सिख जीवनी ग्रंथ है, जिसे संभवतः 1741 में रचा गया था, और दस गुरुओं के जीवन से संबंधित सबसे पुराना ज्ञात दस्तावेज है।
गुरु रामदास ने 638 भजन रचे, जो गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद भजनों का लगभग दस प्रतिशत है । वे एक प्रसिद्ध कवि थे, और उनकी रचनाओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत के 30 प्राचीन रागों में संगीतबद्ध किया गया था।
इनमें कई विषयों को शामिल किया गया है। गुरु बानी सिखों के दैनिक प्रार्थनाओं, नानकशाही पंचांग और कीर्तन सोहिला का भी हिस्सा है। उनकी रचनाएँ आज भी सिख धर्म के हरिमंदिर साहिब ( स्वर्ण मंदिर ) में प्रतिदिन गाई जाती हैं।
गुरु रामदास जी का जीवन और कार्य सिख धर्म के मूल मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है, जिनमें निस्वार्थ सेवा, भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज शामिल है।
सिख धर्म में उनका योगदान, विशेष रूप से अमृतसर और हरमंदिर साहिब की स्थापना, सिख आध्यात्मिकता और आतिथ्य सत्कार के स्थायी प्रतीक हैं।
गुरु रामदास जी की विरासत उनकी शिक्षाओं, भजनों और सिख संस्कृति और इतिहास पर उनके गहन प्रभाव के माध्यम से जीवित है।
सतगुरु की सेवा सफल है, जे को करे चित लाय।
मनि इच्छा फलु पाइसी, मेलि लए मिलिआय।।
