गुरु अर्जन देव (1563–1606)
पंथ पर बलिदान होने वाले प्रथम बलिदानी, सिक्ख पंथ के 5वें गुरु, गुरु अर्जन देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1563 को गोइंदवाल में हुआ था। वे सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास जी के सबसे छोटे पुत्र थे और उनकी माता का नाम बीबी भानी जी था जो गुरु अमरदास जी की पुत्री थीं। गुरु अर्जन देव जी के पुत्र गुरु हरगोविंद साहिब जी थे।

उन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में 1 सितंबर अथवा 16 1581 को अपने पिता चौथे गुरु, गुरु रामदास से गुरु पद ग्रहण किया। यहीं से सिख पंथ में वश परंपरा प्रारंभ हुई।

आप वो महान गुरु थे जिन पर प्रत्येक भारतवासी गर्व करता है। आप अनेक गुणों से युक्त थे और आपके कर कमलों से अनेक महान कार्यों का संपादन हुआ।

  1. आपके पिता गुरु रामदास ने 1577 में जिस पवित्र अमृत सरोवर का निर्माण कर अमृतसर नगर की स्थापना की, उसमें आपने हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखकर निर्माण करवाया जिसका नक्शा भी आपने स्वयं तैयार किया था।
  2. आपने तरन तारन, करतारपुर (जालंधर) और श्री हरिगोबिंदपुर जैसे शहरों की स्थापना भी की।
  3. आपने 1604 में भाई गुरदास की सहायता से आदि ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब का प्रथम संपादन किया जिसमें 36 महान वाणीकारों के 30 रागों में भजनों को संकलित किया।
  4. पंथ के अनुयायियों को अपनी कमाई का 10वां हिस्सा धार्मिक कार्यों के लिए दान करने की प्रथा भी आपने प्रारंभ की। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत होकर मुगल बादशाह जहांगीर अपने विद्रोही पुत्र खुसरो की सहायता के झूठे आरोप में लाहौर के हाकिम मुर्तजा खान को गुरु जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। 30 मई 1606 को गुरुजी को गिरफ्तार कर उन्हें भीषण गर्मी में गर्म तांबे की कड़ाही में बिठाया गया और शरीर पर जलती हुई रेत डाली गई। इतनी यातनाओं के बाद, गंभीर रूप से झुलसे हुए गुरु अर्जन देव को रावी नदी में जंजीरों में जकड़ कर फेंक दिया गया। गुरुजी ने इन अमानवीय यातनाओं के दौरान ‘तेरा कीआ मीठा लागे’ (वाहेगुरु, आपका आदेश मुझे मीठा लगता है) कहते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया लेकिन जहांगीर के सामने समर्पण नहीं किया।

उनके इस अप्रतिम बलिदान ने उनके अनुयायियों को शांतिपूर्ण मार्ग त्याग कर अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करने को प्रेरित किया जिससे वे एक सामुदायिक सैन्य शक्ति के रूप में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर हुए।

उनकी बाणी शांत, प्रेम और आत्मसमर्पण का प्रतीक है, जो सुखमणि साहिब में भी परिलक्षित होती है।