सिखों के सातवें गुरु, श्री गुरु हरिराय अथवा हरराय साहिब जी (1630-1661) एक शांतिप्रिय, दयालु और करुणामयी आध्यात्मिक गुरु थे।
हरराय जी का जन्म 16 जनवरी, 1630 को कीरतपुर साहिब, रोपड़ (पंजाब) में पिता बाबा गुरदित्ता जी और माता निहाल कौर के यहां हुआ। उनके दादा व सिख पंथ के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद जी उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना और उन्होंने अपने दादा की मृत्यु के पश्चात 3 मार्च 1644 को, 14 वर्ष की छोटी आयु में गुरु पद का दायित्व संभाला।

गुरू हरराय साहिब जी का विवाह माता किशन कौर जी अनूप शहर (बुलन्दशहर), उत्तर प्रदेश के श्री दया राम जी की पुत्री से हुआ। गुरू हरराय साहिब जी के दो पुत्र थे श्री रामराय वडवाल और श्री हरकिशन थे।

उन्हें एक शांतिप्रिय गुरु के रूप में जाना जाता था जिन्होंने 2,200 सैनिकों की फौज रखते हुए भी युद्ध से परहेज किया और सिख समुदाय को प्रेम, सेवा और करुणा का संदेश दिया। गुरू हरराय साहिब जी का शांत व्यक्तित्व लोगों को प्रभावित करता था।

गुरु हरराय अपने पितामह, महान् योद्धा गुरु हरगोविंद सिंह के विपरीत थे, गुरु हरराय शांति के समर्थक थे, जो मुग़ल उत्पीड़न का विरोध करने के लिए उपयुक्त नहीं था।उन्होंने मुग़ल उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगज़ेब के बजाय उदारवादी दारा शिकोह का समर्थन किया।

भले ही व्यक्तिगत जीवन में वे अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त को अहम मानते थे लेकिन आत्म सुरक्षा के लिए सशस्त्र आवश्यक हैं, यह भी मानते थे।

एक बार गुरू हरराय साहिब जी मालवा और दोआबा क्षेत्र से प्रवास करके लौट रहे थे, तो मोहम्मद यारबेग खान ने उनके काफिले पर अपने एक हजार सशस्त्र सैनिकों के साथ हमला बोल दिया। इस अचानक हुए आक्रमण का गुरू हरराय साहिब जी ने सिख योद्धाओं के साथ मिलकर बहुत ही दिलेरी एवं बहादुरी के साथ प्रत्युत्तर दिया। दुश्मन को जान व माल की भारी हानि हुई एवं वे युद्ध के मैदान से भाग निकले। गुरू हरराय साहिब जी प्रायः सिख योद्धाओं को बहादुरी के पुरस्कारों से नवाजा करते थे।

गुरू हरराय साहिब ने लाहौर, सियालकोट, पठानकोट, साम्बा, रामगढ एवं जम्मू एवं कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों का प्रवास भी किया। उन्होने ३६० मंजियों की स्थापना की। उन्होने भ्रष्ट ‘मसन्द पद्धति’ सुधारने हेतु सुथरेशाह, साहिबा, संगतिये, मियां साहिब, भगत भगवान, भगत मल एवं जीत मल भगत जैसे पवित्र एवं आध्यात्मिक लोगों को मंजियों का प्रमुख नियुक्त किया।

गुरू हरराय साहिब ने अपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया। भ्रष्ट मसंद, धीरमल एवं मिनहास जैसों ने सिख पंथ के प्रसार में बाधाएं उत्पन्न की।

उन्होंने आयुर्वेद के प्रति गहरा लगाव दिखाया और उन्होंने कीरतपुर में एक हर्बल औषधालय और अनुसंधान केंद्र भी स्थापित किया। गुरू हरराय साहिब जी ने कीरतपुर में एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी दवाईयों का अस्पताल एवं अनसुधान केन्द्र की स्थापना भी की। एक बार शाहजहां का पुत्र दारा शिकोह किसी अनजानी बीमारी से ग्रस्त हुआ। हर प्रकार के सबसे बेहतर हकीमों से सलाह ली गयी। परन्तु किसी प्रकार कोई भी सुधार न आया। अन्त में गुरू साहिब की कृपा से उसका ईलाज हुआ। इस प्रकार दारा शिकोह को मौत के मुंह से बचा लिया गया।

शाहजहां की मृत्यु के बाद सत्ता के लिए हुए संघर्ष में औरंगजेब ने गुरु साहब पर आरोप लगाए कि गुरू हरराय साहिब जी ने उसके भाई दारा शिकोह की सहायता की है। गुरु हरराय का कहना था कि उन्होंने एक सच्चा सिक्ख होने के नाते सिर्फ़ एक ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद की है। जब औरंगज़ेब ने इस मामले पर सफ़ाई देने के लिए उन्हें बुलाया तो उन्होंने अपने पुत्र राम राय को प्रतिनिधि बनाकर भेज दिया।

राम राय जी ने गुरु हरराय की स्थिति को स्पष्ट किया और मुगल दरबार में धीरमल एवं मिनहास द्वारा सिख धर्म एवं गुरू घर के प्रति फैलायी गयी भ्रांतियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने गुरबाणी की त्रुटिपूर्ण व्याख्या कर दी। उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों एवं गुरु मर्यादा की दृष्टि से यह निन्दनीय था।

जब गुरू हरराय साहिब जी को इस घटना के बारे में बताया गया तो उन्होने राम राय जी को तुरंत सिख पंथ से निष्कासित कर दिया। इस घटना से, देश के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए, सिखों में ऐसे भावों का संचार हुआ। इस घटना के बाद सिख गुरुघर की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए। इस प्रकार गुरू साहिब ने सिख धर्म के वास्तविक गुणों, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज हैं, गुरू नानक देव जी द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया।

अपने अन्तिम समय को नजदीक देखते हुए उन्होने अपने सबसे छोटे पुत्र गुरू हरकिशन जी को ‘अष्टम्‌ नानक’ के रूप में स्थापित किया। 6 अक्टूबर 1661 में कीरतपुर साहिब में ज्योति जोत समा गये।

मुख्य शिक्षाएं
एक योद्धा को संसार में अपना मार्ग तय करने से पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
भगवान के सेवकों के लिए सभी प्राणियों के प्रति कोमल होना अच्छा है।

उन्होंने सिख संगत को गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति अटूट विश्वास रखने और मूल सिद्धांतों (गुरबाणी) को बनाए रखने का निर्देश दिया।

गुरु हरराय जी ने करुणा और प्रेम के मार्ग को अपनाकर मानवता की सेवा की और अपने समय में सिख धर्म को सुदृढ़ किया।