“नउ निधि अमृतु प्रभ का नामु, देही महि इस का बिस्रामु”
सिख गुरु परम्परा में गुरु अंगददेव जी दूसरे गुरु के रूप में गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी बने। उनके जन्म दिनांक और जन्म स्थान में मतभेद है। एक मत के अनुसार 31 मार्च 1504 को और दूसरे मतानुसार 10 अप्रैल 1504 (वैसाख वदी 1 (पंचम् वैसाख) सम्वत 1561) को हुआ था। जन्मस्थान के बारे में भी दो मत हैं। एक मत के अनुसार जन्मस्थान पंजाब के मत्ते दी सराय (अब सराय नागा) है और अन्य मतानुसार हरिके गांव फिरोजपुर है।
उनके पिता भाई फेरूमल त्रेहन एक छोटे व्यापारी थे और उनकी माता रामो गृहिणी थीं। उनके बचपन का नाम भाई लहना था। उनके पिता एक छोटे व्यापारी थे। बाबा नारायण दास त्रेहन उनके दादा जी थे। १५२० में उनका विवाह माता खीवीं जी से हुआ। उनसे उनके दो पुत्र – दासू जी एवं दातू जी तथा दो पुत्रियाँ – अमरो जी एवं अनोखी जी हुई।
बाबर के साथ आये मुगल एवं बलूच लुटेरों की लूटपाट की वजह से फेरू जी को अपना पैतृक गाँव छोड़ना पड़ा। इसके पश्चात उनका परिवार तरन तारन के समीप अमृतसर से लगभग २५ कि॰मी॰ दूर स्थित खडूर साहिब नामक गाँव में बस गया जो कि ब्यास नदी के किनारे स्थित था।
अपने शुरुआती वर्षों में भाई लहना हिंदू परंपराओं का पालन करते थे। वे माता दुर्गा के अनन्य भक्त थे। वे धार्मिक मेलों और अनुष्ठानों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे, जिसने उनके प्रारंभिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण को आकार दिया।
एक बार भाई लहना ने नानक के एक अनुयायी के मुख से गुरू नानक साहिब जी के शबद सुने और शब्द में कहे गए गुरमत के फलसफे से वो बहुत प्रभावित हुए। लहना जी ने निर्णय लिया कि वो सतगुर नानक साहिब के दर्शन के लिए करतारपुर जायेंगे। उनकी सतगुर नानक साहिब जी से पहली भेंट ने उनके जीवन में क्रांति ला दी। सतगुर नानक ने उन्हें आदि शक्ति या हुक्म का भेद समझाया और बताया की परमेश्वर की रूप व आकार हीन है और उसकी प्राप्ति सिर्फ अपनी अंतर्शक्ति जागृत कर ही की जा सकती है। सतगुरु नानक से भाई लहने ने आत्मज्ञान लिया जिसने उन्हें पूर्ण रूप से बदल दिया। वो गुरू नानक देव की विचारधारा के सिख बन गये। उन्होने गुरू साहिब की सेवा में 6-7 वर्ष करतारपुर में बिताये।
गुरु नानक देव जी ने अपने पुत्रों के साथ भाई लहना की सात परीक्षाएं लीं जिन्हें वे गुरू की आज्ञा मान प्रसन्नतापूर्वक और तत्परता से पूरी करने को उद्यत हुए जबकि गुरुजी के पुत्रों ने मना कर दिया।
निस्वार्थ सेवा, विनम्रता और आज्ञाकारिता के गुणों के कारण स्वाभाविक रूप से गुरु नानक देव जी ने अपने पुत्रों की नाराजगी के बावजूद उन्हें सिख पंथ के अगले गुरू के रूप में चुना और 7 सितम्बर 1539 को उन्हें गुरु पद सौंपा। गुरू नानक देव जी ने भाई लहना को अपना “अंग” (शरीर का हिस्सा) माना और ‘अंगद’ अर्थात् “गुरु का अंश” नाम दिया।
2 अक्टूबर 1539 को गुरू नानक देव जी के ज्योति जोत में समाने के पश्चात गुरू अंगद साहिब करतारपुर छोड़ कर खडूर साहिब गाँव (गोइन्दवाल के समीप) चले गये। उन्होने गुरू नानक देव जी के विचारों को लिखित एवं भावनात्मक दोनों ही रूप में प्रचारित किया। विभिन्न मतावलम्बियों, मतों, पंथों, सम्प्रदायों के योगी एवं संतों से उन्होंने आध्यात्म के विषय में गहन वार्तालाप किया।
गुरू अंगद साहिब ने गुरु नानकदेव देव प्रदत्त पंजाबी लिपि के वर्णों में फेरबदल कर गुरूमुखी लिपि की एक वर्णमाला को प्रस्तुत किया। यह कदम क्रांतिकारी था क्योंकि इससे सिख गुरुओं की शिक्षाओं को आम लोगों की भाषा में लिखा जा सका। यह लिपि सिख साहित्य और धार्मिक भजनों का माध्यम बनी जिससे पंजाबी पहचान मज़बूत हुई। वह लिपि बहुत जल्द लोगों में लोकप्रिय हो गयी। साक्षरता फैलाने के लिए गुरु अंगद देव जी ने पाठशालाएं स्थापित कीं जहां पंजाबी भाषा को गुरुमुखी लिपि में पढ़ाया जाता था। इस कदम ने शिक्षा को आम लोगों के लिए सुलभ बनाया और संस्कृत और फ़ारसी के प्रभुत्व को तोड़ा।
उन्होने गुरू नानक जी द्वारा चलायी गयी ‘गुरू का लंगर’ की प्रथा को सशक्त तथा प्रभावी बनाया जिसके प्रबंधन में माता खीवी की प्रमुख भूमिका थी। लंगर जातिगत समानता का एक सशक्त प्रतीक बन गया, जहाँ सभी लोग, चाहे किसी भी पृष्ठभूमि के हों, एक साथ बैठकर एक ही भोजन साझा करते थे।
गुरु अंगद देव जी का मानना था कि आध्यात्मिक विकास शारीरिक अनुशासन के साथ-साथ होना चाहिए। नवयुवकों के लिए उन्होंने मल्ल-अखाड़ा की प्रथा शुरू की। जहां पर शारीरिक ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक नैपुण्यता प्राप्त होती थी। इन अखाड़ों में युवा सिखों को कुश्ती और अनुशासन का प्रशिक्षण दिया जाता था जिसने उन्हें शारीरिक रुपए सशक्त, स्वस्थ और सक्रिय बनाया। उन्होंने सिखों को प्रार्थना, कर्म और सेवा के बीच संतुलन बनाते हुए अनुशासित जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होने भाई बाला जी से गुरू नानक साहिब जी के जीवन के तथ्यों के बारे में जाना एवं गुरू नानक साहिब जी की जीवनी लिखी। उन्होने 63 श्लोकों की रचना की, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंकित हैं। ये श्लोक विनम्रता, भक्ति और सत्यनिष्ठ जीवन पर केंद्रित हैं।
गुरू अंगद साहिब जी ने गुरू नानक साहिब जी द्वारा स्थापित सभी महत्वपूर्ण स्थानों एवं केन्द्रों का दौरा किया एवं सिख धर्म के प्रवचन सुनाये। उन्होने सैकड़ों नयी संगतों को स्थापित किया और इस प्रकार सिख पंथ का आधार मजबूत किया। यह समय सिख पंथ का शैशवकाल था जिसमें उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके इन प्रयासों ने सिख पंथ की अपनी एक पहचान स्थापित की।
गुरु अंगद देव जी के दर्शन को चार प्रमुख सिद्धांतों में संक्षेपित किया जा सकता है
सेवा : बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा के मानवता की निस्वार्थ सेवा करना।
विनम्रता: अहंकार को त्यागकर सादगी से जीवन जीना।
समानता: जातिगत विभाजन को अस्वीकार करना और सभी को समान मानना।
व्यावहारिक आध्यात्मिकता: भक्ति, अनुशासन और ईमानदारी से काम करते हुए संतुलित जीवन जीना।
गुरु अंगद देव जी सिख इतिहास के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक हैं। उन्होंने न केवल गुरु नानक के मिशन को आगे बढ़ाया, बल्कि सिख धर्म को उसकी लिपि दी, उसकी संस्थाओं को मज़बूत किया और उसके मूल्यों को जीवन में उतारा।
गुरू अंगद साहिब ने गुरू नानक साहिब द्वारा स्थापित परम्परा के अनुरूप अपनी मृत्यु से पहले अमर दास साहिब को गुरुपद प्रदान किया। उन्होंने गुरमत विचार एवं गुरु शबद रचनाओं को गुरू अमरदास साहिब जी को सौंप दिया। उन्होंने खडूर साहिब के निकट गोइन्दवाल में एक नये शहर का निर्माण कार्य शुरू किया था एवं गुरू अमर दास जी को इस निर्माण कार्य की देख रेख का जिम्मा सौंपा था। 48 वर्ष की आयु में 8 अप्रैल 1552 को वे ज्योति जोत समा गए।
जे सौ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार।
एते चानण होदिआं गुरु बिनु घोर अंधार।।
